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दुनिया मेरे आगेः भाषा विस्थापन

किसी जगह से केवल व्यक्ति नहीं, उसके साथ भाषा भी विस्थापित होती है। व्यक्ति जीवन यापन के लिए या फिर बेहतर जिंदगी के लिए गांव छोड़ कर शहरों-महानगरों की ओर पलायन करता है।

किसी जगह से केवल व्यक्ति नहीं, उसके साथ भाषा भी विस्थापित होती है। व्यक्ति जीवन यापन के लिए या फिर बेहतर जिंदगी के लिए गांव छोड़ कर शहरों-महानगरों की ओर पलायन करता है। इस पलायन को विस्थापन भी कह सकते हैं। यह प्रक्रिया व्यापक स्तर पर इतिहास में होती रही है और आज भी जारी है। इस विस्थापन में हजारों गांव, घर खाली हो चुके हैं। जो एक बार गांव से निकल गया वह दुबारा अपने गांव लौटने की लालसा रखते हुए भी नहीं लौट पाता। गांव में बनाया गया घर भी उसके लौटने के इंतजार में ढहने लगता है, लेकिन वह नहीं लौटता।

जो लोग गांव से बाहर हो चुके हैं, उनमें गांव के प्रति एक कड़वाहट भी देखी जा सकती है। गांव में बिजली, पानी और रोजगार के अवसरों की कमी है। कोई यहां कैसे रह सकता है! इस तरह की उलाहने भरी पंक्तियां सुनी जा सकती हैं। ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो कहते हैं कि गांव जाकर क्या करेंगे, वहां आखिर अब रखा ही क्या है? न मां-बापू रहे और न यार-दोस्त, फिर वहां किसके लिए जाया जाए! यह सच है कि समय के अनुसार गांव, शहर, महानगर सब जगह बदलाव देखे जा सकते हैं। हाट बाजार, गली-मुहल्ले सभी विकास के पथ पर सरपट दौड़ रहे हैं। जहां छोटी दुकानें हुआ करती थीं, वहां चमचमाता शोरूम बन चुका है।

लेकिन व्यक्ति के साथ भाषायी पलायन और विस्थापन भी गहरे जुड़ा हुआ है। इतिहास बताता है कि जब बिहार, उत्तर प्रदेश से गिरमिटिए विभिन्न देशों में गए तो उनके साथ उनकी भाषा भी गई। वे अकेले यात्रा पर नहीं निकले थे, बल्कि उनके साथ उनकी भाषायी संस्कृति, समाज, परिवेश भी वहां गया था। उनकी जबान ने भी वहां अपनी पहचान बनाई। यह भाषायी अस्मिता की वैश्विक पटल पर एक दस्तक थी। अमेरिका के जनगणना ब्यूरो की रिपोर्ट में बताया गया है कि अमेरिका में तकरीबन साढ़े छह लाख लोग हिंदी बोलते हैं। दिलचस्प है कि न केवल हिंदी, बल्कि अन्य भारतीय भाषाओं के साथ ही कई दूसरे देशों की भाषाएं भी बोली जाती हैं।

इसमें स्पेनिश, चीनी, फ्रेंच, कोरियाई, अरबी, रूसी आदि भाषाएं भी शामिल हैं। इनमें भाषाओं के विस्थापन से मायने यह है कि किन-किन भाषायी परिवेश के लोग कहां-कहां जा बसे हैं। इस रिपोर्ट की रोशनी में एक तस्वीर यह उभरती है, जिसमें 3.7 लाख से अधिक अमेरिकी गुजराती बोलते हैं, वहीं ढाई लाख से ज्यादा लोग बांग्ला, ढाई लाख पंजाबी, तिहत्तर हजार मराठी, तेरह सौ लोग असमी, सत्रह सौ लोग कश्मीरी बोलते हैं। यहां यह देखना रोचक है कि किस प्रांत और भाषा-भाषी का पलायन अन्य देशों में हुआ। इस लिहाज से देखें तो छह सौ लोग बिहारी भाषाएं, सात सौ लोग राजस्थानी भाषा का प्रयोग करने वाले इस रिपोर्ट में दर्ज किए गए। तमिल, तेलुगू, मलयाली बोलने वालों की संख्या भी हजारों और लाखों में है।

इससे भाषायी विस्थापन का अंदाजा तो लगता ही है, साथ ही भाषायी वर्चस्व और ताकत की झांकी भी मिलती है। किस भाषा को बरतने वाले कितनी तादाद में हैं और किस पद पर बैठे हैं, यह भी भाषायी विस्तार को खासा प्रभावित करता है। किसी भी भाषा के फैलाव का भार उस भाषा को इस्तमाल करने वालों के कंधों पर होता है। ज्यों-ज्यों हम भाषा को अपनी पहचान का मामला बना लेते हैं, वह विस्तार पाती जाती है। जब हम भाषायी पहचान को अपनी हीनता मानने लगते हैं, तभी कोई भाषा हमारी जिंदगी से कटती चली जाती है।

यही वजह है कि भाषाएं हमारे परिवेश से सिमटती जा रही हैं। उदाहरण के लिए, अमेरिका में बिहारी और राजस्थानी बोलने वालों की संख्या अन्य भाषाओं की तुलना में बेहद कम है। नेपाली, उर्दू, अरबी आदि बोलने वालों की संख्या भी लाख से ज्यादा है। इससे दो तरह के संकेत निकलते हैं। पहला, इन भाषााओं को बोलने वाले उस देश में ज्यादा संख्या में विस्थापित हो चुके हैं। दूसरा, जिनकी संख्या कम है, वे एक कुंठा के शिकार हैं। संभव है कि वे अपनी भाषा के इस्तेमाल में दबाव महसूस करते हों।

व्यक्ति के विस्थापन के साथ भाषायी और उसका सांस्कृतिक विस्थापन भी जुड़ा हुआ है। यही वजह है कि एक भाषा में कई भाषाओं की आवाजाही साफ नजर आती है। हिंदी में विभिन्न बोलियों, भाषाओं के शब्द सहज ही मिल जाएंगे। मसलन, भोजपुरी, अवधी, उर्दू, अरबी, फारसी, अंग्रेजी आदि। एक विमर्श भाषा में यह भी है कि शुद्धतावादी इस प्रवृत्ति को भाषा की दृष्टि से उचित नहीं मानते। उनकी नजर में यह भाषा को गंदला करना है। इस तर्क के आधार पर हिंदी से उर्दू, फारसी, अरबी शब्दों को निकाल बाहर करने के लिए आवाज समय-समय पर उठती रही हैं। लेकिन भाषा को समृद्ध करने के लिए जरूरी है कि अन्य भाषाओं के बीच संवाद स्थापित किया जाए और भाषायी आवाजाही को बढ़ावा दिया जाए।

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