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दुनिया मेरे आगेः स्वच्छता का ठौर

हाल ही के सर्वेक्षण के बाद मध्यप्रदेश के कुछ शहर देश के स्वच्छ शहरों में शुमार हुए हैं। भोपाल उनमें से दूसरा है और इंदौर पहला।
Author May 19, 2017 03:07 am

सुनील मिश्र

हाल ही के सर्वेक्षण के बाद मध्यप्रदेश के कुछ शहर देश के स्वच्छ शहरों में शुमार हुए हैं। भोपाल उनमें से दूसरा है और इंदौर पहला। इंदौर को मिनी मुंबई भी कहा जाता है, जहां उसी तरह की सुंदरता, भव्यता और आधुनिकता का प्रतिबिंब देखने को मिलता है। भोपाल का दूसरा साफ शहर चुना जाना सचमुच किसी भी भोपाली के लिए खुशी की बात हो सकती है। आखिर क्यों न हो! वह उस शहर का बाशिंदा है, जो गंगा-जमुनी तहजीब से भरा है। मूर्धन्य शायरों के जन्म और फिर कर्मस्थली, एशिया की सबसे बड़ी मस्जिद ताजुल मस्जिद। फिर भोपाल ताल से न जाने कितने सौ तालाब भोपाल की पहचान हैं। भोपाल की विरासत उसकी अस्मिता के साथ ही विस्तीर्ण हुई है। यह जानना दिलचस्प होगा कि जब देश के सात राज्यों उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंधप्रदेश, ओडिशा और बिहार के हिस्सों को मिला कर मध्यप्रदेश का निर्माण 1956 में किया था, तब भोपाल मध्यप्रदेश की राजधानी बना था। यहां राज्य सरकार का सचिवालय और अनेक शासकीय कार्यालय स्थापित हुए थे। तब देश के इन्हीं सात राज्यों से लोग यहां आए थे और अपना घर बनाया था। यहीं सब एक-दूसरे के पड़ोसी हुए। रिश्ते-नाते बने। सुख-दुख मिल कर बांटे। एक-दूसरे के लिए कपड़े और स्वेटर बना कर पहनाए। घर और हुनर की सब्जियां बना कर खिलार्इं, पकवान बना कर खिलाए। सब तीज-त्योहार मिल कर मनाए। इन सबकी एक यात्रा है, अनवरत, जिसमें परिष्कार शामिल है, समय-समय पर हुआ परिमार्जन शामिल है।

स्वच्छ शहरों में दूसरे नंबर पर शुमार किए जाने के पहले भोपाल अनेक उतार-चढ़ावों से गुजरा है। इस शहर ने गैस त्रासदी जैसी भयावह दुर्घटना को झेला और जिया है। हर उम्र ने सड़क पर बदहवासी देखी है। बहुत धीरे-धीरे जाकर यह दुख कम हुआ है। यह शहर रंगपंचमी के जुलूस से लेकर ईद के त्योहार की मिठास को बराबरी से आदर और मान देता है। शहर की रचनात्मक धारा, सांस्कृतिक जागरूकता हमेशा मौलिक और चित्ताकर्षक वातावरण के साथ विद्यमान रहती है। यहां एक ओर जनजातीय संग्रहालय, शौर्य स्मारक, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मानव संग्रहालय, राज्य संग्रहालय जैसे विरासत और मानवीय अस्मिता का बोध कराने वाले केंद्र हैं, वहीं भारत भवन, रवींद्र भवन, शहीद भवन जैसे सांस्कृतिक सभागार अपनी सक्रियता के नित नए प्रमाण देते हुए।

भोपाल का नगर निगम सचमुच पिछले कुछ समय में आधुनिकीकरण, जिम्मेदारियों, तत्पर और उत्तरदायी ढंग से कार्य निर्वाह का एक मानक बन कर उभरा है। अब मुहल्लों में घर-घर जाकर कचरा नगर निगम की गाड़ियां और उनके कर्मचारी जमा करते हैं। कचरे को यहां-वहां फेंकने के बजाय थैलियों में रख कर ट्रॉली और साइकिल रिक्शा में सुबह एक बार दे दीजिए और अपना घर और परिवेश साफ रखिए। निर्देशों के पालन और प्रगति पर तत्पर निगाह रखने के कारण ही शहर में सड़कें और मुहल्ले साफ हैं और आवश्यकतानुसार रात में रोशनी के सुव्यवस्थित इंतजाम हैं।

स्वच्छता का मानस या उसका बोध दरअसल मानवीय चेतना और सजगता का एक अहम हिस्सा है। हम हमेशा किसी भी मुसीबत या शिकायत के लिए सरकार और व्यवस्था को आड़े हाथों लेना नहीं चूकते, लेकिन सही बात यह है कि बहुत सारी बनी-बनाई व्यवस्था, साफ-सुचारु परिवेश और वातावरण को बिगाड़ने का काम हम ही शुरू करते हैं। गंदगी और कचरा फेंकने के मामले में यह बात बहुत बनी-बनाई है और जग-प्रमाणित है। मुझे याद है, एक बार प्रसिद्ध फिल्म लेखक, पटकथा और गीतकार जावेद अख्तर ने मेरे एक प्रश्न के उत्तर में कहा था कि हम किसी रेस्टोरेंट में जाकर बैठते हैं तो हमें मेज साफ-सुथरी मिलती है, सब चीजें व्यवस्थित और करीने से रखी होती हैं, चारों तरफ खुशनुमा वातावरण मिलता है। ऐसे में हमारा फर्ज बनता है कि उस स्थान को सलीके से बरतें, ताकि हमारे बाद जो यहां आकर बैठें, वे इस बात के लिए हमारे प्रति अच्छी भावना रखें कि हम उन्हें एक अच्छा वातावरण उपलब्ध करा कर गए हैं।

उन्होंने कहा कि यही जीवन के साथ भी लागू होता है, हमारे दुनिया में आने और जाने के संदर्भ में भी। यह खूबसूरत और स्वच्छ दुनिया हमारे पूर्वजों ने जिस सुंदरता के साथ भेंट की है, हम जब यहां से जाएं तो इसे इतना ही खूबसूरत और साफ-सुथरा करके जाएं, ताकि हमारे बाद जो इस दुनिया का हिस्सा हों, उनके मन में हमारे प्रति कोई तल्खी न हो। इस स्वच्छ शहर का नागरिक होते हुए मेरे दिमाग में यह बात एक नैतिक जिम्मेदारी के साथ रह-रह कर कौंधती है। मुझे इस बात का बोध हो गया है कि मैं अपना कचरा मुट्ठी में बंद रखता हूं, यहां-वहां नहीं फेंकता। भोपाल इसीलिए स्वच्छ और साफ दिखता है कि यह मेरे अकेले भर का बोध नहीं, सभी भोपालियों का हो गया है।

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