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दुनिया मेरे आगेः काबिलियत की कसौटी

कहां काम करती हो, रहती कहां हो, अपना फ्लैट लिया है क्या, कितनी तनख्वाह है...! सब तो बहुत बढ़िया है!
Author July 14, 2017 02:51 am
मैच के दौरान शॉट लगातीं भारतीय महिला क्रिकेट टीम की कप्तान मिताली राज। (Photo Courtesy : ESPN)

कहां काम करती हो, रहती कहां हो, अपना फ्लैट लिया है क्या, कितनी तनख्वाह है…! सब तो बहुत बढ़िया है! तो फिर सेटल कब होना है? पढ़-लिख कर घरों की दहलीज से बाहर निकलने और अपने भरोसे जीने वाली लड़कियों से किए जाने वाले ये बहुत आम सवाल हैं। ये देखने में लड़कियों के लिए फिक्र जताने वाली बातें हैं। लेकिन इनके मूल में देखें तो इन सवालों की तहों में छिपी एक तरह की खास रूढ़ मानसिकता है। अपना घर, अच्छी आमदनी और अपने पैरों पर खड़ी महिला से जीवन में सेटल होने यानी व्यवस्थित होने का सवाल किया जाता है और इसका मतलब यह होता है कि शादी कब करोगी, बच्चे कब पैदा करोगी, घर-परिवार को कब और कैसे संभालोगी। इन सवालों की जद में कोई साधारण पृष्ठभूमि की लड़की आ सकती है तो सानिया मिर्जा जैसी कोई जानी-मानी हस्ती भी। कुछ समय पहले महिला क्रिकेट विश्व कप चल रहा था, लेकिन कहीं उसकी चर्चा नहीं दिखी, टीवी चैनलों पर इस मसले पर विशेषज्ञों के पैनल नहीं बैठे, इन मैचों के लिए सट्टेबाजी की भी खबरें नहीं आर्इं, क्योंकि यह महिला विश्वकप क्रिकेट था।

अगर पिछले कुछ सालों का आकलन करें तो महिलाओं का प्रदर्शन अमूमन हर खेल में अच्छा रहा है। कुश्ती, बैडमिंटन, हॉकी, तीरंदाजी, तैराकी, जिमनास्टिक या फिर किसी भी खेल में महिलाओं ने पुरुषों की टीमों के मुकाबले बेहतर करके दिखाया। फिर भी उनके बारे में बात करना और उनकी उपलब्धियों को तवज्जो देना जरूरी नहीं समझा जाता। खबरों की दुनिया को चलाने वाले लोग उनकी उपलब्धियों पर बात नहीं करते, उनकी मेहनत की कद्र नहीं की जाती, बल्कि यह जानने की कोशिश होती है कि उनकी सफलता में किस पुरुष ने सहयोग किया। सानिया मिर्जा टेनिस की एक बड़ी प्रतियोगिता जीत कर आती हैं तो सवाल होता है कि आप इस कामयाबी में अपने पति को कितना श्रेय देती हैं… क्या उन्हें शुक्रिया करना चाहेंगी…! इससे इतर एक सवाल यह कि आप लाइफ में सेटल कब होंगी! किसी लड़की ने बचपन से मेहनत करके इस मुकाम को हासिल किया तो यह महत्त्वपूर्ण नहीं है, लेकिन सेटल होने का सवाल ज्यादा अहम है। यानी वह शादी कब करती है, मां कब बनती है, पति या उसके घर को कैसे संभालती है!

मिताली राज ने अपनी काबिलियत और मेहनत के बूते केवल अपने लिए रिकार्ड नहीं बनाया है, बल्कि वे भारतीय महिला क्रिकेट को नई ऊंचाई दे रही हैं। लेकिन एक महिला के रूप में उनकी काबिलियत की कद्र करने के बजाय उनसे सवाल यह हो रहा है कि पुरुष क्रिकेट खिलाड़ियों में आपका पसंदीदा खिलाड़ी कौन है। सायना नेहवाल से अक्सर सवाल किया जाता है कि सेटल कब होंगी, यानी शादी कब करेंगी। किसी भी महिला के लिए विवाह करना, मातृत्व-सुख को प्राप्त करना चुनाव है, अनिवार्यता नहीं। लेकिन उनकी मेहनत से जुड़े न कोई खयाल आते हैं, न इससे संबंधित सवाल किए जाते हैं और न सराहना के बोल सामने आते हैं। बल्कि शब्दों का ऐसा जाल फेंका जाता है कि उनकी हिम्मत उसी में उलझ कर जाए। बराबरी की बातें सिर्फ किस्सों और आदर्शों में देखने मिलती हैं। यथार्थ में इससे कोई वास्ता नहीं। यह किस तरह की मानसिकता है जहां लिंग के आधार पर भेदभाव तो होता ही है, किसी महिला की कामयाबी को दोयम दर्जा देकर उसे हतोत्साहित करने की कोशिश भी की जाती है। अगर किसी को फिल्म ह्यचक दे इंडियाह्ण के दृश्य याद होंगे तो उनसे खेलों की दुनिया में महिलाओं की पहुंच की हकीकत का अंदाजा मिलता है।

महिलाओं के खेल और प्रदर्शन को खेल संघ से लेकर परिवार के लोग तक गंभीरता से नहीं लेते हैं और अगर अपनी मेहनत से कोई मुकाम मिल जाए तो उसे कैसे नीचे खींचा जाए, इसकी हजार कोशिशें की जाती हैं। इतनी बाधाओं या रुकावटों के बावजूद इन लड़कियों के हौसले बुलंद हैं। सानिया मिर्जा उतनी ही बेबाकी से जवाब देती हैं और कहती हैं कि वे सेटल हैं अपने जीवन में और जो कुछ है, वह उनकी मेहनत और लगन के बूते है। मिताली राज खुद से किए गए सवाल के जवाब में एक सवाल पूछती हैं- ह्यक्या पुरुष खिलाड़ियों से भी ऐसा सवाल होगा?ह्ण इस तरह के जवाब लोगों की पुरुष वर्चस्व से पीड़ित मानसिकता पर करारा तमाचा हैं और एक संदेश भी कि अब इस पिछड़ी मानसिकता से बाहर आया जाए। किसी भी मुकाम पर पहुंचने पर आखिर एक महिला की काबिलियत की बात क्यों सबसे महत्त्वपूर्ण नहीं हो और उसके दूसरे-तीसरे मायने क्यों तलाशे जाएं? इस ढोंग से इतर कब यह यथार्थ में देखने मिलेगा कि आधी आबादी को पितृसत्ता से आजाद बराबरी की नजरों से देखा जा रहा है!

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