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दुनिया मेरे आगेः चलनी दूसे सूप को

समकालीन दुनिया के वक्तव्य-वीरों का तुमुल कोलाहल परवान चढ़ा हुआ है।
Author April 22, 2017 03:58 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

देवशंकर नवीन

समकालीन दुनिया के वक्तव्य-वीरों का तुमुल कोलाहल परवान चढ़ा हुआ है। हर कोई अपनी पाक-साफ नीयत का ढिंढोरा पीटने में जोर-शोर से लगा हुआ है। उनकी राय में देश का हर मनुष्य बेईमान, भ्रष्ट और अनैतिक है; बस वही एक हैं, जो नैतिक हैं। इन उद्घोषणाओं के कारण तीस-पैंतीस बरस पूर्व अपने साथ घटी एक घटना इन दिनों बहुत सताने लगी है। उन दिनों सहर्षा कॉलेज में आइएससी में पढ़ता था। दिन चढ़ते ही उस दिन सब्जी बाजार से गुजर रहा था। सोचा, कुछ साग-सब्जी खरीदता चलूं! हालांकि वहां खरीद-बिक्री शाम में शुरू होती थी। लेकिन मेरी तरह कोई भूले-भटके ग्राहक आ जाते, तो वे निराश नहीं लौटते थे। ‘सगुनिया’ ग्राहक समझ कर दुकानदार उन्हें सामान देने से हिचकते नहीं थे। सारे दुकानदार पूरे दिन अपने पेशागत शिष्टाचार में व्यस्त रहते थे। आकर्षक ढंग से दुकान सजाते थे। बासी और सूखती हुई सब्जियों को ताजा बना कर पेश करना कोई साधारण काम तो होता नहीं! मनुष्य हो या वस्तु, उम्र बदलना धर्म-ईमान बदलने से कहीं अधिक कठिन होता है।

एक दुकानदार के पास जाकर मैंने पूछा- ‘भई, परवल कैसे’, तो उन्होंने कहा- ‘चार रुपए धरी’ (पांच किलो को एक धरी या पसेरी कहते हैं)! मैं आगे बढ़ गया, सोचा, शायद आगे कोई इससे सस्ता दे दे! एक दुकानदार थोड़े अधिक उद्यमी लग रहे थे। पूरे परिवार के लोग दुकान सजाने की प्रक्रिया में तल्लीन थे। अन्य दुकानदारों की तरह वे भी परवल, भिंडी, तोरी जैसी हरी सब्जियां एक बड़ी-सी नाद में गहरे हरे रंग में मनोयोग से रंग रहे थे। बैंगन के डंठल को हरे रंग में रंग कर पहले ही ताजा बनाया जा चुका था। उनकी पत्नी किनारे बैठ कर चिकनाई सने कपड़ों से पोंछ कर बासी और सूखे हुए बैंगनों को चमकदार बना रही थीं। मैंने दुकानदार से पूछा- ‘परवल कैसे’ तो उसने कहा- छह रुपए धरी! मैंने कहा- ‘पीछे के दुकानदार तो चार रुपए धरी दे रहे हैं!’ दुकानदार ने मेरा उपहास करते हुए कहा- ‘आगे जाइए, तीन रुपए धरी भी मिल जाएगा। रंगा हुआ परवल तो सस्ते में मिलेगा ही!’
परवल रंगने के इस कौशल को सुधीजन जरा मुहावरे की तरह इस्तेमाल करें तो जीवन की हर चेष्टा में इसके उदाहरण मिल जाएंगे। ‘परवल रंग कर बेचना’ उस दुकानदार की नजर में बेशक अनैतिक था, लेकिन औरों के लिए, खुद के लिए नहीं। वे तो इस काम को बेफिक्री से कर रहे थे, गोया उनके लिए वह परम नैतिक हो। अपने ललाट पर उग आया गूमर किसी को दिखता कहां है!
सोचता हूं कि वही दुकानदार रात को सौदा-सुलूफ के बाद जब अपने घर पहुंचते होंगे और खरीदे हुए दाल-चावल में कंकड़ की मिलावट पाते होंगे, तो क्या उन्हें अपने अनैतिक आचरण पर क्षोभ होता होगा। निश्चय ही नहीं। हुआ होता तो आज हमारे नागरिक इतने अनैतिक कामों में लिप्त नहीं होते। विगत सत्तर वर्षों की आजादी का वातावरण देख कर हर व्यक्ति आज अनैतिकता के विरुद्ध भाषण करने में परिपक्व हो गया है, जिसे देखें, वही दूसरों पर अंगुली उठाए खड़ा मिलता है। अध्यापक कहते हैं डॉक्टर बेईमान हैं; डॉक्टर कहते हैं इंजीनियर बेईमान हैं; इंजीनियर कहते हैं राजनेता बेईमान हैं; राजनेता कहते हैं जनता बेईमान हैं। बेईमानों की यह रिले-रेस बदस्तूर चल रही है। किसी भी महकमे का अधिकारी नागरिक खुद किसी अनैतिक आचरण से बाज नहीं आता; दूसरों के आचरण की पहरेदारी करता रहता है।

बेशुमार धन उगाहने के चक्कर में आज की पीढ़ियां विवेक और नैतिकता से पूरी तरह बेफिक्र हैं। बेफिक्री का यह प्रशिक्षण उन्हें अपने परिवार में मिलता है। धनार्जन का प्रशिक्षण आज के बच्चे विद्यालय में पाएं या पारंपरिक पद्धति के घरेलू व्यवहार से; वे इसी निर्णय पर पहुंचते हैं कि उन्हें हर हाल में अधिक से अधिक धन कमाना है। उपार्जन की प्रतिस्पर्द्धा में वे पल-पल जमाने से होड़ लेना सीखते हैं। विवेक और नैतिकता जैसे निरर्थक शब्द कभी उनके सामने कभी फटकते ही नहीं।

सब्जी बेचने वाले की उक्त कहानी एक मामूली-सा उदाहरण है। सच यह है कि भारत का हर उपभोक्ता आज जीवनयापन की अधिकतर चीजें खरीदते समय उनकी गुणवत्ता को लेकर सशंकित रहता है। जीवन-रक्षा की अनिवार्य वस्तुएं- अनाज, पानी, दवाई तक की शुद्धता पर आज कोई आश्वस्त नहीं होता, क्योंकि लोग खुद किसी न किसी ठगी का जाल रचते रहते हैं। कसाई के हाथों अपनी बूढ़ी-बिसुखी गाय बेच लेने के बाद लोगों को गो-भक्ति याद आती है। जिस देश की धार्मिक-प्रणाली में प्रारंभिक काल से हर जीव-जंतु से प्रेम करने का उपदेश दिया जाता रहा है, वहां की लोकतांत्रिक व्यवस्था में ईश्वर से भी छल कर लिया जाता है। प्रयोजन से बाजार जाना और शंकाकुल मन से कुछ खरीद कर वापस आना, आज हर नागरिक की नियति बन गई है। कमजोर क्रय-शक्ति के उपभोक्ता अपनी अक्षमता के कारण निश्चय ही दोयम दर्जे की चीजें खरीदते हैं, लेकिन आहार/औषधि जैसी जीवन-रक्षक वस्तुओं में तो धोखाधड़ी न हो! दूध, पानी, दवाई, अनाज, घी, तेल, मसाले की गुणवत्ता पर तो सशंकित न रहे!

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