March 25, 2017

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दुनिया मेरे आगे: भूलते भागते क्षण

बरसात के मौसम में तो अमरूद खुद ही टूट कर गिर जाते थे, जिन्हें कभी चिड़िया तो कभी हम चुपके से उड़ा ले जाते थे।

Author October 5, 2016 04:27 am
गांव के सभी मकान मिट्टी से बने हुए हैं। (स्रोत-एएनआई)

गुलाम हुसैन

घर के चारों ओर ऊंचे मकान थे, दो-चार मंजिल वाले। केवल हमारा घर ही आधा करकट और आधा छत वाला था, अब भी है। घर की छत से भी सिर्फ दूसरों के मकान नजर आते थे, खुला आकाश नहीं। आंगन के कोने में जनाना गुसलखाने के पास लंबा, छरहरा और आंगन को छांव देने वाला एक अमरूद का पेड़ था। इसकी वजह से हमें अपने घर पर गुरूर था। जिनकी छत ऊंची थी, वे भी हमारे आंगन में अमरूद लेने या कभी-कभी तोड़ने आ जाते थे। मौसम-बेमौसम हम अमरूद और उस पेड़ का मजा लेते थे। दीवार पर चढ़ कर अमरूद के तने पर बैठ जाना, फिर जहां तक हाथ पहुंचे, अमरूद तोड़ लेना। उसके कच्चे या पके होने के बारे में बिना जाने। यह ऐसा खेल था जो हमारे घर आया हर नया बच्चा खेला करता था।

तीन-चार दिन से सब बच्चों की नजर एक बड़े अमरूद पर थी, जो पेड़ की एक ऊंची डाल पर था। पत्थर मार नहीं सकते थे क्योंकि हमारी छत करकट की थी। यह भी डर रहता था कि कोई अगर देख लेगा या सोते हुए आवाज सुन लेगा तो लेने के देने पर जाएंगे। बेवक्त पढ़ाई-लिखाई की नसीहतें सुननी पड़ जाएंगी और हफ्ते भर तक के लिए मौज-मस्ती भी बंद हो जाएगी। हम अपनी मस्तियों को लेकर बड़े संवेदनशील होते थे। इसलिए बच्चों की टोली ने पत्थर से दूरी रखी। अमरूद अब पीला हो चला था और घर के बड़ों की नजर में भी वह आ गया था। हम सबकी ओर से रोज नए-नए तरीके सुझाए जाते, मगर कोई भी परवान नहीं चढ़ पाता था। कभी इतना लंबा कोई डंडा नहीं मिलता तो कभी पेड़ पर चढ़ने की हिम्मत नहीं होती! हममें से कोई भी पेड़ में चढ़ने में कुशल नहीं था। अगर वह गुसलखाना नहीं होता तो हममें से कोई भी नहीं चढ़ नहीं पाता शायद।

इसके बावजूद पेड़ से हमें बहुत मोह था। बरसात के मौसम में तो अमरूद खुद ही टूट कर गिर जाते थे, जिन्हें कभी चिड़िया तो कभी हम चुपके से उड़ा ले जाते थे। एक बार हुआ यों कि सुबह-सुबह हम बच्चों के बीच ‘महाभारत’ यानी लड़ाई हो गई। सबने एक दूसरे पर इल्जाम लगाया कि उसने अमरूद चुपके से तोड़ लिया है। अच्छा-खासा विवाद हो गया। आखिर ऐसा होता भी क्यों नहीं! इतने बड़े पीले अमरूद को अकेले खाने की हिम्मत आखिर किसने की, यह जानना जरूरी था। कुछ देर बाद घर के बड़ों के बीच हो-हल्ला शुरू हो गया। हम डर गए और सीढ़ी से नीचे नहीं उतरे। हममें से एक सारी बातें सुनने लगा। मेरी बड़ी बहन ने बताया कि चाची के रसोई वाले करकट में सूराख हो गया है। हम सबने एक दूसरे का मुंह देखा। अभी तो हम यह भी नहीं जान पाए थे कि अमरूद किसने तोड़ा और अब ये पत्थर वाली घटना हो गई। चोर हमारे बीच ही कोई है, मगर कौन? यही सवाल था। आंगन में गए तो बड़ों के झगड़े का रुख हमलोगों की ओर हो गया। सबने हमें इलजाम दिया। अम्मा, चाची, फूफी- सब एक दूसरे को अपने-अपने बच्चों को संभाल कर रखने की हिदायतें दे रही थीं। हम बेचारे लाचार थे। हममें से किसी को अमरूद हाथ नहीं लगा, लेकिन हमें ही डांट भी पिलाई गई और बेवक्त पढ़ने की सजा मिल गई।

उस रोज दिन भर हम किताबों के साथ बंधे रहे। ध्यान में अमरूद था और पढ़ने में मन नहीं लग रहा था, फिर भी किताबें थामे पढ़ते दिख रहे थे। हम आपस में कुछ भी तय नहीं कर पाए। फिर सब कुछ शांत होने के बाद रात के खाने के लिए जब मैं अम्मी के पास रसोई में गया और रोटियों की डोली उठाई, तब वहीं पीले बड़े अमरूद पर नजर पड़ी जो बड़े सलीके से एक कपड़े से छिपाया गया था। मैंने पहले अमरूद देखा, फिर अम्मी को देखा जो रोटियां बेल रही थीं। बिना कुछ कहे मैं चुपचाप रोटी लिए चला आया, यह सोच कर कि मेरी मां को भी अमरूद बहुत पसंद है। उनके गांव में भी कई अमरूद के पेड़ थे। बचपन उनका भी अमरूद तोड़ते पेड़ों पर कूद-फांद करते गुजरा है। यह अलग बात है कि पेड़ों पर चढ़ने में महारथी मेरी मां अब शायद पेड़ पर चढ़ने के बारे में नहीं सोच पाती होंगी। मगर निशाना उनका आज भी अच्छा था। बस वे हम बच्चों की तरह सोच नहीं पाई थीं कि करकट भी टूट सकता है!
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First Published on October 5, 2016 4:27 am

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