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दुनिया मेरे आगेः समझ की सीढ़ियां

किसी भी बात को समझाने का हर किसी के पास अलग-अलग तरीका होता है। उसे पक्का भरोसा होता है कि वह समझाने में सफल होगा।
Author July 22, 2017 02:46 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

आनंद भारती

किसी भी बात को समझाने का हर किसी के पास अलग-अलग तरीका होता है। उसे पक्का भरोसा होता है कि वह समझाने में सफल होगा। लेकिन अक्सर ऐसा होता है कि स्कूल-कॉलेजों में विद्यार्थी किसी शिक्षक की बात तुरंत समझ लेते हैं और किसी कक्षा में पल भर भी मन नहीं लगा पाते हैं। बचपन में गांव में मास्टरजी नासमझ बच्चों को बाल खींच कर थप्पड़ मारते थे। तब कहा जाता था कि बुद्धि बाल के नीचे होती है। बाल खींचने से जब तकलीफ होगी तो सोई हुई बुद्धि की नींद टूटेगी!

इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि अगर कोई समझने के लिए तैयार न हो तो उसका क्या करें! यह भी हो सकता है कि उसका दिमाग इतना कुंद हो कि कितना भी समझाओ, उसकी समझ में नहीं आता हो। समाज में इसे लेकर अलग-अलग मान्यता है कि लोग प्यार की नहीं, जबर्दस्ती की भाषा समझते हैं। कोई कहेगा कि उसे सिर्फ डंडे की भाषा समझ में आती है या कोई कहेगा कि उसे कानून की नहीं, ‘थर्ड डिग्री’ की भाषा समझाओ, तभी समझ पाएगा। कोई किसी बात को अगर तुरंत पकड़ लेता है तो कहा जाता है कि इसका दिमाग आइंस्टीन जैसा है और जो अपना सिर खुजलाने लगता है, उसे तत्काल ‘गोबरदास’ की उपाधि मिल जाती है। ऐसे लोगों के लिए एक मजाक भी है कि चुटकुला सुनने के बाद गधे को अगले दिन हंसी आती है! यानी इस मामले में भी हर किसी की समझ अलग-अलग है। जितने मुंह उतनी बातें।

मेरे गांव में एक गाड़ीवान थे लासंतु चाचा। उन्हें किसी भी बात को समझने में काफी वक्त लग जाता था। लेकिन उनके पास किस्से-कहानियों का खजाना होता था। हम लोग बैलगाड़ी से ही कहीं जाते-आते थे। वही यातायात का एकमात्र साधन थी। लासंतु चाचा किस्सों का पिटारा खोल देते थे और हमारा रास्ता आसानी से कट जाता था। हमने एक बार उनसे पूछा कि इतनी कहानियां आप याद कर लेते हैं, लेकिन किसी की बात समझने में देर क्यों लगती है! उन्होंने कहा कि एक बार स्कूल में मास्टरजी ने कान पर जोर का थप्पड़ मार दिया था, जिससे कान का परदा फट गया। उसी के बाद से सुनने में दिक्कत होने लगी और दिमाग भी भोथा हो गया। अगर नहीं मारे होते तो हम भी पढ़-लिख कर समझदार हो गए होते। लासंतु चाचा समझ की बात कर रहे थे, लेकिन उन्हें इसका भान नहीं था। वे आज अगर होते तो मैं उन्हें यह समझा पाता कि फणीश्वरनाथ रेणु अपनी जिस मुहावरेदार भाषा के धनी बने, वह उन्होंने अपने गाड़ीवान से ही सुन कर जानी थी।

पिछले दिनों मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी में कलाकृतियों की एक प्रदर्शनी देखने गया। सुमित मिश्रा की थी, जो इस समय सिनेमा-टीवी के बड़े कला निर्देशक हैं। उन्होंने एक फिल्म का निर्देशन किया है- ‘अमृता और मैं’। अमृता प्रीतम और इमरोज की प्रेम कहानी पर बनी यह फिल्म अभी तक एक दर्जन से ज्यादा पुरस्कार हासिल कर चुकी है। उस प्रदर्शनी को देख कर मैं बाहर निकला था। लेकिन भारी बारिश से बचने के लिए एक जगह रुका हुआ था। वहीं बिहार से आए कुछ पर्यटक भी थे जो गेटवे आॅफ इंडिया को देख कर लौट रहे थे। मेरे हाथ में प्रदर्शनी से संबंधित एक पर्चा था। उसके ऊपर पर जो चित्र था, उसमें एक आदमी के सिर पर चोटी की जगह पेड़ था। उसका शीर्षक ‘बोधिवृक्ष’ दिया गया था।

मेरे बगल में खड़े दो बच्चे उस चित्र को देख कर हैरानी से मुस्करा रहे थे कि कैसा अजूबा है यह! मेरे कुछ कहने के पहले ही गार्ड ने अंदर जाकर देखने का इशारा कर दिया। दोनों डरते-हिचकते गए। पीछे-पीछे मैं भी गया। उन्होंने बाकी चित्रों को तो देखा लेकिन ‘बोधिवृक्ष’ वाली पेंटिंग के सामने टिक कर खड़े हो गए। एक ने हैरानी जताई कि ‘इसके माथे पर गाछ कैसे उग गया है? लगता है कि यह कोई साधु होगा जो ज्ञान के लिए तप करने जंगल गया होगा। भूखे-प्यासे पता नहीं, कितना दिन बीत गया होगा। उसी में पूरे शरीर पर झाड़-झंखाड़ उग गया होगा।’ दूसरे ने बताया कि ‘उसके गांव के पास बोधगया में बोधिवृक्ष है, जहां भगवान बुद्ध को ज्ञान मिला था। वह तो जमीन पर है, लेकिन यहां सिर पर क्यों है? इसका मतलब यह है कि जिसका माथा सही रहेगा, उसी को बुद्धि-ज्ञान मिलेगा।’ फिर दोनों मेरी तरफ मुखातिब हुए थे कुछ जानने के लिए। लेकिन मैं कहीं और देखने का नाटक करने लगा था।

मुझे लगने लगा कि बच्चों की समझ सोशल मीडिया और टीवी चैनलों पर भड़ास निकालने वालों की समझ से बहुत आगे और समझदारी भरी है। यों ऐसी समझ अमूमन हर किसी के पास होती है, लेकिन आग्रहों-दुराग्रहों के कारण मूल चेतना से भटक जाते हैं। इन बच्चों की तरह अगर हम सही नजरिए से चीजों को देखना शुरू कर दें तो हमारे आसपास के माहौल में बदलाव आने लग जाएगा।

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