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दिखावे का रोग

हमारा भारत फिलहाल एक विकासशील देश है, लेकिन तेजी से आगे बढ़ता हुआ भी। लेकिन सच यह है कि आज भी हमारे देश में चालीस प्रतिशत आबादी बेहद गरीब है। कुछ खास इलाकों..
Author नई दिल्ली | November 16, 2015 22:39 pm
सामाजिक आर्थिक सर्वेक्षण रिर्पोट के अनुसार, ‘गरीबी ने आज भी देश के तीस फीसद आबादी को अपने चंगुल में जकड़ रखा है। (रॉयटर्स फोटो)

हमारा भारत फिलहाल एक विकासशील देश है, लेकिन तेजी से आगे बढ़ता हुआ भी। लेकिन सच यह है कि आज भी हमारे देश में चालीस प्रतिशत आबादी बेहद गरीब है। कुछ खास इलाकों में तो बहुतों के लिए खाने तक के लाले हैं। दूसरी ओर, जो लोग संपन्न और रईस हैं, उनके पास अकूत धन है। कुछ लोगों के पास इतना अधिक पैसा है कि वे जानते ही नहीं कि कहां और किस जगह उसे खर्च करें। अनेक कार, आलीशान मकान, ऐश्वर्य के सभी अति-आधुनिक सामान, काफी महंगे कपड़े और जूते, कई-कई नौकर उनकी शान होते हैं। उनके पास रोब और पैसे की ताकत से बेरोकटोक सभी काम करा लेने की सुविधा होती है। घूमने-फिरने के सभी साधन, समाज में प्रतिष्ठा, ताकतवर और महत्त्वपूर्ण लोगों से जान-पहचान। वे धनबली भी हैं और उनमें से कई बाहुबली भी, क्योंकि उनके इशारे पर अनेक लोग इकट्ठा हो जाते हैं। ऐसे लोग जानते भी नहीं कि पैसा कहां और कैसे खर्च करें। नतीजतन, वे जहां भी जाते हैं और जो करते हैं, उस पर अनाप-शनाप पैसा खर्च करते हैं।

अतिधनाढ्य लोगों में खानदानी पैसे वाले तो हैं ही, नवधनाढ्य वर्ग भी हैं जो बहुत कम मेहनत के ढेर सारी संपत्ति का मालिक हो गए हैं। कई लोग पैसा होने के साथ खुद भी खुशी में बेलगाम होने लगते हैं। कपड़े खरीदें तो कितने और गहने लें तो कितने और! सभी कुछ खुल कर खरीदने के बावजूद इतना पैसा बचा रहता है कि उसे खर्च करना भी एक समस्या बन जाता है। कई बार यह सवाल करने का मन करता है कि क्या ऐसे लोग खाते वक्त सोना-चांदी खाते हैं या फिर सामान्य भोजन। यों तो यह संभव नहीं है, लेकिन वे सोने-चांदी की भस्म खाएं तो भी अगली अनेक पीढ़ियों के लिए पर्याप्त धन शेष रहता है। कई-कई महंगी कारें और बिना जरूरत के इसे बदलते रहने के बावजूद माली हालत तर ही बनी रहती है।

ऐसे लोग मंदिरों में भी बड़ी ठाठ-बाट से जाते हैं। वहां भी क्या पुजारी और क्या अन्य सेवक, सभी इनके चारों ओर मंडराने लगते हैं और इनकी आवभगत में लग जाते हैं। इनकी शानो-शौकत के सामने भगवान का प्रभाव भी फीका लगने लगता है। अभी कुछ दिन पहले मैंने एक मंदिर में बड़ी शान के साथ कुछ लोगों को आते हुए देखा। बैंड बाजे के अलावा, ढोल, वीडियोग्राफी, सजे-धजे लोग और बग्घी गाड़ी में बैठी सजी-धजी एक लड़की। अन्य महिलाएं और पुरुष भी आकर्षक परिधानों में थे। मुझे याद आया कि पहले लोग अल्लसुबह सादगी से मंदिर हो आते थे। अब इस तरह रौब से आते हैं, ताकि लोग उन्हें देखें और निहारें। वे भक्ति से ज्यादा अपनी माली हालत का प्रदर्शन करते हैं। उस पर ठाठ यह कि जानबूझ कर इधर-उधर देखते हुए चलते हैं और बेवजह सभी की ओर हाथ उठाते रहते हैं, भले ही वे लोग उनकी ओर देख रहे हों या नहीं। लाखों रुपए एक आयोजन पर खर्च करना उनके लिए कोई फिक्र की बात नहीं है। आडंबर, दिखावा, पाखंड और ऊपरी शानो-शौकत इस कदर हावी है कि सभी इसके शिकार हो रहे हैं। किसी को पांच रुपए देते वक्तपांच सौ रुपए का नोट निकाल कर लोगों को दिखाना ऐसे लोगों की फितरत है।

ज्यादातर सामाजिक समारोह, फिर चाहे वे धार्मिक हों या परंपरागत, सभी इन धन-बांकुरों की गिरफ्त में हैं। क्या गरबे, क्या भंडारे, क्या कथा वाचन और क्या झंडावंदन। सभी ओर पैसे वाले और उनसे जुड़े नेताओं का बोलबाला है। नेताओं को भी मालामाल वे लोग ही करते हैं जिनके पास खूब पैसा है। दरअसल, वे उन्हें पैसा देकर ही पैसा कमाते हैं। उत्सवों और शादी-ब्याह में भी ये लोग पैसा पानी की तरह बहाते हैं। समाज में भले ही गिनती के व्यंजन बनाने और बर्बादी के खिलाफ आगाह होने की बात कही जाए, पर इनके आगे सभी नतमस्तक हैं। ये ही समाज के भाग्यविधाता बने फिरते हैं। हाथ-पैर भले न चलें, पर समारोह में सड़क पर नाचना-गाना और मटकना इन्हें खूब सुहाता है। एक ऐसे ही नवधनाढ्य सज्जन अंगूठा छाप होने के बावजूद एक बड़े स्कूल के संचालक हैं और अनेक पुस्तकों के लेखक के रूप में भी उनका नाम है। जाहिर है, वे पुस्तकें उन्होंने पैसे देकर दूसरों से लिखवाई होंगी। विडंबना यह है कि खुशी हो या गम या फिर कोई अन्य आयोजन, ऐसे लोग ही छाए रहते हैं।
पैसे की खनक जारी है। जायज तौर पर ईमानदारी से कमाने वाले लोग यहां-वहां फालतू पैसा नहीं बहा सकते। अनाप-शनाप धन नाजायज तौर पर इधर-उधर से उठा-पटक करके ही इकट्ठा किया जा सकता है और इस तरह धन कमाने वाले लोग कहीं भी पैसा फूंकते रहते हैं। दान के नाम पर मंदिरों में नोटों की गड्डी और जेवर डाल आने वालों में भी ऐसे ही लोग हैं और दिखावे पर पैसा लुटाने वाले भी यही हैं। (सूर्यप्रकाश चतुर्वेदी)

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