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दुनिया मेरे आगे-अपने शहर में पराए

गालिब तो बस गालिब हैं, जिनकी हस्ती को शब्दों में पिरोने की कला कोई उन्हीं के जैसा ही कर सकता है। और गालिब का महत्त्व हर कोई जानता है, वह उर्दू का जानकार हो या न हो। अब तक मैं यही सुनता आया था
Author September 9, 2017 02:37 am
मिर्जा गालिब

राय बहादुर सिंह 

सोचिए कि आप लालकिले के सामने वाली सड़क पर वाहनों के जाम के बीच से अपने लिए रास्ता बनाते हुए चले जा रहे हों और मौका पाते ही नई सड़क के खालीपन को देख कर उस ओर मुड़ जाएं! मुड़ने से पहले तक लाल किला, सड़कें, दुकानें और बाजार को देख कर अब तक जो कोई एक खास विचार मन में कौंध रहा था, वह नई सड़क के खालीपन लिए बुजुर्ग और लकीरों से पटे मकानों की किसी चिंताग्रस्त लकीर में कहीं खो जाए तो कैसा लगेगा? अफसोस तो जरूर होगा कि एक नायाब विचार खो गया। खैर, ऐसे विचार रोजाना हमारे मन में बुलबुलों की तरह बनते हैं और फूट जाते हैं। पर अतीत के किसी खास हिस्से के खो जाने का अहसास कितना डरावना हो सकता है! या यों कहें कि वर्तमान के पन्नों से गालिब का खो जाना कितना डरावना अहसास हो सकता है। यह बात डरावनी इसलिए भी है कि गालिब को भूलने वाली जनता किसी दूरदराज के इलाके की नहीं है और न ही किसी ऐसे इलाके की जहां रवि पहुंचता है, कवि नहीं। बल्कि यह जनता दिल्ली की है, जहां गालिब ने अपनी तमाम उम्र गुजारी और वहीं की अवाम की याददाश्त से वे मिटते जा रहे हैं। सवाल यह है कि क्या गालिब कोई बुलबुल थे या मन में घूमता-टहलता आया कोई विचार, जो मन के अचेतन में समाधि ले लें। नहीं, गालिब तो बस गालिब हैं, जिनकी हस्ती को शब्दों में पिरोने की कला कोई उन्हीं के जैसा ही कर सकता है। और गालिब का महत्त्व हर कोई जानता है, वह उर्दू का जानकार हो या न हो। अब तक मैं यही सुनता आया था।

अदब की दुनिया में गालिब का जो मकाम रहा है, वह पश्चिम में सिर्फ शेक्सपियर का रहा। इसके बावजूद गालिब लोगों के जेहन से बिसर गए हैं। गालिब रीतिकाल के दरबारी कवियों की तरह नहीं हैं। वे बस शायर हैं। बल्कि वे अवाम के शायर हैं। इसीलिए वे आखिरी मुगल बादशाह के दरबार में होने के बावजूद समाज को आईना दिखाते थे- ‘हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन / दिल के खुश रखने को ‘गालिब’ ये खयाल अच्छा है!’सभी तरह के तर्क मैंने खुद को दिए, जब मैंने नई सड़क पर रविवार की दोपहर दुकान पर बैठे सरदारजी से पूछा कि गालिब की हवेली कहां है तो वे बोले कि कुछ पता वगैरह है उसका, काम क्या करता है वह! जवाब में मैंने कहा कि वे शायर थे, मुगलों के समय के हैं। इसके बाद वे बोले कि पता नहीं, किसी और से पूछो। मैं थोड़ी दूर चला और एक उम्रदराज मकान में खुली दुकान पर बैठे बुजुर्ग से पूछा तो वे सोच कर बोले कि बेटा पता नहीं, अब वह हमारे यहां से कुछ सामान ले जाता तो जरूर जानता।

उनकी बात सुन कर घोर निराशा हुई। मैं आगे चल पड़ा। काफी पूछताछ के बाद मैंने आखिरकार गालिब को ढूंढ़ ही लिया। उनका मकान आज भी उनकी यादों को समेटे फख्र से खड़ा था। परेशानी बस इस बात की है कि अवाम का शायर अवाम की यादाश्त से गायब कैसे हो रहा है! क्या इसकी वजह इंसानी फितरत है, जो किसी भी बड़ी शख्सियत को वक्त के साथ भूल जाने का माद्दा रखती है? ऐसा क्या हुआ है कि पुरानी दिल्ली के उन लोगों के मन की अंधेरी गलियों में गालिब खो गए हैं? जो कभी उनके सबसे बड़े मुरीद थे, आज वे उन्हें कैसे भूलते जा रहे हैं? ‘हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन / दिल के खुश रखने को ‘गालिब’ यह खयाल अच्छा है!’गालिब को लोगों का भुला देना इसलिए भी कचोटता है कि वे हमारी साझी विरासत थे। यह अलग बात है कि इस देश के लोग और निजाम शायद विरासत के मायने कोई प्राचीन मंदिर, इमारत, ताजमहल, लालकिला, कुतुबमीनार, जामा मस्जिद या पुराना किला को देख कर तय करते हैं। शायद तभी गालिब को भुलाया जा रहा है।

शायद वक्त की अदालत में कोई अदीब एक रोज इस मसले पर कोई अदालत जरूर लगाएगा कि पाकिस्तान गए लोगों ने आज भी गालिब को क्यों अपने दिलों में संजोए रखा है। यहां का तो हाल कुछ यों है जैसे चिराग तले अंधेरा। क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक खेल है? फिर इस देश के लगातार बदलते निजाम ने कभी भी इस शानदार विरासत को संजोने और अपनी भावी पीढ़ी तक पहुंचाने का कोई खास इंतजाम क्यों नहीं किया? बल्कि अब तो यों लगता है जैसे उर्दू और फारसी की तरह गालिब को भी धार्मिक पहचान में समेटने की कोशिश की जा रही है। अगर यही आधुनिक यथार्थ है तो किताबों को अपने भीतर पनाह लिए उन जुमलों को निकाल के फेंक देना चाहिए जो कहते हैं कि ‘कलाकार का कोई मजहब नहीं होता!’ गालिब अपने ही शहर में खोए-खोए से लगते हैं या शायद शहर कुछ ज्यादा ही मसरूफ हो गया है।

 

 

 

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  1. R
    Rajnish
    Sep 11, 2017 at 7:37 pm
    ‘हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन / दिल के खुश रखने को ‘गालिब’ ये खयाल अच्छा है!' बस इसकी गहराई समझ जायें लोग तो ग़ालिब को याद करना सफल जाएगा
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    1. R
      rajen
      Sep 9, 2017 at 2:54 pm
      लोग पैसा ोरने, एक दूसरे को धोखा देने, बाबा और गुरुओं से आशीर्वाद लेने में व्यस्त हैं. ग़ालिब को समझने के लिए समझने लायक दिमाग और तहजीब चाहिए.
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