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दुनिया मेरे आगे- बिखरते रिश्तों के बीच

मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ तो वह कुछ बोला नहीं, झुक कर पैर छुए और एक अदद नारियल मुझे भेंट करते हुए बोला- ‘सर, गुरु पूर्णिमा है आज!’ मैं खुद भूल गया था।
Author August 7, 2017 05:43 am
प्रतीकात्मक चित्र।

हेमंत कुमार पारीक

जिन दिनों वह मुफलिसी काट रहा था, तब भी आया। चेहरा बुझा-बुझा हुआ था उसका। मैंने उससे पूछा कि क्या हुआ तो वह कुछ बोला नहीं, झुक कर पैर छुए और एक अदद नारियल मुझे भेंट करते हुए बोला- ‘सर, गुरु पूर्णिमा है आज!’ मैं खुद भूल गया था। वह सामने बैठ गया। उसके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। मैंने पूछा कि कुछ हुआ क्या? उसने कहा- ‘नहीं सर, कॉरपोरेशन बंद होकर रहेगा। बहुत कुछ किया लोगों ने। नीचे से लेकर ऊपर तक तमाम मंत्रियों और नेताओं के दरवाजे खटखटाए, मगर कोई फायदा नहीं। दरअसल, संस्था के अधिकारियों ने तो अपने ठिकाने ढूंढ़ लिये हैं। बस हमारे जैसे कुछ छोटे कर्मचारी रह गए हैं। और उनमें भी कुछ ने नेता जैसे लोगों से जुगाड़ कर कहीं-कहीं अपनी जगह बना ली है। बचे हुए लोग, जिनके पास कोई संपर्क या जुगाड़ नहीं है, उनमें मैं भी हूं।’ मैंने पूछा कि घर-खर्च कैसे चल रहा है तो उसने बताया- ‘पिताजी अपनी पेंशन से कुछ भेज रहे हैं। बाकी अपनी पत्नी के गहने गिरवी रख किसी तरह दाल-रोटी चल रही है।’ मगर कब तक, मैंने कहा और उसने ठंडी सांस ली। आंखों में पानी भर आया था उसकी। मैंने उसे दिलासा दिया- ‘ऐसे समय में तो तुम्हें पाई-पाई की जरूरत है, फिर यह नारियल वगैरह क्यों खरीद लाए?’ ‘सर, आपको गुरु माना है, इसलिए इस पर्व पर यह तो जरूरी था।’ उसने कहा। मैं क्या जवाब देता… चुप हो गया। कुछ देर खामोश बैठा रहा। फिर वह बोला- ‘सर, अब चलता हूं।’ मैंने कहा- ‘कोई जरूरत हो तो बोलो?’ उसने जवाब दिया कि जब ज्यादा जरूरत होगी मैं खुद मांग लूंगा।

इतना कह कर वह चला गया और मैं सोच रहा था कि इतने सीधे-सच्चे और ईमानदार लोगों को ही क्यों अपनी जिंदगी के ज्यादातर हिस्से को किसी परीक्षा की तरह गुजारना पड़ता है। इस बीच फिर एक बार आया वह। लेकिन किसी तरह की मांग नहीं थी उसकी। अलबत्ता कहने लगा, सर एक अस्थायी नौकरी मिल गई है। घर-गृहस्थी की गाड़ी किसी तरह खींच रहा हंू। मैं भी खुश हो गया था। उसे थोड़ी राहत मिल गई थी। दरअसल, उसके आने से मैं खुश हो जाता था। अब भी गुरु-शिष्य परंपरा में उसका विश्वास था। उस पीढ़ी का था जब गुरु को ईश्वर से बढ़ कर दर्जा दिया जाता था। इस संदर्भ में आमतौर पर यह दोहराया जाता है- ‘गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पांय।’ समझ नहीं आता कि वह संबंध क्यों क्षीण पड़ गया, गुरु कब शिक्षक में बदला और कब शिक्षक टीचर हो गया। इसी तरह कब शिष्य से बदल कर छात्र और फिर स्टूडेंट हो गया। आज शिक्षक सुविधा-संपन्न है। अच्छी तनख्वाह पर काम कर रहा है। लेकिन पहले के शिक्षक मुट्ठी भर तनख्वाह पर काम करते थे, लेकिन विद्यार्थियों को जी-जान से ज्ञान बांटते थे। अपने शिष्य को बड़े-बड़े ओहदों पर काम करते देख माता-पिता की तरह खुश होते थे। लेकिन अब ऐसा महसूस होता है कि गुरु और शिष्य के बीच जो भावनात्मक रिश्ता कभी हुआ करता था, वह नहीं रहा। कहीं गुरु अपने शिष्य को पीट रहा है, कठोर दंड दे रहा है तो कहीं शिष्य गुरु को अपमानित करने से नहीं चूक रहा है। वजह यही है कि दोनों का चारित्रिक पतन हुआ है। दोनों अब उस बाजार में खड़े हैं, जहां लेन-देन का माध्यम सिर्फ पैसा है, स्नेह और प्यार नहीं। गुरु के लिए तीन सौ पैंसठ दिनों में से मात्र एक दिन रह गया है- ‘शिक्षक दिवस!’ डीजे के शोर में हुड़दंग भरा दिन! गुम होती पवित्र परंपरा का जश्न!

पिछले कुछ सालों से धीरे-धीरे शिक्षक दिवस भी आधुनिकता की चपेट में आ गया है। पहले छात्र-छात्राएं शिक्षक दिवस पर शिक्षक को गुलदस्ता भेंट करते थे। अब यह परंपरा भी खत्म हो रही है। आजकल तो चलते-फिरते किसी विद्यार्थी के मन में आया तो कह देता है- ‘हैपी टीचर्स डे!’कुछ समय पहले, बीती गुरु पूर्णिमा के रोज मैंने सोचा नहीं था कि वह आएगा! इसका कारण था कि वह किसी दूसरे शहर में रहने चला गया है। लेकिन उसे देख कर मैं हैरान था। दरवाजे पर एक पेन, एक नारियल और पुष्पगुच्छ लिये वह खड़ा था। बातचीत के दौरान उसने बताया कि उसकी पत्नी की एक सरकारी महकमे में नौकरी लग गई है और वह भी वहीं प्राइवेट नौकरी करता है। उसके चेहरे पर पहले जैसी उदासी नहीं थी। खिला-खिला चेहरा था। चेहरे पर आत्मविश्वास की दमक थी। मुझे भी उससे उपहार लेने में कोई संकोच नहीं था। लेकिन आश्चर्यचकित हूं कि इस बदलते परिवेश में जहां सारे संबंध रुपए-पैसे में तौले जा रहे हैं, वहां ऐसे लोग भी हैं जो गुरु-शिष्य परंपरा का निर्वाह कर रहे हैं। पता नहीं क्यों!

 

 

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