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दुनिया मेरे आगेः सपनों का परिसर

आज बच्चे कॉलेज जाते हैं तो जितनी कॉलेज की फीस लगती है, उससे ज्यादा पैसा उनके कपड़ों, गाड़ी, फोन और जेब-खर्च के लिए भी देना पड़ता है।
Author February 18, 2016 04:15 am
JNU Row (Express Pic)

आज बच्चे कॉलेज जाते हैं तो जितनी कॉलेज की फीस लगती है, उससे ज्यादा पैसा उनके कपड़ों, गाड़ी, फोन और जेब-खर्च के लिए भी देना पड़ता है। इन कॉलेज के बच्चों के पास किताबें कम और नोट्स ज्यादा होते हैं। पढ़ाई-लिखाई, समाज और देश से सरोकार न के बराबर होता है। मनोरंजन, फिल्में, बॉलीवुड, पिकनिक, महिला या पुरुष मित्र के इर्द-गिर्द ही वे अपने कॉलेज के पूरे समय को बिता देते हैं। लेकिन भारत के एक विश्वविद्यालय की इससे सुंदर छवि और क्या हो सकती है, जहां कुर्ता-पजामा, झोला, खादी, साधारण-सी पोशाक और शान से चप्पल पहने बिना तामझाम और मेकअप के ठोस खुरदुरे, मगर संवेदनशील चेहरे दिखाई देते हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय में पढ़ने के दौरान भारतीय जनसंचार संस्थान और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे शिक्षा के केंद्र मेरे लिए आॅक्सफोर्ड से भी ज्यादा मायने रखते थे और आज भी रखते हैं। लेकिन आज एक प्रगतिशील विश्वविद्यालय किस तरह राजनीति की भेंट चढ़ रहा है, यह देख कर अकेले मेरे नहीं, तमाम संवेदनशील लोगों को दुख पहुंच रहा है। जेएनयू में आए छात्र-छात्राओं के झोले में ऐसी तमाम किताबें होती हैं जिनके जरिए वे एक बेहतर समाज की तस्वीर बनाना चाहते हैं। वे देश से जुड़े जरूरी मुद्दों पर बातें करते हैं। समाज और राजनीति उनके सरोकार होते हैं। उनका फैशन ब्रांडेड कपड़े नहीं, खादी है, जिससे आज भी हमारे देश के हजारों बुनकर जुड़े हैं। वे सिर्फ फिल्मी गाने नहीं गाते, कविताएं-साहित्य से भी सरोकार रखते हैं।
बहरहाल, आज जेएनयू सवालों के घेरे में है। कुछ एक छात्रों की हरकत के चलते पूरे संस्थान पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। ऐसा लगता है कि कुछ लोगों को शायद ऐसे ही किसी मौके की तलाश थी, जिसके बाद वे जेएनयू के सभी विद्यार्थियों को अराजक साबित करने पर तुले हैं। यह देख कर मुझे अफसोस होता है कि तमाम पढ़े-लिखे ऊंची डिग्रियों वाले लोग भी बड़े ही विचित्र और सतही तरीके से अपनी राय रख देते हैं। एक खास संगठन, एक खास विचारधारा से जुड़े लोग देशभक्त हो जाते हैं और विरोध के स्वर को कुचलने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। वे उन सबको देश निकाला देना चाहते हैं जो सत्ता के सुर के विरोधी हैं।
वे लोग जो अपनी देशभक्ति का ढोल पीटते थकते नहीं, पहला मौका मिलते ही अमेरिका जा बसने का सपना देखते हैं। लंदन में नौकरी लग जाए तो कल वीजा-पासपोर्ट सब तैयार करा लें और कहीं नहीं तो दुबई ही सही। वे जो अपने भले के लिए किसी की भी पीठ में छुरी भोंकने का हुनर जानते हैं, देश ऐसे भक्तों से नहीं चल रहा। उन तमाम लोगों की मशक्कत से चल रहा है जो दिन-रात पसीना बहाते हैं, मशक्कत करते हैं। माथे पर तिलक लगाकर सूर्य-नमस्कार करने से देश नहीं चलता। तमाम लोग सुबह से शाम अपनी नौकरियां बजाते हैं, अपने-अपने हिस्से के काम को अंजाम देते हैं, तब देश चलता है।
क्यों कहते हैं कि सब अंगुलियां एक जैसी नहीं होतीं! क्या अच्छा लगेगा कि धरती पर सिर्फ एक ही रंग का फूल खिले! सब एक ही बात बोलें और सब केवल जी-जी करें। फिर कहने-सुनने को बात ही क्या रह जाएगी। सिर्फ ‘हां हुजूर, हां हुजूर’ रह जाएगा। यह सोचने की जरूरत है कि क्या हम केवल ऐसी ‘जी हुजूरी’ चाहते हैं। या फिर अपने अस्तित्व को तराशना चाहते हैं। ऐसा आसमान चाहते हैं जहां सिर्फ कबूतर उड़ें, या फिर कबूतर, तोता-मैना, चील-गिद्ध सब हों। गिद्ध और हंस दोनों दो छोर हैं और दोनों जरूरी हैं। जेएनयू दरअसल लोकतंत्र की जमीन है। अगर यहां कुछ गलत होता है तो ईमानदारी से उसकी जांच करा कर सजा भी तय करनी चाहिए। जो नौजवान यहां अपना भविष्य तराशने आए हैं, जिन नौजवानों से देश का भविष्य तय होता है, उन सबको गुनहगार साबित कर हम किसका नुकसान करेंगे। हमारी व्यवस्था और सियासत कितनी क्रूर है कि जरूरी मुद्दों की तो बात नहीं करती, भावनाएं भड़काने के खेल में चालें चलती है।
इस तरह की राजनीति से छात्र-छात्राओं को बख्श देना जरूरी है। जेएनयू एक ऐसा परिसर है जहां अलग-अलग विचारों को पंख मिलते हैं। यह एक कला है जहां अपने ही नहीं दूसरों के लिए भी जीने का हुनर सीखते हैं। यहां बंदिशें नहीं, आजादखयाली है। यह एक प्रयोगशाला है जहां परंपरा से हट कर कुछ सोचने और करने के बीज बोए जाते हैं। वहां छात्र-छात्राओं को एक अच्छा मशीन बनने के लिए ही नहीं, बल्कि एक अच्छा इंसान बनने के लिए तैयार किया जाता है। यह विश्वविद्यालय एक संस्कृति है जो मुक्त होना सिखाती है।

वर्षा

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