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दुनिया मेरे आगेः तनाव की भट्टी

बात एक छोटे और सस्ते मकान में शिफ्ट होने की थी। भले ही मसला एक कमरे का ही क्यों न हो!
Author September 15, 2017 01:55 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

शैलेंद्र शांत

बात एक छोटे और सस्ते मकान में शिफ्ट होने की थी। भले ही मसला एक कमरे का ही क्यों न हो! अकेले आदमी के लिए अधिक किराये के मकान की क्या जरूरत! इसलिए छोटे मकान की तलाश जारी थी। इस बाबत परिचितों से मदद की अपेक्षा लाजिमी थी। कुछ परिचित इस कोशिश में लगे थे और कुछ ने इस दिशा में पहल करने का भरोसा भी दिया था। उनमें से एक मैं भी था। बहुत पांव-घिसाई और झंझटों के बाद दोनों बेटियों की शादी से वे निपट चुके थे। पुत्र का भी हाल ही में विवाह हो गया था। जीवन संगिनी कुछ साल पहले ही साथ छोड़ कर जा चुकी थीं। बेटियां ससुराल में और पुत्र दूसरे शहर में नौकरी पर। पुत्र चाहते थे कि पिता साथ में रहें। कई परिचितों-रिश्तेदारों की भी यही राय थी। लेकिन वर्माजी अपने शहर में ही बने रहना चाहते थे। उस इलाके के आसपास, जहां उनके चालीस साल गुजरे थे। वे एक निजी संस्थान की नौकरी से अवकाश प्राप्त कर चुके थे। संस्थान का घर छोड़ने के बाद किराये के मकान में रहते थे।

पत्नी के नहीं रहने और बच्चों की दुनिया बस जाने के बाद अब वह बड़ा और महंगा लगने लगा था। वे शाम को होमियोपैथी की डिस्पेंसरी चलाते थे। वे थोड़े सामाजिक जीव थे। मौके-बेमौके जरूरतमंदों के काम आने वाले। जाहिर तौर पर स्वाभिमानी भी। सत्तर साल के करीब पहुंच चुके थे, लेकिन लगते नहीं थे। हमेशा उत्साह से भरे रहते थे। वे अपने लिए खाना बना लेते थे। कपड़े साफ कर लेते थे। यानी पूरी तरह से स्वावलंबी। हालांकि हाल में ही उन्हें पेसमेकर लगाना पड़ा था। लेकिन हाल तक पूरी तरह स्वस्थ।

उस दिन वे अपने एक रिश्तेदार के घर पर थे। वहीं इस बात पर बहस छिड़ गई थी कि इस ढलती उम्र में उन्हें अपने पुत्र के साथ रहना चाहिए। जाने कब स्वास्थ्य से संबंधित परेशानियां बढ़ जाएं। ऐसे में किसी सगे का पास होना जरूरी है। सो, उन्हें अब आराम करना चाहिए। रिश्तेदार के पड़ोसी की इस राय से शायद वे व्यथित थे। उनके चेहरे पर खिंची रेखाएं इसकी गवाह थीं। लेकिन वे उनकी राय पर हंस भर रहे थे। मैं वहां मौजूद था। मुझे यह अच्छा नहीं लग रहा था। मुझे बोलना पड़ा कि वर्माजी स्वस्थ हैं और अपनी डिस्पेंसरी चलाते रहना चाहते हैं। जिस समाज, माहौल, इलाके से उनका सालों का साथ बना रहा है, उसे वे छोड़ना नहीं चाहते। तो उन पर दूसरे शहर में बेटे के पास चले जाने का दबाव नहीं बनाया जाना चाहिए। बच्चे उनसे आकर मिल लिया करेंगे। दरअसल, बातचीत का लहजा कुछ ऐसा था, जिससे उसमें दबाव का भाव झलकता था। इस तरह का मनोवैज्ञानिक दबाव उचित नहीं था।
यों भी, इन दिनों यह बात आम हो चली है कि बच्चे दूसरे शहरों में नौकरी करते हैं और माता-पिता अलग रहते हैं। कोलकाता में या दूसरे महानगरों में भी बहुत से बुजुर्ग अकेले रहते हैं। बुजुर्ग महिलाएं तक रहती हैं परिचारिकाओं के सहारे। हमारे घर के पास रहने वाली एक महिला की बहू शहर के दूसरे छोर पर फ्लैट लेकर रहती हैं। पति दिवंगत हो चुके हैं। नौकरीशुदा बहू को वहां से दफ्तर आने-जाने में सुविधा है। जाहिर है, पुत्र भी साथ में रहते हैं।

ऐसे उदाहरण अब कम नहीं। पेंशन या घर के किराये से या बैंकों में जमा पैसों पर मिलने वाले सूद के सहारे जीवन की गाड़ी खींचती रहती हैं। लायक बच्चों से भी आर्थिक मदद मिलती ही है। इसके पीछे घर, शहर, इलाके के मोह के साथ ही अपनी तरह से रहने की आजादी की चाह भी होती है। हकीकत तो यह है कि एक ही शहर में नौकरी या व्यवसाय के कारण बच्चे-बहुएं अलग-अलग छोर पर रहने के लिए मजबूर हैं। कुछ स्वतंत्र रूप से रहने के इरादे से भी। तो हमारे वर्माजी की भी शायद यही चाह थी। वे स्वावलंबी भी थे। डिस्पेंसरी से इतनी आय हो जाती थी, जिससे उनका खर्चा निकल जाए। पुराने किराए के मकान को छोड़ अपनी डिस्पेंसरी के आसपास मकान तलाशने की कोशिश उनकी जिजीविषा का ही संकेत थी। सो, मैंने भी कुछ परिचितों से इस बाबत चर्चा की थी। लेकिन इस कोशिश पर विराम लग गया। कोई हफ्ता ही गुजरा होगा कि उनके रिश्तेदार का फोन आया कि वर्माजी नहीं रहे। दो दिन पहले ही ब्रेन स्ट्रोक के कारण उनका निधन हो गया। हड़बड़ी और घबराहट में वे उस दिन मुझे खबर नहीं कर पाए। दूसरे शहरों से बेटे-बेटी और दूसरे रिश्तेदार आ गए थे। वर्माजी को शायद इन सगों के सहारे पर कहीं ज्यादा भरोसा रहा होगा। यों भरोसा तो जिंदगी पर भी उन्हें कम नहीं था। लेकिन कथित अपनों-परिचितों के दयाभाव वाली चिंता-सलाह से वे व्यथित होते होंगे। कहीं इस दयाभाव ने ही तो उन्हें तनाव की भट्ठी में नहीं झोंक दिया!

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