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दुनिया मेरे आगे- उदास व्यवहार का मौसम

हर तरफ रास्ते ऊबड़-खाबड़ हो गए हैं। यहां-वहां कांटे उग आए हैं। गलती कहां हुई। बच्चे जब छोटी-छोटी उद््दंडताएं करते हैं, तो हम सभी मजा लेते हैं।
Author May 1, 2017 05:17 am
प्रतीकात्मक चित्र।

 संतोष उत्सुक

एक परिचित के दफ्तर में काम से जाना हुआ। हम दोनों बात कर रहे थे कि एक स्मार्ट युवक आया और ‘चाचा नमस्ते’ कह कर मेज की इस तरफ से ही परिचित के टखनों में हाथ लगाने की कोशिश करने लगा, मगर उसकी अंगुलियों के पोर उनके पेट को भी छू नहीं सके। युवक ने अपनी व्यावहारिक समझ के अनुसार अपने प्रिय चाचा के चरण स्पर्श कर दिए थे। हंसते हुए परिचित ने कहा कि ‘बेटा, चरण स्पर्श करना चाहते हो तो वाकई किया करो’ और वह कुर्सी से उठ कर थोड़ा अलग खड़ा हो गया और ‘बोला, लो अब कर लो।’ अब उस युवक ने माफी मांगते हुए, बड़े अदब से उनके पांव छुए और आशीर्वाद लिया। सामने खड़े एक बुजुर्ग ने कहा कि आपने बहुत सही काम किया। इन बच्चों को सही दिशा दिखाने बताने वालों की बेहद जरूरत है। परिचित ने कहा कि आप सही कहते हैं। हम सबने मिल कर आपसी व्यवहार को मटियामेट कर डाला है। किसे, किससे, कब, कहां, किसके सामने कैसे पेश आना है, कैसे बात करनी है जैसी बातों की समझ नहीं है। आशीर्वाद लेना किसी जमाने में कितनी महत्त्वपूर्ण व्यावहारिक क्रिया होती थी, किसी को नहीं पता। बात सिर्फ पांव छूने की नहीं है। सड़क पर चलने, बस में चढ़ने-उतरने, ड्राइविंग करने से लेकर टेलीफोन पर बात करने, खाने-पीने, नाचने-गाने, हंसी-मजाक, अभिवादन और यहां तक कि लड़ाई-झगड़े में भी व्यवहार शामिल है। आपने सुना ही होगा कि लखनऊ के दो नवाबों की गाड़ी ‘पहले आप, पहले आप’ करते निकल गई थी और नवाबों की बहस से भी सलीका बाहर नहीं होता था। मगर आज स्वार्थ, भागदौड़ और विकास की मार-काट के कारण ही व्यवहार का मौसम गड़बड़ा गया है।

हर तरफ रास्ते ऊबड़-खाबड़ हो गए हैं। यहां-वहां कांटे उग आए हैं। गलती कहां हुई। बच्चे जब छोटी-छोटी उद््दंडताएं करते हैं, तो हम सभी मजा लेते हैं। लेकिन अगर यही सही समय पर संपादित न की जाएं तो बच्चे का व्यवहार किस दिशा में कितना, किस तरह फैलेगा यह बताने की जरूरत नहीं, लेकिन समझने की है। कभी अच्छे सांस्कृतिक बदलाव के प्रेरक माने जाने वाले नेता, कलाकार, अभिनेता और नेत्रियों ने पैसा कमाऊ सोच के कारण समाज में नई शैली के सांस्कृतिक बदलावों के माध्यम से काफी व्यावहारिक प्रदूषण बढ़ाया है। हंसी-मजाक एक बेहद जरूरी हिस्सा है व्यवहार का। लेकिन हास्य चुटकियों के नाम पर कितने अर्थ लिये, क्या-क्या सुनाया और बड़े मजे से सुना जा रहा है, उसे बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी देख रहे हैं। हास्य धारावाहिक के विषयों और फिल्मी शैली ने कैसे, अपरिपक्व फूहड़ और उद््दंड व्यावहारिक बदलाव लाए हैं, हम सब समझते हैं। मगर अनजान होकर चुप बैठे हैं। धारावाहिकों, फिल्मों और अन्य कार्यक्रमों में पति-पत्नी या कहिए स्त्री-पुरुष के संवेदनशील, एकांतमय, अप्रकट व्यावहारिक हिस्सों को एक खुली किताब बना दिया है।

ऐसा माना जाता है कि दिमाग पर देखने का सबसे ज्यादा असर होता है। सो हुआ भी है। बचपन की सौम्यता और सहजता को लील कर हमने बालपन को समय से पहले युवा कर दिया है। पति-पत्नी, बच्चों, बुजुर्गों के बीच का व्यावहारिक सामंजस्य तो काफी पहले खत्म कर दिया गया था। अब एक छत के नीचे रहने वाले दो प्राणियों की आपसी कुंठित, सकुंचित, व्यावसायिक सोच के कारण वे तीसरा प्राणी नहीं चाहते। युवतियां विवाह नहीं चाहतीं, पड़ोसी पड़ोसी के घर नहीं जाता, लोग विवाह समारोहों में मिलकर खुश हो लेते हैं। व्यवहार में उगी बनावट की घास थम नहीं रही, क्योंकि उनका अपना व्यवहार भी उनके अपने स्वार्थों के लिए है। तकनीक की रसोई में उपलब्ध संसाधनों ने व्यवहार को संपादित करने में खूब खेल खेला है और अब यही सुविधा दुविधा बन चुकी है। इलेक्ट्रॉनिक सामान के दीवानों की परेशानी बढ़ चली है और कितनों को उपचार की शरण में जाना पड़ा है।

अभी भी देर नहीं हुई। संजीदा और ईमानदार प्रयास हों, यानी दिल से कोशिश की जाए तो व्यवहार की पतझड़ को बहार में बदला जा सकता है। इसके लिए हमें दूसरों की तरफ न देख कर खुद से शुरुआत करनी होगी। यानी संबंधों में व्यावहारिक रवानगी बनाए रखने के लिए अगर आपके पड़ोसी आपको चाय या खाने पर नहीं बुला पा रहे तो यह अच्छी शुरुआत आप कीजिए। अपने से शुरू करने वाले इस व्यावहारिक प्रयास में हम बचपन को शुरुआत से शामिल कर सकते हैं। उन्हें हम संयमित, संस्कारित, भावनापूर्ण, अनुशासित माहौल देंगे तो निस्संदेह वैसा ही व्यवहार उनके मानसिक आंगन में उगेगा। वर्तमान न सुधर सका, लेकिन कम से कम आने वाली नस्ल तो बेहतर व्यवहार करेगी!मेरे मित्र बता रहे थे कि मैंने कल सुबह अपनी पत्नी को कहा- ‘गुड मॉर्निंग’, तो पत्नी का जवाब था- ‘आपको वाट्स ऐप पर भेज तो दिया है!’ मेरे दोस्त ने कहा कि दरअसल, कई दिन से पर्सनली नहीं कहा, तब जाकर पत्नी ने ‘गुड मॉर्निंग’ कहा। अच्छी शुरुआत के लिए हर क्षण उत्तम है।

 

 

 

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