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दुनिया मेरे आगेः ताक पर सेहत

कुछ समय पहले जिम कार्बेट से लौटने के बाद हमने अपने कुछ स्थानीय जानकारों से किसी बाग में चल कर लीची और आम खाने और खरीदने का प्रस्ताव रखा तो वे छूटते ही बोले- ‘आम को पकने में अभी पंद्रह-बीस दिन और लगेंगे और लीची आपके खाने लायक नहीं....
Author July 7, 2017 02:15 am

नीलम गुप्ता

कुछ समय पहले जिम कार्बेट से लौटने के बाद हमने अपने कुछ स्थानीय जानकारों से किसी बाग में चल कर लीची और आम खाने और खरीदने का प्रस्ताव रखा तो वे छूटते ही बोले- ‘आम को पकने में अभी पंद्रह-बीस दिन और लगेंगे और लीची आपके खाने लायक नहीं, क्योंकि उसे लाल करने के लिए पेड़ पर ही उन पर एक मसाले का छिड़काव किया जाता है, जिससे वह जल्दी ही ऊपर से लाल दिखने लगती है, पर अंदर से कच्ची ही रहती है। सुनते ही मेरी मित्र ने लेने से मना किया। कच्ची लीची बहुत नुकसान करती है। मित्र बंगाल के उस इलाके से है, जहां लीची भरपूर होती है और उसके अपने घर में भी कभी लीची के पेड़ थे। दो साल से दिल्ली में मैंने लीची नहीं खाई थी। कभी लाई भी तो ऊपर से ही कीड़े दिख जाते या फिर अंदर से कड़वाहट होती।

जाहिर है, मसाला उसके भीतर तक पहुंच गया होगा। इसलिए रामनगर जाते हुए खुश थी कि अब तो लीची खाने को मिल ही जाएगी। आम का मोह तो कई साल पहले ही छोड़ चुकी थी। मैंने मान लिया था कि दिल्ली में, सामान्य और सहज रूप से बिना मसाले का आम खाने को नहीं मिल सकता। दिल्ली सरकार ने कुछ साल पहले फल-सब्जियों पर कीटनाशक या जल्दी पकाने के लिए रसायनों के इस्तेमाल के खिलाफ एक चेतावनी जरूर जारी की थी, पर उसके तहत कभी किसी ठेले या सब्जीमंडी में कोई जांच होने या किसी का माल जब्त किए जाने की कोई खबर कभी नहीं आई।

सवाल है कि जब बाग या खेत में खड़ी फसल पर ही रसायनों का इस्तेमाल कर लिया जाएगा तो मंडी के व्यापारी या गली के ठेले वाले का इसमें क्या दोष होगा! जिस तरह किसान समय से पहले सब्जियों को पकाने के लिए रसायनों या टीकों का इस्तेमाल करता है, दुकानदार अपने सड़ चुके माल के भी ताजा होने का भ्रम पैदा करने के लिए फल-सब्जियों पर रसायनों का इस्तेमाल करते हैं, आम ग्राहक नहीं जानता कि कौन कितना दोषी है। उसकी मजबूरी यह है कि उसके पास इसी माल को खरीदने के अलावा कोई विकल्प नहीं है। वह या तो इसी को खरीदे या फिर खाली हाथ वापस चला जाए। पर कब तक? यहां तो रोज का बाजार ऐसा ही है। आॅर्गेनिक के नाम पर किसी बड़ी दुकान पर कुछ आ भी जाता है तो आम आदमी को न तो कुछ पता होता है और न उसकी उसे खरीद पाने की हैसियत होती है। अमीर आदमी उसे खरीद भी ले तो उसके आॅर्गेनिक होने के दावे की जांच या पुष्टि कैसे करे? सरकार की इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं। खाद्य पदार्थों के संदर्भ में स्वास्थ्य देखभाल, कुपोषण और जानलेवा अपराध को उसने एक साथ जोड़ कर कभी देखा ही नहीं। टीवी, रेडियो या प्रिंट मीडिया में ‘जागो ग्राहक जागो’ का विज्ञापन तो आता है, पर उसमें यह कभी नहीं बताया गया कि अगर किसी माल की शुद्धता की जांच करवानी है तो व्यक्ति कहां जाए। ऐसा नहीं कि सरकारी जांच प्रयोगशालाएं नहीं हैं, पर उनकी जानकारी कितनों को है और संख्या में भी वे कितनी हैं? वे कैसे काम करती हैं?

मैं पिछले तीस साल से दिल्ली में हूं और किसी भी इलाके में यह सुनने या देखने को नहीं मिला कि मोहल्ले के बाजार में किसी फल, सब्जी या राशन की दुकान पर सामान की शुद्धता या गुणवत्ता की जांच के लिए कभी किसी इंस्पेक्टर ने कोई सामान जब्त किया हो। गरमियों में इन दिनों जब पारा 42 से 47 डिग्री सेल्सियस के बीच झूलता रहता है और पानी की बौछारें और गीले बोरे भी फल-सब्जियों को सड़ने से नहीं बचा पाते, तो ठेले पर सड़ी हुई सब्जियां खुले आम बेची जाती हैं। इतनी गर्मी में ऐसी सब्जी या फल खाने में कितने जानलेवा हो सकते हैं, बताने की जरूरत नहीं। पर अभी तो हालत यह है कि अगर किसी फल-सब्जी वाले से कह दिया जाए कि इतनी सड़ी हुई सब्जी ठेले पर क्यों रखी है तो जवाब होता है- ‘देखिएगा। सब बिक जाएगा।’ वे ऐसा इसलिए बोलते हैं कि उन्हें यह अहसास करवाया ही नहीं जाता कि ऐसा खाद्य पदार्थ बेचना अपराध है। वे जानते हैं कि इंस्पेक्टर आएगा, ‘माल काटेगा और चला जाएगा।’

सही है। अधिकारी अपना माल काट रहे हैं, दुकानदार या बागवान अपना माल काट रहे हैं। आखिर इसी संस्कृति के दम पर तो हमारी सरकारें और उनका अमला फलता-फूलता है। क्या सरकारें यह बता सकने की हालत में हैं कि इस पर किस तरह और कितनी कार्रवाई की गई? अगर उनके पास ऐसा कोई भी आकलन है तो उसे जनता के बीच प्रचारित किया जाना चाहिए। नहीं तो इन ‘फटाफट ढेरों माल तैयार’ की कीटनाशक और रसायनयुक्त रेसिपी से स्वास्थ्य को होने वाले ‘लाभ’ ही गिना दें!

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