May 26, 2017

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दुनिया मेरे आगेः जिम्मेदारी का घड़ा

गरमी की तपन बढ़ने के साथ ही वैसे लोगों की याद आना लाजिमी है जिन्होंने कभी तालाब बचाने की बात की तो कभी कुएं को जिंदा रखने की।

Author May 11, 2017 02:02 am
गरमी की तपन के साथ ही सबसे पहले गले को चाहिए ठंडा पानी, लेकिन जब मैंने पानी बचाया ही नहीं तो मुझे मिलेगा कहां से!

मनोज कुमार

गरमी की तपन बढ़ने के साथ ही वैसे लोगों की याद आना लाजिमी है जिन्होंने कभी तालाब बचाने की बात की तो कभी कुएं को जिंदा रखने की। अपने वक्त से बहुत आगे की सोचने वाले एक वे लोग थे और एक हम हैं कि कल की भी सोच पाने में समर्थ नहीं हैं। मध्यप्रदेश की जिस राजधानी भोपाल में मैं रहता हूं, वह ताल और तलैया की नगरी मानी जाती रही है। इससे छलकता पानी बरबस हमें सम्मोहित कर लेता है। लेकिन सिर्फ पच्चीस-तीस किलोमीटर दूर चले जाने पर वही भयावह सूखा दिखता है। गरमी की तपन के साथ ही सबसे पहले गले को चाहिए ठंडा पानी, लेकिन जब मैंने पानी बचाया ही नहीं तो मुझे मिलेगा कहां से! यह सोचते हुए मन घबरा जाता है। सोचता हूं कि मेरे जैसे और भी लोग होंगे। प्यासे और पसीने से तर-ब-तर। ऐसे में मुझे अचानक लाल कपड़ों में लिपटे घड़ों की याद आ जाती है। वे दूर से ही अपनी ओर बुलाते हैं। मैं बरबस उनकी तरफ खिंचा चला जाता हूं। घड़े के भीतर से पानी की दो बूंद गले से उतरते ही जैसे मन खिल उठता है।

ऐसा करते समय एक सवाल मन में यह उठता है कि घड़ा तो तपती दोपहरी में भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है, लेकिन मैं अपनी जिम्मेदारी से क्यों बच रहा हूं! माना कि जल का संकट है, लेकिन इतना तो कर ही सकता हूं कि राहगीरों के लिए दो घड़े पानी रख दूं। जिम्मेदारी का घड़ा रखने का खयाल मन में सहज भाव से आता है। साथ में यह भी सोचता हूं कि मैं तो जिम्मेदारी का घड़ा उठाने के लिए तैयार हूं ही, औरों को भी इसके लिए प्रेरित करूंगा। यह घड़ा न केवल राहगीरों की प्यास मिटाएगा, बल्कि वह कई समस्याओं का समाधान करेगा। यह तो सच है कि प्यास लगेगी तो पानी पीना ही पड़ेगा। यह पानी उस घड़े का ठंडा पानी हो या और किसी स्रोत से।

जब और किसी स्रोत की बात करते हैं तो एक ही विकल्प दिखता है बाजार का पानी। बाजार के पानी का मतलब छोटे पाउचों में या बोतलबंद बिकता पानी। दो या तीन रुपए के पाउच का पानी और पंद्रह या बीस रुपए के बोतलबंद पानी के विकल्प में किसी के सामने चुनाव का विकल्प हो तो दो रुपए का पाउच ही सस्ता सौदा साबित होता है। लेकिन आमतौर पर विकल्प नहीं होता। एक गिलास पानी के लिए पंद्रह रुपए जेब से ढीला करना गवारा नहीं और फिर उसे साथ लेकर चलने की मुसीबत अलग से। सो किसी के लिए भी यह आसान होता है कि दो रुपए का पाउच लिया, हलक में उसका पानी उतारा, जहां मर्जी फेंका और आगे निकल गए।

राहगीर को रास्ते में जिम्मेदारी के पानी से भरा घड़ा मिल जाए तो उसे विकल्प की तरफ भागना नहीं होगा। वह अंजुरी में पानी भर कर न केवल पिएगा, बल्कि हथेलियों में उलझी बूंदों से चेहरे को भी ठंडक दे पाएगा। क्या पाउच या बोतलबंद पानी में वह ऐसा कर पाएगा? शायद नहीं। इसके अलावा, यह घड़ा नहीं होगा तो राहगीर के भीतर बाजार का भाव आएगा। वह इस गुमान में होगा कि मोल चुका कर उसने पानी खरीदा है तो वह मर्जी से और सीमित तरीके से खर्च करेगा। यानी पानी बचाने की भावना तो उसके भीतर आएगी नहीं और बेपरवाह अलग हो जाएगा। अपनी इसी बेपरवाही में वह पानी का पाउच उपयोग करने के बाद यों ही सड़क पर फेंक कर चलता बनेगा। इस प्लास्टिक के पाउच से होने वाले नुकसान का वह अंदाजा भी नहीं लगा पाता है, क्योंकि उसने जिम्मेदारी का घड़ा उठाया ही नहीं है। उसके भीतर पानी बचाने की भावना पैदा करनी है और जिम्मेदार बनाना है तो पुरखोंं के जमाने से चले आ रहे प्याऊ की परंपरा को जिंदा करना होगा। यह सच है कि यह परंपरा अभी पूरी तरह खत्म नहीं हुई है, लेकिन सहज और सुविधा के बाजार ने इसे छीन लेने के लिए जाल जरूर फैला दिया है।

बढ़ती गरमी के साथ स्कूलों से बच्चों की छुट्टियां शुरू हो चुकी हैं या होने वाली है। उन्हें भी खाली वक्त का सदुपयोग करना सिखाया जाना चाहिए। तो उन्हें एक-एक घड़ा पानी भरने का काम सौंप दीजिए। शर्त यही है कि इसमें उनका साथ हमको भी देना होगा। बच्चों को जब हम जिम्मेदारी का घड़ा उठाना सिखा रहे होंगे, तब हम उनके भीतर एक बेहतर मानवीय आदत के बीज डाल रहे होंगे। यही नहीं, पानी के साथ पर्यावरण स्वच्छता का पाठ भी हम उन्हें पढ़ाते हैं। टेलीविजन और मोबाइल से इतर भी एक दुनिया है, जहां जिम्मेदारी के घड़े के साथ हम बच्चों को उसमें प्रवेश दिला सकते हैं।

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First Published on May 11, 2017 2:02 am

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