December 05, 2016

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सपनों का कारोबार

इस पत्रिका ने बहुजन समाज की नब्ज पहचान कर यह उम्मीद भी जताई कि इस दिवाली पर भगाएं दरिद्रता, पाएं धन-धान्य। राजा दुबे का लेख

Author November 7, 2016 04:54 am
दिवाली।

राजा दुबे

दिवाली बीत गई। इस मौके पर कुछ पत्रिकाओं की ओर से विशेषांक निकालने की एक स्वस्थ परंपरा रही है। बल्कि बिरले ही कोई पत्रिका होगी, जो दिवाली पर अपने विशेषांक न निकालती हो। मगर ज्योतिष, धर्म और अध्यात्म पर केंद्रित पत्रिकाओं के दिवाली पर भारी-भरकम और कई उपहारों वाले समग्र विशेषांक प्रकाशित होते हैं, उनका स्वरूप क्या होता है? व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं और आस्था का शोषण बाजार कैसे करता है, ये विशेषांक इसके उदाहरण हैं। इस बार भी इस तरह की कुछ पत्रिकाओं के विशेषांक पढ़ने के बाद लगा कि इन सभी का मूल स्वर पाठकों को सुख, समृद्धि और संपन्नता के सपने दिखाने और इस बहाने अपनी संपन्नता को सुनिश्चित करने वाला है।

इस तरह की पत्रिकाएं, मसलन तंत्र, ज्योतिष, भविष्य के समाचार, ग्रहों के खेल पर आधारित पत्रिकाओं ने औसतन सौ-सौ पृष्ठों के विशेषांक छापे। तंत्र और ज्योतिष के दावे पर निकलने वाली एक पत्रिका ने तो आमुख सहित दो सौ पृष्ठों का विशेषांक छापा। इसी विषय पर केंद्रित एक अन्य पत्रिका ने एक साथ दो महीने के अंक बतौर संयुक्तांक छापा और एक अन्य पत्रिका ने तो अक्तूबर 2016 के नियमित अंक के साथ पेश किया अक्तूबर का ‘अतिरिक्त’ अंक। गोया दिवाली एक मौका है, उसे चाहे जितना भुना लिया जाए।

इन पत्रिकाओं के विशेषांकों के जरिए सपने सजाने और बेचने की शुरुआत मुखपृष्ठों से ही हो जाती है। उदाहरण के लिए तंत्र, ज्योतिष के दावे वाली पत्रिका ने लिखा- ‘दिवाली पर भौतिक समृद्धि के एक सौ पचास स्वर्णिम सूत्र!’ अब कोई भी यह अंदाजा लगा सकता है कि अगर एक सौ पचास सूत्रों पर अमल की बात सोची भी जाए तो उसके लिए कितना श्रम और समय लगेगा! सलाह के मुताबिक असल में ये डेढ़ सौ सूत्र कुल मिला कर सीधा-सीधा साधना का मार्ग है। सवाल है कि पाठक अगर ये साधनाएं नहीं कर पाया या करने के बाद भी कुछ हासिल नहीं हुआ तो? दिलचस्प यह है कि इस सवाल पर पत्रिका वाले कह देंगे कि हमने तो सुझाए थे स्वर्णिम सूत्र, अब वह आपकी किस्मत में नहीं तो हम क्या करें! भविष्य के समाचार बताने वाली एक पत्रिका ने ‘अक्षय धन प्राप्ति के उपाय’ और लक्ष्मी को प्रसन्न करने के अद्वितीय सूत्र भी बताए।

लक्ष्मी प्राप्ति के स्वर्णिम सूत्र बताने की होड़ में ग्रहों के खेल वाली पत्रिका भी पीछे नहीं रहना चाहती थी। इस पत्रिका ने बहुजन समाज की नब्ज पहचान कर यह उम्मीद भी जताई कि इस दिवाली पर भगाएं दरिद्रता, पाएं धन-धान्य। इस पत्रिका ने बहुजन समाज की नब्ज पहचान कर यह उम्मीद भी जताई कि इस दिवाली पर भगाएं दरिद्रता, पाएं धन-धान्य। संपन्नता बढ़ाने के उपाय सुझाने की इस होड़ में ज्योतिष विद्या का कथित समंदर परोसने वाली पत्रिका ने भी लक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए प्रयोग सुझाने के साथ-साथ यह भी बताया कि ‘जानिए, आपको किसके द्वारा धन प्राप्त होगा?’ यानी वंचना की चौतरफा मार इस सपने के जाल में फंसने वाले को ही झेलनी है।

जिस प्रकार इ-कॉमर्स कंपनियों ने भारी रियायत को अपनी सफलता का मूलमंत्र बना लिया है, उसी तर्ज पर इन धर्म, अध्यात्म और तंत्र-मंत्र की पत्रिकाओं ने भी उपहारों को अपनी लोकप्रियता और बाजार बढ़ाने का जरिया बना रखा है। श्रीयंत्र, कुबेर यंत्र, दिवाली पूजन यंत्र, आय में वृद्धिकारक पॉकेट नित्य दर्शन यंत्र, सुमेरूपृष्ठ श्रीयंत्र, चौबीसा यंत्र और दसमहाविद्या यंत्र जैसे बीसियों यंत्र लोगों को भरमाने के लिए परोसे जा रहे हैं। इसके अलावा, ‘धनवान कैसे बनें’ और ‘भाग्योदय कैसे’ जैसी पुस्तिकाएं कई तरह के पोस्टर इन अंकों के साथ मुफ्त थे। लक्ष्मीपूजा की मार्फत समृद्धि का सपना देखने वाले पाठकों को ये उपहार खूब लुभाते हैं। हर अंक के साथ पूजा सामग्री का पैकेट देकर भी पाठकों को आकर्षित किया जाता है। ऐसी स्थिति में इन उपहारों के बीच धर्म में आस्था रखने वाले और कमोबेश धर्मभीरू पाठकों के लिए इन पत्रिकाओं के लिए खरीदने का लोभ संवरण आसान नहीं होता है।

समृद्धि और संपन्नता मानव-मात्र की शाश्वत चाह है और इस फेर में मेहनत-मशक्कत करने के बजाय लगभग हर शख्श यह कोशिश करता है कि वह अपार धन प्राप्ति का कोई चामत्कारिक, सरल और सुगम रास्ता तलाश ले। इसी चक्कर में वह संपन्नता का शॉर्टकट ढूंढ़ता है और धर्म-अध्यात्म की इस तरह की पत्रिकाएं उसकी इस इच्छा का कारोबार करती हैं। लेकिन क्या वाकई साधना, आराधना और यंत्र-मंत्र-तंत्र से धन के आगमन की राह आसान होती है? जो सपना ये पत्रिकाएं अपने पाठकों की आंखों में बोती हैं, क्या वे कभी फलेंगे भी? क्या यह धर्म या आध्यात्म के नाम पर छल नहीं है? क्या यह लोगों का अपने ऊपर से भरोसा कमजोर करके अंधविश्वास के जाल में और गहरे धंसाने का खेल नहीं है? जो भी हो, संपन्नता की चाह में जन सामान्य का ठगा जाना जारी है और किसी नियमन के अभाव में सपनों का यह कारोबार जारी है।

 

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First Published on November 7, 2016 4:54 am

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