June 26, 2017

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दुनिया मेरे आगेः विचार बनाम बंदिशें

विचार की दुनिया में जब राजनीति का दखल होता है तो अमूमन हर पक्ष के लिए जगह धीरे-धीरे सिकुड़ने लगती है।

Author April 14, 2017 03:15 am
अभिव्यक्ति और आजादी के सामने कुछ अनजानी बाधाएं आ खड़ी होती हैं।

विचार की दुनिया में जब राजनीति का दखल होता है तो अमूमन हर पक्ष के लिए जगह धीरे-धीरे सिकुड़ने लगती है। अभिव्यक्ति और आजादी के सामने कुछ अनजानी बाधाएं आ खड़ी होती हैं। कुछ समय पहले दिल्ली विश्वविद्यालय के एक कॉलेज में अकादमिक चर्चा पर एक छात्र संगठन ने सवाल उठाए और वह विवाद हिंसा में तब्दील हो गया। इसके चलते तब कई दिनों तक विश्वविद्यालय परिसर एक छावनी में तब्दील हो गया था। जिस जगह पर आने के बाद हम छात्र-छात्राएं मुक्ति और स्वतंत्रता का अनुभव करते थे, वह अचानक से ऐसी जगह बन गई, जहां हमें हर पल संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा था। अपने मित्र के साथ चलते समय सिपाहियों की नजरों से गुजरना ऐसा लग रहा था, जैसे सदियों से समाज के लगाए गए बंधन मुझे सिपाहियों की नजरों से सामने आ खड़े होने का अहसास करा रहे हों।

हमेशा से विश्वविद्यालय परिसर का उन्मुक्त वातावरण सोचने, बोलने और खुद के मनुष्य रूप में होने और बराबरी के मोर्चे पर खड़ा होने का अहसास करता रहा है। हालांकि यह अहसास बेहद आत्मिक है। मैं नहीं जानती कि बाकी छात्र-छात्राएं इस मसले पर किस तरह का विचार रखते हैं। लेकिन जब-तब भी हम अपने परिसर में अलग-अलग पृष्ठभूमियों से आए मित्रों से घंटों बैठ कर देश दुनिया से लेकर घर, परिवार, रिश्ते, प्रेम, घृणा, आचार-विचार, दुराचार, अपराध, रीति-रिवाज, समाज और व्यक्तियों के जटिल मुद्दों पर बहसें करते थे और अपनी समझ को अपने संगी-साथियों द्वरा लाए नए तरह की जानकारी और ज्ञान से जोड़ते थे। तब लगता था जैसे हर बहस के बाद हम कुछ विकसित हो गए हों, जैसे हमारे पास अपनी भी अभिव्यक्ति है, जिसे हम सभी दोस्त एक समूह में साझा कर सकते हैं। दूसरों की अभिव्यक्तियों से दुनिया में फैले विस्तार को हम जानते थे।

समूह में होने वाली यह चर्चा एक स्त्री के रूप में मुझे विकसित होने और मेरे व्यक्तित्व को फैलने का मौका देती थी। हमेशा हम लड़कियां घरों में होने वाले अलग-अलग तरह के लैंगिक-भेद को समूहों में लाती थीं और उन पर खूब जम कर चर्चा करती थीं। इस तरह की चर्चा और अभिव्यक्ति के लिए जगह इस विश्वविद्यालय परिसर ने हमें दिया था। लेकिन पिछले दिनों हुई घटना ने विश्वविद्यालयों में अभिव्यक्ति के मुद्दे को बहस के केंद्र में ला खड़ा किया है। दूसरी बात यह कि अपनी उच्च शिक्षा के पाठ्यक्रम में कक्षाओं में हुई चर्चा और अध्ययन में हम यह जानते रहे कि विश्वविद्यालय एक ऐसा स्थान है, जहां ज्ञान पैदा किया जाता है। अलग-अलग विचारों को पैदा होने का मौका मिलता है, उन्हें जानने, समझने और उन पर गंभीर चर्चा करने का मौका मिलता है। संभवत यही कारण रहा होगा जो मुझे मार्क्स के वर्ग-भेद के सिद्धांत के बारे में जानने का मौका मिला। फासीवाद की तानाशाही से लेकर समाज के विकास और राजनीतिक उथल-पुथल के दौर के अलग-अलग पहलुओं से रूबरू हुई। इसके अलावा, अपने लिए सबसे अहम यह समझने में मदद मिली कि स्त्रीवादी विचारों को दुनिया में किन आंदोलनों ने जगह दी। इसलिए विश्वविद्यालय की संकल्पना में स्वायत्तता की अवधारणा को महत्त्व दिया जाता है। मगर पिछले दिनों जिस तरह का माहौल परिसर में था, वह डर पैदा करता था। हर रोज पता चलता कि आज पांच सौ या तीन सौ सैनिक यहां तैनात हैं। दोनों ओर से सैनिकों से घिरी सड़क किसी संवेदनशील इलाके में तब्दील हुई लगती थी और खुद को किसी संदिग्ध की तरह होने का अहसास कराती थी।

उन दिनों मेरे मन में कश्मीर, छत्तीसगढ़, झारखंड और पूर्वोत्तर के उन संवेदनशील इलाकों का चित्र उभर रहा था जो हर समय किसी भी प्रकार की हिंसा के चलते हाई-अलर्ट पर रहते हैं। हमेशा सुरक्षा की दृष्टि इन इलाकों की सड़कें सिपाहियों से घिरी रहती हैं। ऐसे माहौल में जीवन को जानना और सीखना कैसे होता होगा! संविधान में वर्णित समानता, स्वतंत्रता जैसे विचार अपने लिए पता भी होते होंगे! और अगर पता भी होते होंगे तो कितने बेमानी लगते होंगे! क्या वैसे इलाकों में छात्र-छात्राएं आपस में घंटों सड़क के किसी भी छोर पर बहस करते समय धारा-144 के खौफ से आजाद रह पाते होंगे!

ऐसे कितने ही सवाल थे जो उस पूरी घटना के बाद से मन में अक्सर आने लगते हैं। सोचती हूं दुनिया में जितने भी बड़े विचारक हुए हैं, वे उन विचारों को आगे ला पाए, क्योंकि वे बिना किसी के भय और प्राधिकार के दबाव से परे सोच सके होंगे, उन पर चर्चा कर पाए होंगे। अगर आज कुछ विचारधाराएं अपने से असहमत विचारों को अभिव्यक्त होने से रोक रही हैं और अगर यही प्रवृत्ति आम व्यवस्था में घुलती है तो क्या हम अंदाजा लगा सकते हैं कि हमारे सामने विचार की क्या जगह होगी? फिर विचारों से हीन वह कैसी दुनिया होगी?

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First Published on April 14, 2017 3:15 am

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