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दुनिया मेरे आगेः हाशिए के लोग

अक्सर हम सबको बराबर नजर से देखने की वकालत करते हैं। निश्चित रूप से यह हमारी सभ्य होती चेतना का प्रतीक भी है।
Author July 15, 2017 02:36 am
सांकेतिक फोटो

चांद खां रहमानी

अक्सर हम सबको बराबर नजर से देखने की वकालत करते हैं। निश्चित रूप से यह हमारी सभ्य होती चेतना का प्रतीक भी है। लेकिन आज भी सच यही है कि हम आदमी की पद-प्रतिष्ठा और संपत्ति देख कर ही उसके प्रति अपना बर्ताव तय करते हैं या उसे सम्मान देते हैं। पिछले दिनों कुछ चौकीदारों से बात करने पर यह महसूस हुआ है समाज के खास से लेकर साधारण लोग तक उन्हें किस तरह हेय दृष्टि से देखते हैं। पुकारने के लिए कैसे कई बार अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल करते हैं। जबकि कॉलोनियों या मुहल्लों की गलियों में पूरी रात सीटी बजाते और घूमते हुए ऐसे चौकीदार लोगों के घरों की सुरक्षा के लिए पहरेदारी ही करता रहता है। बदले में जब वह कुछ मेहनताना लेने लोगों के दरवाजे पर जाता है तो लोग उसे भिखारी की तरह समझते हैं और कभी दस रुपए तो कभी पांच रुपए देकर टरका देते हैं।

इसके उलट जो लोग किसी निजी सुरक्षा कंपनी के जरिए काम करने वाले चौकीदारों को कम ही सही, बंधी हुई तनख्वाह मिल जाती है। ये लोग किसी संस्था, कंपनी, एटीएम, मेट्रो स्टेशनों, मॉल से लेकर दुकानों तक में दिखाई देते हैं। दिल्ली जैसे शहरों में इनकी संख्या लाखों में है। लेकिन इनके जीवन और सामाजिक स्तर की कोई फिक्र नहीं होती और लोगों का नजरिया बहुत अच्छा नहीं होता। भला हो अंग्रेजी शब्द का जिसने ऐसे लोगों को चौकीदार से ‘गार्ड’ शब्द दे दिया, जिसके जरिए कम से कम उन्हें पुकारते हुए लोग वह भाव नहीं रखते जो चौकीदार कहते हुए रखते हैं। कुछ लोग कभी-कभी उन्हें ‘गार्ड साहब’ भी कह देते हैं। यह शब्द उन्हें बहुत खुशी देता है क्योंकि इसमें थोड़ी-सी इज्जत का भाव होता है।

दरअसल, बातचीत में एक-दूसरे को संबोधित करने से एक भाव जुड़ा होता है और उसका एक समाजशास्त्र होता है जो लोगों की सामाजिक हैसियत से भी संचालित होता है। ऐसे जितने भी सुरक्षा गार्ड से मेरी बात हुई, सबने अपने शोषण की कहानी बयान की। सब कुछ निजी क्षेत्र की ओर झोंकने में लगी सरकारों को ऐसे तमाम लोगों की कोई परवाह नहीं है। ये लोग किन हालात में और कैसे काम करते हैं, उसे इनके अलावा शायद कोई महसूस नहीं कर पाता। किसी कंपनी के मुख्य दरवाजे पर बने छोटे-से केबिन में आमतौर पर उन्हें खड़े-खड़े ही ड्यूटी करना पड़ता है। कभी सुस्ताने के दौरान इनके सुपरवाइजर ने देख लिया तो दिहाड़ी भी काट ली जाती है।

लोगों को शायद यही मालूम होगा कि ये सुरक्षा गार्ड नियमित नौकरी पर होते होंगे। लेकिन सच यह है कि इनकी कोई पक्की नौकरी नहीं होती। बल्कि काम और वेतन का जो हिसाब है, उसके मुताबिक ये लोग दिहाड़ी मजदूर होते हैं। ज्यादातर जगहों पर इनसे बारह घंटे की ड्यूटी ली जाती है और कोई छुट्टी नहीं होती। जिस दिन ये छुट्टी लेते हैं, उस दिन का वेतन काट लिया जाता है। यह सुरक्षा एजेंसी चलाने वाली कंपनियों की ओर से कमीशन काटने के बाद की हालत है। इसके अलावा, महीने की तनख्वाह कुल मिला कर जितनी होती है, वह शहरों-महानगरों में साधारण जीवन के लिए भी नाकाफी होती है। बाकी रोजगार और सामाजिक सुरक्षा के सवाल इनके लिए ठीक वैसे ही बेमानी हैं, जैसे इस देश में ज्यादातर असंगठित क्षेत्र में काम करने वाले करोड़ों लोगों की है।
यों भी, पिछले कुछ सालों के दौरान शहरों-महानगरों में खर्च के मुकाबले रोजगार और आय की हालत ने समाज के कमजोर तबकों का जीवन बहुत मुश्किल कर दिया है। चौकीदारों के जीवन को कमजोर आर्थिक समूह के लोगों की आम समस्या के तौर पर देखा जा सकता है। दिल्ली जैसे शहरों में मजदूरी या छोटी-मोटी नौकरियां करके लोग किस तरह अपनी जिंदगी गुजारते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। न जाने कितने ऐसे लोग होंगे जो रात फुटपाथों पर गुजार लेते हैं। जो रैन बसेरे चलाए जा रहे हैं, वहां रहने के हालात और सीमाएं सब जानते हैं। जो लोग किराए के घर में रहते हैं, उनके लिए अब अपनी आमदनी के मुताबिक कमरा ढूंढ़ना मुश्किल होता जा रहा है। रहने, खाने-पीने और नौकरी के लिए या फिर कहीं भी आने-जाने के खर्चों में जिस तरह कदर बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है, उसमें बहुत सारे ऐसे लोग हैं जो विकास की दौड़ में पीछे छूट रहे हैं।
सरकार और व्यवस्था की निगाह में इन छूट रहे लोगों के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन समाज में हाशिये के इन लोगों के प्रति जो नजरिया है, वह भी कई बार मुझे बहुत बेचैन कर देता है। आखिर हम पद और पैसे से मजबूत किसी व्यक्ति से क्यों तुरंत प्रभावित हो जाते हैं, चाहे वह कोई भ्रष्ट व्यक्ति हो? दूसरी ओर, किसी बेहद ईमानदार और भले इंसान को भी हम बहुत महत्त्व नहीं देते, अगर वह कमजोर पृष्ठभूमि से आता हो। मुझे लगता है कि हमें अपने सोचने-समझने के तरीके को बदलने की जरूरत है।

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