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दुनिया मेरे आगेः समांतर दृश्य

हम किन चीजों से घिरे हुए हैं, यह देखते रहना चाहिए। इससे एक तो हम खुद को स्थित कर पाएंगे और दूसरी बात हमें पता होगा कि कौन-से खयालों से हमें लड़ना है।
Author May 13, 2017 02:14 am
तमिलनाडु के 114 किसानों के एक जत्थे का जंतर-मंतर पर 39 दिन चला धरना है

शचींद्र आर्य

हम किन चीजों से घिरे हुए हैं, यह देखते रहना चाहिए। इससे एक तो हम खुद को स्थित कर पाएंगे और दूसरी बात हमें पता होगा कि कौन-से खयालों से हमें लड़ना है। यह संघर्ष की स्थिति दिखाई नहीं देती, लेकिन होती आंखों के सामने ही है। यह दौर देखने का है। हम आसपास की अपनी दुनिया को इससे बाहर समझने के लिए राजी नहीं हैं। जितना हमें दिखाया जा रहा है, उतना ही सच हमारे लिए काफी है। अगर यकीन नहीं आता तो अपनी भाषा में देखने को लेकर जितनी भी लोकोक्तियां और मुहावरे हैं, सबकी एक सूची बना कर देखिए।
हम टीवी देख रहे हैं, हमारे सामने एक खिड़की खुलती है और हम एक घर के भीतर खुद को पाते हैं। वे हमें नहीं देख रहे। हम ऐसी जगह हैं, जहां वे हमें कभी देख ही नहीं पाएंगे। यह घर किसी धारावाहिक का सेट होगा, जिस पर अभिनेता और अभिनेत्रियां अभिनय से एक दृश्य रच रहे होंगे। जरा पिछली रात देखे गए किसी एक धारावाहिक की कोई एक मामूली-सी घटना को उठा कर देख लीजिए। क्या वे हमारे-आपके सामान्य घरों का प्रतिनिधित्व करते हैं? उनकी वह कठिनाई या समस्या हमारे जीवन के निजी अनुभवों से मिलान नहीं कर पाती है। फिर हम क्यों उन्हें देख रहे हैं? यह मनोरंजन की तरह पारिभाषिक शब्दावली में समाएगा, कहा नहीं जा सकता।

इनके बीच में आने वाले विज्ञापन, जिनमेंं अपनी त्वचा के रंग के प्रति घृणा जैसे भाव भर देने की ताकत है, इसका अंदाजा हम लगा नहीं पाते। यह नस्लभेद की पूर्वपीठिका है। कैसे काले से गोरा होने की इच्छा उन सारे श्याम-वर्णी लोगों के अस्तित्व को सिरे से नकार देना है। यह इच्छा पुरुषों से लेकर स्त्रियों के बीच भी समान रूप से पाई जाती है। मेरी पत्नी वही होगी, जो आटे की तरह सफेद होगी। इसी को वे विज्ञापन ‘फेयर’ कहते आए हैं। लड़की भी खुद को पसंद होते हुए देखना चाहती है। यह आइरिस यंग की किताब का कोई अध्याय नहीं है, जहां स्त्रियां खुद को आईने में देख रही हैं। बारीक नजर में वह भी एक उत्पाद बनाती, एक छद्म विमर्श रचती स्त्री ही लगने लगती है।

हम देख नहीं पा रहे हैं कि कैसे समाचार चैनलों ने इस देश की एक दूसरी राजधानी खोज ली है। उनकी सुबहें उस प्रदेश के मंत्रियों के साथ शुरू होती हैं, जहां वे टीवी कैमरे के साथ औचक निरीक्षण पर निकलने वाले हैं। मुख्यमंत्री के पहुंचने से पहले तालाबों को पानी के टैंकरों से भर देते हैं। कैमरों के सामने भैंस वहां नहा रही है। जॉन बर्जर इसे किस तरह का देखना कहते, इसके लिए अभी अवकाश नहीं है या कहा जाए कि यह देखना ही नहीं है। इसी देश की राजधानी में एक जंतर-मंतर है। वहां तमिलनाडु से आए किसान धरने पर बैठे थे। एक दिन तपती धूप में वे सब निर्वस्त्र होकर संसद के सामने अपना विरोध प्रदर्शन करते हैं। फिर वे कहते हैं कि अगर सरकार उनकी मांगें नहीं मानती है, तब वे स्वमूत्र पीकर विरोध जताएंगे और उसके बाद अपना मल खाएंगे! ये इस दौर की सबसे हिंसक पंक्तियां हैं। लेकिन चूंकि हमने इस दृश्य को अपने सामने घटित होता नहीं देखा, इसलिए मान लिया कि दुनिया के इस उष्ण कटिबंधीय भौगोलिक क्षेत्र में यह घटना कभी हुई ही नहीं। वे किसान नहीं हैं। वे कभी अपने प्रदेश से यहां आए ही नहीं।

यह हमें तय करना होगा, हमारे अधकचरा-से दिमाग में किस तरह की छवियों को लगातार पोषित किया जा रहा है! हम किस तरह अपने चिंतन संसार को रच रहे हैं! हमारे सोचने के फलक पर किन घटनाओं के दृश्य कभी नहीं उभरते! हमारे दृश्यों में किसी फिल्म का ट्रेलर है, किसी अभिनेत्री का शरीर है, कोई अधनंगा अभिनेता किसी क्रीम को बेच रहा है, किसी निजी सेवा प्रदाता के खत्म हो रहे प्लान की सूचना है, किसी व्यक्ति के राष्ट्र स्तर के नेता बनने की आकांक्षा स्वरूप उसके द्वारा योजना उद्घाटन के कार्यक्रम के सीधे प्रसारण हैं।
लेकिन एक पल ठहरिए। सोचिए कि इस बीच क्या अनुपस्थित है! वह क्या है, जो इन इकहरे वक्तव्यों में नहीं है? वे किस तरह के दिमागों के व्यवस्थापक बनने की इच्छा से भर गए हैं? अगर हम आज कोई अंतर नहीं कर पा रहे हैं, तब हमारी क्षमताएं कितनी कुंद हो चुकी हैं? किन दृश्यों, घटनाओं, सूचनाओं, चर्चा को बनने से पहले उन सारी संभावनाओं को खत्म किया जा रहा है! हमारे पास इसका विकल्प क्या है? अगर आज यह सवाल नहीं बना, तब कल हमारे पास यह सवाल ही नहीं रहेगा। हमें खुद से पूछना होगा कि क्या हम इन दृश्यों के समांतर अपने दृश्यों को खड़ा कर सकते हैं!

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