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दुनिया मेरे आगे- धारणा के बरक्स

सरकारी स्कूलों में काम कर रहे अध्यापकों के प्रति कई प्रकार की धारणाएं बनी हुई हैं। ये धारणाएं शिक्षकों के अपने कर्तव्य से विमुख होने से लेकर इस बात तक जाती हैं कि जैसे सरकारी स्कूलों की बदहाली का मुख्य कारण वही हों।
Author May 18, 2017 05:21 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

कैलाश चंद्र काण्डपाल

अपने आसपास जितने भी लोगों से मिलता हूं, तो लगता है कि उनके बीच सरकारी स्कूलों में काम कर रहे अध्यापकों के प्रति कई प्रकार की धारणाएं बनी हुई हैं। ये धारणाएं शिक्षकों के अपने कर्तव्य से विमुख होने से लेकर इस बात तक जाती हैं कि जैसे सरकारी स्कूलों की बदहाली का मुख्य कारण वही हों। लेकिन सवाल है कि ये धारणाएं आखिर कैसे बनीं! अगर हम इन धारणाओं की तह में जाते हैं तो कुछ ऐसा खास नहीं मिलता, जिससे माना जाए कि वे धारणाएं बिल्कुल सही हों। फिर भी ऐसा क्यों हो रहा है कि सरकारी स्कूलों में पढ़ा रहे केवल अध्यापकों की छवि धूमिल की जा रही है? वास्तविकता यह है कि इनमें से अधिकतर प्रतिकूल परिस्थितियों में भी सरकारी स्कूलों की छवि को ठीक करने में अथक प्रयास करते दिखाई देते हैं। सरकारी स्कूलों के अध्यापकों के लिए एक आम धारणा यह भी बनाई गई है कि वे आमतौर पर अपने स्कूलों से अनुपस्थित रहते हैं। बल्कि यहां तक कहा गया है कि अध्यापकों की यह अनुपस्थिति बीस से पचास प्रतिशत तक है। अगर ऐसा है तो यह शोचनीय स्थिति है। इस बात को समझने के उद्देश्य से हाल ही में अजीम प्रेमजी फाउंडेशन ने एक शोध अध्ययन किया। इस अध्ययन में भारत के छह राज्यों के छह सौ उन्नीस सरकारी स्कूल और दो हजार आठ सौ इकसठ अध्यापकों का सैंपल लिया गया और इसके जरिए अध्यापक की विद्यालय से अनुपस्थिति को समझने की कोशिश की गई। इस अध्ययन से प्राप्त परिणामों में यह पाया गया कि संबंधित विद्यालयों में अनुपस्थिति आमतौर पर 18.5 फीसद थी, लेकिन नौ प्रतिशत शिक्षक वास्तविक रूप से अवकाश में थे और सात प्रतिशत सरकारी कार्यों की वजह से अनुपस्थित थे। सिर्फ ढाई प्रतिशत शिक्षक ऐसे थे जिनके अनुपस्थित होने की कोई वजह नहीं थी।

अब जरूरत है अनुपस्थिति के आंकड़े को समझने की। अगर नौ प्रतिशत के अांकड़े को देखें तो यह संख्या कोई अधिक नहीं है। किसी भी संस्था में जहां आकस्मिक छुट्टियों का प्रावधान होता है, वहां यह संख्या अधिक नहीं कही जा सकती है। सात प्रतिशत के आंकड़े में यह देखने की जरूरत है कि वे कैसे सरकारी काम हैं जो शिक्षकों को स्कूल से दूर रखते हैं। शायद इस ओर कुछ ध्यान देने की जरूरत है। अकारण अनुपस्थिति ढाई प्रतिशत साधारण स्थितियों में नहीं होनी चाहिए, लेकिन शिक्षकों की अनुपस्थिति के मसले पर यह परिणाम आम धारणा को खंडित करता नजर आता है। इससे यह बात साफतौर पर समझ आती है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता कम होने की वजह कुछ और है, न कि शिक्षकों की अनुपस्थिति या उनका अपने काम के प्रति अलगाव। इस पर सवाल उठाने वाले सैंपल पर भी बहस की जा सकती है, लेकिन यह अध्ययन एक बात की ओर इशारा जरूर करता दिखाई देता है कि सरकारी शिक्षकों की विद्यालय से अनुपस्थिति पर बनी धारणा पर कुछ बड़े सवाल हैं। सच यह है कि सरकारी स्कूलों में शिक्षक आमतौर पर विपरीत परिस्थितियों में काम करते नजर आते हैं। वह कक्षा-अध्यापक अनुपात हो या छात्र-अध्यापक अनुपात, दोनों ही परिस्थितियां अध्यापकों के प्रतिकूल ही दिखाई देती हैं। इसके अलावा बुनियादी सुविधाओं की उपलब्धता और स्कूली शिक्षा में अध्यापकों को वांछित शासकीय प्रोत्साहन, दोनों ही सरकारी स्कूली शिक्षा में नदारद दिखते हैं।

हमें यह सवाल करना होगा कि ये कौन लोग हैं जो कि सरकारी स्कूलों में शिक्षण कार्य कर रहे हैं। विश्लेषण करने पर पाएंगे कि ये निजी स्कूलों में शिक्षण कार्य कर रहे अध्यापकों से हर मानकों में बेहतर हैं। मैं यहां उन अध्यापकों की बात नहीं कर रहा हूं जो कि वांछित प्रक्रिया से सरकारी स्कूलों में अध्यापक बने हैं। फिर क्या बात है कि ये सवालों के कठघरे में खड़े दिखाई देते हैं? सच्चाई यह है कि इनके काम करने की परिस्थितियां इतनी विपरीत हैं कि जो भी ये लोग कर पा रहे हैं, उसे अपेक्षा के मुकाबले ज्यादा कहा जाना चाहिए। जरूरत है इन प्रतिकूल परिस्थितियों की पहचान की जाए और उन्हें अनुकूल बनाया जाए, जिससे शिक्षक वह कर पाएं जो वे वास्तव में करना चाहते हैं।आज जरूरत है कि सरकारी स्कूली शिक्षा में जो भी अच्छा हो पा रहा है, उससे बात शुरू की जाए, न कि उसमें बुराई ढूंढ़ कर उसे इस कदर बदनाम कर दिया जाए कि आम समाज उससे कट जाए। सभी को गुणवत्तापरक शिक्षा उपलब्ध कराना सरकार का मुख्य काम है और इसके लिए सरकारी विभाग और संस्थाएं बनाई गई हैं। अध्यापक इसके मूल में है। गुणवत्तापरक शिक्षा का सपना तभी पूरा हो सकता है, जबकि इसके मूल में रहने वाले अध्यापक को प्रोत्साहित किया जाए, न कि उसके बारे में अटपटी धारणाएं बना कर ऐसा माहौल बनाया जाए कि वह हतोत्साहित होकर रह जाए। अगर ऐसा ही होता रहा तो हम राष्ट्र की प्रगति के लिए वांछित गुणवत्तापरक शिक्षा के अपने सपनों पर प्रश्नचिह्न ही लगाएंगे। हमें तय करना है कि हम कौन-सी राह चुनें!

 

 

 

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