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दुनिया मेरे आगेः जो बात मेरे शहर में है

मेरे जीवन का लंबा समय पटना में ही बीता है। और लगता है जीवन के आखिरी दिन भी यहीं बीत जाएंगे। पापा नौकरी में थे तो हम सब उनके साथ वहां-वहां होते जहां-जहां उनका तबादला होता।
Author November 11, 2017 03:12 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

निवेदिता

मेरे जीवन का लंबा समय पटना में ही बीता है। और लगता है जीवन के आखिरी दिन भी यहीं बीत जाएंगे। पापा नौकरी में थे तो हम सब उनके साथ वहां-वहां होते जहां-जहां उनका तबादला होता। फिर एक अरसे से वे यहीं रहने लगे। मैंने अपने देश को देखा है, जाना है। दुनिया के कुछ हिस्से भी घूम आई हूं। पर जो बात अपने शहर में है वो बात और कहां! दरअसल कोई देश, गांव या शहर वहां के लोगों की वजह से अच्छा लगता है। वे लोग जो आप से जुड़े हों, जिस शहर को आप से मुहब्बत हो, जो शहर आपके सुख-दुख का हिस्सेदार हो। वह शहर चाहे कितना भी बेरंग हो, उसकी मिट्टी, उसकी हवा और उसके पानी में आप खुद को पाते हैं। आप उसकी हरारत महसूस कर सकते हैं।

यों देखिए तो हमारा शहर निहायत साधारण है…सड़कें बहुत चौड़ी नहीं हैं। बेतरतीब दुकानें, गाड़ियां, रिक्शा, ठेला और गायें सड़कों पर ही रहती हैं। आप सड़क पर चलना चाहें तो फर्राटे से आप चल नहीं सकते। हॉर्न और गाड़ियों के शोर से मन घबरा जाए। क्या आप एक ऐसे शहर की कल्पना कर सकते हैं जिसमें बाग न हों, पेड़-पौधे न हों, पत्तियों की सरसराहट और चिड़ियों की चहचाहट सुन न पाएं। यहां मौसम का फर्क सिर्फ आसमान में नजर आता है या फिर मंदिर में बिकने वाली फूलों की टोकरियों से। गर्मियों के मौसम में सूरज मकानों को सुखा देता है और दीवारें गर्द से भर जाती हैं। पतझड़ के दिनों में हमारा शहर दलदल में तब्दील हो जाता है। फिर भी यह शहर प्यारा है मुझे। मेरी धड़कनों में बसा है। चालीस साल गुजर गए इस शहर में रहते हुए। इन चालीस सालों में शहर भी बदल गया और उसकी रफ्तार और चाल भी बदल गई। इसका मिजाज भी बदला और इसकी तहजीब भी बदली।

पटना गंगा के दक्षिणी तट पर स्थित है। गंगा नदी इस नगर के साथ एक लंबी तट रेखा बनाती है, जिसके तीनों ओर नदियों का घेरा है। गंगा, सोन नदी और पुनपुन उसके पहलू में हैं। कभी वक्त था जब सड़क किनारे पलाश के लाल-लाल फूलों वाले घने दरख्त और नारियल के झुंड और गंगा की लहरें जगमगाती रहती थीं। शहर के बीचोबीच एक काफी हॉउस था, जहां राजनीति, कला और पत्रकारिता के तमाम किस्से लहराया करते थे। पटना कॉलेज गंगा के किनारे बसा है। उन दिनों गंगा नदी कॉलेज के सीने से लगी-लगी बहती थी। काली घाट आज भी मशहूर है। पहले इतनी भीड़ नहीं थी। कॉलेज के बाद हम सब घाट के सिम्त जाने के लिए सीढ़ियों से उतरते और वहीं मजमा लगाते। दूर-दूर तक नारियल के झुंड हवा में सरसराते। झिलमिलाते पानी के रंग सुर्ख सूरज-सा हद््देनजर तक फैलते चले जाते।

कहते हैं पहले पटना का नाम पाटलिग्राम या पाटलिपुत्र था। पाटलिग्राम में गुलाब (पाटली का फूल) काफी मात्रा में उपजाया जाता था। गुलाब के फूल से तरह-तरह के इत्र व दवाएं बना कर उनका व्यापार किया जाता था। इसलिए इसका नाम पाटलिग्राम हो गया। लोककथाओं में राजा पत्रक को पटना का जनक कहा जाता है। उसने अपनी रानी पाटलि के लिए जादू से इस नगर का निर्माण किया। इसी कारण नगर का नाम पाटलिग्राम पड़ा। पाटलिपुत्र नाम पतली ग्राम से ही पड़ा। कहते हैं पटना नाम पटनदेवी (एक हिंदू देवी) से प्रचलित हुआ है।

एक अन्य मत के अनुसार यह नाम संस्कृत के पत्तन से आया है, जिसका अर्थ बंदरगाह होता है। मौर्य काल के यूनानी इतिहासकार मेगस्थनीज ने इस शहर को पालिबोथरा तथा चीनी यात्री फाहियान ने पालिनफू के नाम से संबोधित किया है। यह ऐतिहासिक नगर पिछली दो सहस्राब्दियों में कई नाम पा चुका है। ऐसा समझा जाता है कि पटना नाम शेरशाह सूरी के समय से प्रचलित हुआ। किस्से हजार हैं, पर हम लोगों ने जो पटना देखा वह आंदोलन और कला की जमीन रही है। पटना कॉलेज के सामने पीपुल्स बुक हॉउस हुआ करता था, जो इश्क और क्रांति का गवाह रहा वर्षों तक। पटना ने जिंदगी के कई रंग दिए। पटना ने जीना भी सिखाया और लड़ना भी। कितनी हसीन तर्ज-तामीर है यह। आप पटना के पुराने मकानों को देखें। सुर्ख फूलदार परदों वाले कमरों में, जिनके बाहर पहाड़ी गुलाब खिले थे और दूर आबशारों की आवाज आती थी। वही पटना हमारा पटना है। आपको यकीन नहीं है तो जरा तारीख की नजरों से देख लें।

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