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संवाद के सेतु

एक साथ काम करते अलग-अलग समूहों में थोड़ी-बहुत बातचीत होना लाजिमी है। एक दूसरे के बारे में जानने की इच्छा भी लोगों के बीच संवाद की वजह बनती है।
Author July 18, 2017 04:58 am
प्रतीकात्मक चित्र।

अम्ब्रेश रंजन कुमार

बात उन दिनों की है जब कॅरियर के शुरुआती दिनों में मैं एक छोटी-सी संस्था के लिए काम करता था। कार्यालय में सहयोगियों के अलग-अलग समूह थे। जो एक समूह में थे, उनके बीच अच्छी पहचान थी। मैं भी अपने समूह के साथियों को अच्छी तरह और दूसरे समूह के सदस्यों को उनके नाम से जानता था। वास्तव में यह इंसान के स्वभाव में है कि आसपास रहने वालों से बातचीत के जरिए वह उन्हें अच्छी तरह जान पाता है या यों कहें कि समझ पाता है और दूर रहने वाले व्यक्ति के स्वभाव, नाम आदि के बारे में उसे अप्रत्यक्ष रूप से जानकारी मिलती है। लेकिन यह किसी व्यक्ति को केवल जानने तक सीमित रहता है। किसी को पहचानना उससे आगे की कड़ी है जो प्रत्यक्ष रूप से बातचीत से संभव हो सकता है और इसमें समय लगता है। यही समय का सफर हमें किसी व्यक्ति को समझने के मुकाम तक ले जाता है। मगर किसी को समझने के लिए कितना समय काफी है, कभी ऐसे सवाल भी हमारे सामने उठते होंगे। कई बार किसी के साथ लंबे समय तक रहने के बाद भी हम कहते हैं कि उसे समझने में देर हुई या भूल हो गई। वास्तव में किसी को समझ पाने के लिए कितना समय काफी है, इसका कोई तय पैमाना नहीं है। हमारे सामाजिक जीवन में किसी को जानना एक चीज है, पहचानना या फिर किसी को समझना अलग बात है। एक शाम दिल्ली के कनॉट प्लेस की ओर जाते हुए एक मित्र ने मुझसे मेरी शिक्षा के संबंध में बात करते हुए पूछा कि क्या आपने दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा ग्रहण की है, तो मेरा जवाब हां था। थोड़ी और बात हुई। यह बातचीत बहुत कम वक्त की रही और फिर हम खरीदारी के लिए आगे निकल पड़े। वह मित्र अलग समूह में रहती थी और हमारे बीच बहुत कम बातचीत होती थी। फिर भी उसे मेरे बारे में थोड़ी जानकारी थी।

एक साथ काम करते अलग-अलग समूहों में थोड़ी-बहुत बातचीत होना लाजिमी है। एक दूसरे के बारे में जानने की इच्छा भी लोगों के बीच संवाद की वजह बनती है। फिर उस मित्र का स्थानांतरण लखनऊ हो गया। उसके बाद हमारे बीच लंबे समय तक बातचीत नहीं हुई। दो वर्ष बाद संस्था में उस मित्र की पदोन्नति हुई। मैंने एक-दो दिन रुक कर उसे बधाई दी और कहा कि मेरी पदोन्नति नहीं हुई। उसका सपाट जवाब था कि कोई बात नहीं, अगले साल हो जाएगी। हमारी बात समाप्त हो गई। उसका जवाब महज सांत्वना की तरह लगा और मुझे पसंद नहीं आया। वक्त के साथ मेरी पदोन्नति हुई और उसका स्थानांतरण फिर मेरे कार्यालय में हो गया। एक ही विभाग में पदस्थ रहने के कारण अब उससे बराबर बातचीत होना स्वाभाविक था। मेरी कुछ बातों की उसने तारीफ की।क्या किसी की तारीफ दो व्यक्तियों के बीच संवाद को बढ़ाती है? हां, ऐसा होता है। इसमें हमखयाली का बोध होता है। आपसी बातचीत और संबंधों में तारीफ बहुत अहमियत रखती है। मुझे स्कूल के दिनों से ही पुरानी फिल्मों की कहानियों की तरह जीवन जीने का अंदाज पसंद आता था। लिखने की प्रवृत्ति मुझमें बारहवीं कक्षा से ही आ गई थी। उसके बाद सफलता-विफलताओं के बीच आगे निकलने के लिए शब्दों का सहारा लेता रहा। शैक्षणिक अभिरुचि वाले लोगों के बीच रहने में मुझे शुरू से अच्छा लगता रहा है। खुद भी शिक्षा के क्षेत्र में कॅरियर बनाना चाहता था, जो नहीं हो सका। लेकिन आज भी ऐसे लोगों के बीच रहना पसंद करता हूं जो शिक्षा संबंधी मुद्दे पर गंभीर रहते हों और सामाजिक विषयों को गंभीरता से लेते हुए उस पर सार्थक और तार्किक विमर्श करते हों। मैंने उस मित्र के विचार ऐसे ही पाए। उसके स्वभाव में गंभीर विषयों पर संजीदगी से चर्चा करना, सामने वाले को समझ पाना, उम्मीद करना और मनमुटाव को दूर करने के तरीके अच्छे लगे।

असल में समय बीतने के साथ चीजें सामान्य हो जाती हैं। इंसानी स्वभाव का ये उतार-चढ़ाव भी अपने आप में रोचक अनुभूति है, जो हमारे जीवन की अनुभूति को विविध बनाता है। आपसी संबंधों में ये उतार-चढ़ाव किसी को समझने में मदद करते हैं। या यों कहें कि इससे संबंधों की समीक्षा होती है। आगे चल कर यह समीक्षा संबंधों में परिपक्वता का रूप लेती है जो एक संतुलित जीवन जीने के विभिन्न घटकों में से एक है। हमारे सामाजिक जीवन में कौन हमारा हमखयाल हो जाए, हम इसकी पूर्व कल्पना नहीं कर सकते। जीवन भर लोगों से मिलना-जुलना, बिछड़ना लगा रहता है। इसी ताने-बाने के बीच लोगों को जानने, पहचानने और समझने का सिलसिला जारी रहता है। आपस में अच्छे रिश्ते या संबंध के स्तर तक हम तभी पहुंचते हैं, जब समझने के स्तर तक कुशलतापूर्वक पहुंच पाएं।

 

 

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