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दुनिया मेरे आगे- सम्मान का पैमाना

कद-काठी का उतना महत्त्व नहीं है, जितना इस बात का कि व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के बल पर अपना कद कितनी ऊंचाई तक ले जाता है।
Author May 2, 2017 04:14 am
प्रतीकात्मक चित्र।

 प्रदीप उपाध्याय    

बात इंसान के कद की होती है तो निगाह सीधे उसकी कद-काठी की ओर चली जाती है। कोई ऊंचा-पूरा, मोटा-ताजा हो सकता है तो कोई लंबू, कीड़ी-कांप या फिर कोई ठिगना हो सकता है। लेकिन कद-काठी का उतना महत्त्व नहीं है, जितना इस बात का कि व्यक्ति अपने व्यक्तित्व के बल पर अपना कद कितनी ऊंचाई तक ले जाता है। पूर्व प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री अपने छोटे कद के बावजूद ठोस और कठोर निर्णय के कारण सम्मानजनक ऊंचाई प्राप्त कर सके। अधिक लंबाई वाले फिल्मी सितारे अमिताभ बच्चन और छोटे कद के मुकरी के उदाहरण हमारे सामने हैं। ये अपनी लंबाई या कद से ज्यादा अपनी प्रतिभा के बल पर लोगों के दिलों में जगह बना पाए थे। विचारणीय यह भी है कि कुछ लोगों की निगाह में व्यक्ति का कद बहुत ही ऊंचा हो सकता है। ऐसे में उसके व्यक्तित्व की बुराई भी दब कर रह जाती है। लेकिन दूसरी ओर उसकी इज्जत या शोहरत उसमें छिपी अच्छाइयों की वजह से रहे, यह जरूरी नहीं। दरअसल, कुछ लोगों की निगाह में धन-दौलत, समाज में रुतबा और पावर ही व्यक्ति का कद ऊंचा करते हैं। इसके विपरीत कुछ लोग मानते हैं कि व्यक्ति का कद उसमें समाए सद्गुणों के कारण ऊंचा होता है। व्यक्ति सच्चरित्र, ईमानदार और सदाचारी है तो समाज में उसका कद ऊंचा माना जाता है।

लेकिन वर्तमान दौर में मान्यताएं बदली हैं। आमतौर पर बाहुबली लोग भी मान कर चलते हैं कि समाज में उनका कद ऊंचा है। आपराधिक पृष्ठभूमि होने के बावजूद वे समाज में विशिष्ट स्थान बनाए रखते हैं। उनकी बहुत ऊपर तक पहुंच है, सभी लोगों पर उनका रुतबा कायम है, मंत्री-संतरी तक से उनके ताल्लुकात हैं। उनके खिलाफ आवाज उठाने की किसी में ताकत नहीं है। लेकिन यह सिक्के का एक पहलू हो सकता है। इसके उलट यह भी हो सकता है कि ऐसे लोगों का वजूद तभी तक कायम रहे, जब तक वे सत्ता में रहते हैं। उनकी स्वीकार्यता उनसे भय और उनकी पहुंच के कारण रहती है। लोग तभी तक उनसे भय खाते हैं, जब तक उनकी पहुंच है। हमारे समाज में यह भी कहा जाता है कि नंगे के नव ग्रह बलवान होते हैं। इस तरह के बेलगाम लोगों से तो हर व्यक्ति भय खाता ही है। यों कई लोग अपना काम निकलवाने के लिए ऐसे बुरे लोगों का आसरा भी ले ही लेते हैं और ऐसे में वे मान लेते हैं कि उनका कद समाज में बढ़ता ही जा रहा है।इंसान के कद से तात्पर्य समाज में उसके मान-सम्मान और स्थान से है। व्यक्ति को समाज में मान-सम्मान और स्थान उसके अवदान-योगदान से मिलता है। अगर यह उसकी अच्छाइयों के कारण मिलता है तो उसका यश चारों ओर फैलता है और वह नायक की भूमिका में आ जाता है। दूसरी ओर, लोग भय और आतंक के जरिए भी समाज में अपना स्थान बना लेते हैं। उनको मान-सम्मान दिल से आदर के साथ नहीं दिया जाता, बल्कि यह व्यक्ति की मजबूरी हो सकती है। ऐसे लोग खलनायक होकर भी नायक की भूमिका में बने रहते हैं। ऐसे लोग भले ही समाज में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो जाएं, लेकिन यह जगह तात्कालिक रूप से ही उन्हें मिल पाती है। इसमें स्थायित्व का भाव नहीं होता है।

कई बार व्यक्ति का कद उसके जीवन काल में वह ऊंचाई प्राप्त नहीं कर पाता, जिसका वह वास्तविक हकदार होता है। यह भी संभव है कि उसकी विशिष्टता उसके जीवनकाल में पूरी तरह उभर कर नहीं आ पाती। हालांकि यह भी उतना ही सही है कि अपने विशिष्ट गुणों और अप्रतिम योगदान के कारण व्यक्ति का कद हर रोज और ज्यादा ऊंचा होता जाता है। ख्यात कवि मुक्तिबोध को अपने जीवन काल में वह ऊंचाई प्राप्त नहीं हो सकी थी, जो उनकी मृत्यु के बाद मिली।व्यक्ति को समाज में स्थान बनाने और स्थापित होने के लिए बहुत त्याग और बलिदान करना होता है। कद की ऊंचाई इतनी आसानी से हासिल नहीं होती। यह बात दीगर है कि व्यक्ति खरा है या खोटा, क्योंकि कोई व्यक्ति किसी के लिए खरा साबित हो सकता है तो किसी के लिए खोटा! यह बात ठीक उसी तरह से जाहिर की जा सकती है कि कोई व्यक्ति कुछ लोगों की दृष्टि में आदर्श होकर नायक हो सकता है तो कुछ लोगों की नजर में खलनायक। यह नजरिए का भेद हो सकता है। हालांकि व्यक्ति का कद उसके व्यक्तित्व की अच्छाइयों, गहराइयों और जीवंतता पर निर्भर करता है। लोगों की निगाह में कद घटता-बढ़ता रहता है, लेकिन सार्वजनिक जीवन में काम करने वाले व्यक्ति को बिना इस बात की परवाह किए अपने काम को ईमानदारी और सदाशयता के साथ अंजाम देना चाहिए। तभी वह अपने कद की ऊंचाइयों को हासिल कर सकता है।

 

 

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