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दुनिया मेरे आगे: संबंधों के सिरे

अन्य शहरों की तरह कोटा में भी एटीएम और बैंकों के बाहर लोगों की लंबी लाइन नकदी पाने का इंतजार करती नजर आती है।
Author December 22, 2016 04:03 am
एटीएम के सामने खड़ी लंबी कतार। (Representative Image)

अन्य शहरों की तरह कोटा में भी एटीएम और बैंकों के बाहर लोगों की लंबी लाइन नकदी पाने का इंतजार करती नजर आती है। ऐसी ही एक लाइन में मैं भी रुपए हासिल करने का इंतजार कर रही थी। लोग परेशान हैं। इस परेशानी के पीछे अनेक उम्मीदें हैं। लाइन में खड़ी मैं कुछ सोच रही थी कि अचानक पीछे खड़ी एक प्रौढ़ महिला ने मुझसे पूछा कि बेटी और कितना समय लग सकता है, तो मैंने कहा कि पता नहीं। और फिर बातचीत का एक लंबा सिलसिला शुरू हो गया, जिसमें धीरे-धीरे उस लाइन में खड़े अनेक लोग हिस्सेदारी करने लगे। घर-गृहस्थी की बातों से लेकर विभिन्न बदलावों पर लोगों की राय का आना मेरे लिए एक ऐसा अनुभव था जो कोटा के प्रवास के दौरान मुझे कभी नहीं हुआ। यह भी जानने का मौका मिला कि इस बैंक में मेरे अलावा इतने और ग्राहक भी हैं जो बैंक सुविधा का प्रयोग करते हैं। ये ग्राहक एक तरफ बैंक की कार्यप्रणाली पर टीका-टिप्पणी कर रहे थे, वहीं इतनी लंबी अवधि तक काम की व्यस्तता के कारण वे बैंककर्मियों की प्रशंसा भी कर रहे थे। महगांई इतनी बढ़ गई है, बच्चों को स्कूल से लाना है, पुत्र-पुत्री-बहु आदि परिवारीजनों के साथ संबंधों का अतीत और वर्तमान कैसा है जैसे विषयों को छूता हुआ यह वातार्लाप एक ऐसे रास्ते की तरफ बढ़ रहा था जिसमें अनौपचारिकता और भावनात्मकता का पुट था। कोई न तो किसी की जाति पूछ रहा था और न ही धर्म।

मुझे इस समय विलियम जे वाइट की ‘स्ट्रीट कॉर्नर सोसायटी’ याद आ रही थी, जिसमें लोग थोड़े समय के लिए मिलते हैं, पर वही थोड़ा समय संबंधों को आकार देता हुआ निकल जाता है। सामाजिक संबंधों का यह रूप एक सुखद अनुभव था। मुझे लगा कि कोटा जैसे शहर में, जहां भविष्य की तलाश करते हुए बच्चे आत्महत्या कर लेते हैं, क्या ऐसे क्षेत्रीय समूह बनाए जा सकते हैं जो नियमित रूप से इन बच्चों के साथ संबंधों के दायरे में प्रवेश करे और उन्हें अकेलेपन के अहसास से मुक्ति दिलाने की कोशिश करें। बैंकों के सामने खड़ी ये लंबी कतारें एक सामाजिक प्रयोग भी हैं जो लोगों को एक दूसरे के नजदीक लेकर आई हैं। सहमति और असहमति, समर्थन और विरोध, परिवार की भावुकता और नितांत रूखे होते जा रहे कुछ संबंधों के प्रति वितृष्णा और तटस्थता के भाव लोगों को एक दूसरे के साथ न केवल जोड़ रहे हैं, बल्कि सुख-दुख बांटने की उस शैली की याद दिला रहे हैं जो नगरों और महानगरों से लगभग गायब हो चुकी है। मुझे यही अहसास हुआ कि मैं उन अधिकतर ग्राहकों को नहीं जानती और न ही चेहरे से पहचानती हूं जो मेरी तरह इस बैंक में आते-जाते हैं। क्या ही अच्छा हो कि बैंक अपने इन ग्राहकों को किसी एक दिन इकट्ठा कर उनसे बैंक की कार्यप्रणालियों के बारे में जाने और उनसे सीधा अनौपचारिक वातार्लाप करे। लाइन में खड़े लोग उस जनशक्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं जो अनेक बदलावों की न केवल साक्षी रही है, बल्कि यह आने वाले समय में अनेक बदलावों को सामने लाने की हिम्मत भी रखती है।

दूसरी ओर, नोटबंदी ने पारिवारिक संबंधों में तनाव और बिखराव को भी पैदा किया है। भारतीय परिवारों में घरेलू बचत झूठ पर आधारित है, लेकिन यह झूठ सकारात्मक प्रकृति का है। परिवार के सदस्यों ने एक-दूसरे से छिपा कर और झूठ बोल कर अपने पास रुपयों को बचत के रूप में इकट्ठा किया। विभिन्न त्योहारों, विवाह, जन्मदिन यहां तक कि मृत्यु जैसे अवसरों पर भी जो राशि मिलती थी उसे बचत के रूप में छिपा कर रखा जाता था, ताकि विभिन्न अवसरों पर उसे काम में लिया जा सके। इस बचत को बड़े और नए नोटो में बदलने की भावना भी रहती थी। अचानक हुई नोटबंदी ने इस बचत के रूप में अनेक झूठ सामने ला दिए। मैं एक उदाहरण देती हूं। कोटा में एक पुत्र ने अपने पिता से किसी काम के लिए नोटबंदी से पहले ही दो लाख रुपए की मांग की। पिता ने बेटे की प्रवृत्ति को जान कर यह कहा कि उनके पास केवल पचहत्तर हजार रुपए हैं। पुत्र ने कहा ठीक है, वह खुद इंतजाम कर लेगा, उन्हें चिंता करने की जरूरत नहीं है। लेकिन जिस दिन नोटबंदी हुई, उस दिन पिता को अपने पुत्र को बताना पड़ा कि उनकी बचत राशि लगभग आठ लाख रुपए है। परिणाम यह हुआ कि पिता-पुत्र के बीच औपचारिक बातचीत भी बंद है।
एक समाजशास्त्र के विद्यार्थी के रूप में भी मुझे लगता है कि नोटबंदी के प्रभाव सामाजिक संबंधों में एकजुटता और संघर्ष दोनों को उत्पन्न कर रहे हैं और साथ ही लोगों को उस सामूहिक शक्ति का अहसास दिला रहे हैं, जो बदलाव लाने की बुनियादी शर्त हुआ करती है।

 

 

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