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दुनिया मेरे आगेः कला का वैभव

चित्रकला के प्रति मनुष्य का प्रेम आदिकाल से रहा है। वह शुरू में पेड़-पत्तों और पत्थरों पर आड़ी-तिरछी रेखाओं से आकार उकेरा करता था।
Author September 16, 2017 02:49 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

चंद्रकांता शर्मा

चित्रकला के प्रति मनुष्य का प्रेम आदिकाल से रहा है। वह शुरू में पेड़-पत्तों और पत्थरों पर आड़ी-तिरछी रेखाओं से आकार उकेरा करता था। धीरे-धीरे मानव समाज के विकास ने भी चित्रकला को नए-नए मोड़ दिए और वह बहुत ही चित्ताकर्षक रूप में आज हमारे बीच मौजूद है। भारतीय चित्रकला को खास संरक्षण राजाओं के शासन काल में सबसे ज्यादा मिला और यह अनेक संग्रहालयों में आज भी सुरक्षित है। देश, शासन और सामयिक स्थितियों से हमारी चित्रकला अछूती नहीं रही है और हर काल में नए-नए रूप में परिवर्तन के साथ चलती रही है। यह चित्रकला ही है जिसमें भारतीय संस्कृति का संपूर्ण सांस्कृतिक परिदृश्य ऐतिहासिकता के साथ दिखाई देता है। राजस्थान तो मानो कला का घर है। यहां की कला सम्पदा का प्राचीनकाल बहुत अनूठा और सुनहरा रहा है।
भित्ति चित्रों की परंपरा यों तो पूरे भारत में रही है, लेकिन राजस्थानी कला में भित्ति चित्रों की बात ही कुछ और है। राजस्थान में शेखावटी संभाग में हवेलियों की दीवारों पर बनाए गए ये चित्र आज भी हमारी भित्ति चित्रकला परंपरा की अनूठी धरोहर है।

वहां चित्र कुंओं-बावड़ियों, हवेलियों और मंदिरों की दीवारों पर बहुत ही भव्य और नयनाभिराम रूप में करीब अठारहवीं सदी से नियमित रूप से बनाए जाते रहे हैं। इनके विविध विषयों में तत्कालीन सामाजिक, राजनीतिक और ऐतिहासिक विषयों को प्रमुखता दी गई है। राज्याश्रय में राजप्रासादों की दीवारें इन चित्रों की परंपरा से ढक दिया गया और आज भी वे दर्शनीय हैं। उनमें आमेर और बैराठ की भित्ति चित्रकला की परंपरा को प्रमुखता मिली। उसमें राजपूत और मुगल शैली के सम्मिश्रित चित्रों में मिले सुरापान का वातावरण, शिकार, राजप्रासादों के शयन कक्षों की दृश्यावलियां जीवंतता के साथ रंगों से बनाई गई हैं। चूंकि कछवाह राजाओं का संबंध मुगल शासकों से रहा है और खंडेला शेखावटी के रायसल दरबारी भी उनके करीबी थे, इसलिए कलाओं का आदान-प्रदान भी इन राजघरानों में सत्रहवीं शताब्दी के बाद खूब हुआ।

सीकर, झुंझुनूं, नवलगढ़, रामगढ़ की अनेक विशाल और प्रसिद्ध हवेलियों की दीवारों और छतरियों पर जो भित्ति चित्र आज भी उपलब्ध हैं, उनमें राजसी आमोद-प्रमोद, मनोरंजक सामाजिक व्यवस्था, धार्मिक परंपराओं का मुखर अंकन और महाभारत-रामायण के अनेक कथानकों का पारंपरिक रूप में अंकित किया गया है। ऐसे अनेक चित्र हैं जिनमें यहां के रण-बांकुरों की बहादुरी की शौर्यगाथा का बखान करते हैं।

सबसे अचंभे की बात यह है कि ये कलाकार निरक्षर होने के बाद भी समसामयिक स्थितियों को कितनी सूक्ष्मता के साथ चित्रित कर सके हैं। जिन रंगों के तालमेल से ये अमिट चित्र बनाए गए हैं, वे हालांकि कमोबेश रूप में मिटने लगे हैं, लेकिन अनेक स्थानों पर ऐसा लगता है, जैसे चित्र अभी बनाए गए हों। इनमें बेलबूटों के साथ राजा-रानी, राधा-कृष्ण का आमोद-प्रमोद और संत कवियों का धर्म दर्शन बहुत ही बारीकी के साथ सुनहरी कलम से उकेरा गया है। अनेक चित्रों में अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भी जन सामान्य में जोश भरने के उद्देश्य से दीवारों पर चित्र बनाए गए। वैज्ञानिक और औद्योगिक विकास को भी बताने का प्रयास किया गया है। उस समय चलने वाली रेलगाड़ियों, हवाई जहाजों और पहनावे में आई तब्दीलियों को उन लोक कलाकारों ने बखूबी से चित्रित किया है।
रामगढ़ सेठों की पोद्दारों की छतरियों में राग-रागिनी और बारहमासा को पूरी तरह बनाया गया है।

इन्हें बनाने में कितना समय और धन व्यय हुआ होगा, यह अकल्पनीय है। कला के प्रति उनका कितना रुझान और आकर्षण था, यह इन भित्ति चित्रों को देखने पर पता चलता है। काले और लाल रंगों से बने अनेक चित्रों की रागात्मकता इतनी महीन है कि आंखें खुली रह जाती हैं। अनेक चित्रों में प्राचीन वीरता और प्रणय के प्रसंगों को कथात्मक रूप में बनाया गया है। उस समय का रहन-सहन, खान-पान, पहनावा और सामाजिक संस्कृति को लोककला की उच्च परंपरा के साथ बहुत ही सुघड़ता से दीवारों पर चित्रित किया गया है।
शेखावाटी में यह परंपरा मंदिरों में भी बहुतायत से है। लगभग सभी मंदिरों में भित्ति चित्रों की अटूट कतार है, जिससे ये स्थान मनोरम, दर्शनीय और कलात्मक रूप में नयनाभिराम लगते हैं। अनेक हवेलियां ऐसी हैं, जिनका सामने का पूरा भाग भित्ति चित्रों से अटा हुआ है और आंतरिक कक्षों में कमरों के हिसाब से चित्रों को बनाया गया है। प्रणय भाव भी इन चित्रों में बहुलता से बनाया गया है। ढोला-मारू, हीर-रांझा, जलाल-बूबना आदि अनेक प्रेमाख्यानों को कलाकारों ने बहुत ही अनुपम तरीके से बना दिया है।

शेखावटी की भित्ति चित्रकला का स्थान बड़ा ही ऊंचा है और ये चित्र आज भी जीवंत हैं। लेकिन मौसमी थपेड़ों के बीच उचित संरक्षण और रख-रखाव के अभाव में ये चित्र उखड़ और मिट रहे हैं। इस अमूल्य धरोहर को बचाने की आवश्यकता है, क्योंकि ये सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक थाती की ऐतिहासिक गाथा खुद में समेटे हुए हैं। शेखावटी के इस कलात्मक वैभव को संरक्षण की जरूरत है, अन्यथा एक सांस्कृतिक इतिहास नष्ट होने की तैयारी में है।

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