May 26, 2017

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दुनिया मेरे आगेः सभ्य होने की चेतना

मैं उस विवाह समारोह में लोगों से मिल-जुल रही थी कि इसी बीच बहुत अच्छा कपड़ा पहने एक लड़का आया, मुझे ‘नमस्ते दीदी’ बोला, फिर पूछा- ‘कैसी हैं दीदी!’

प्रतीकात्मक तस्वीर

मैं उस विवाह समारोह में लोगों से मिल-जुल रही थी कि इसी बीच बहुत अच्छा कपड़ा पहने एक लड़का आया, मुझे ‘नमस्ते दीदी’ बोला, फिर पूछा- ‘कैसी हैं दीदी!’ मैंने जब उसे गौर से देखा तब पहचाना कि मेरे घर के काम में सहायता करने वाला वह लड़का था। वह सड़क और गलियों की सफाई करने की सरकारी नौकरी करता था और वक्त बचने पर आसपास के घरों में टॉयलेट साफ करके कुछ अतिरिक्त कमा लेता था। बचाए हुए पैसों से वह पढ़ाई कर रहा है। मैंने गर्मजोशी से उसका स्वागत करते हुए कहा कि वाह, आज तुम बहुत अच्छे लग रहे हो। दरअसल, मैंने अब तक उसे इस तरह साफ-सुथरी शक्ल में नहीं देखा था। हो सकता है कि किन्हीं वजहों से काम करते हुए वह सामान्य कपड़े पहनता हो, लेकिन आज उसने अपने लिए बनवाए गए शायद सबसे अच्छे कपड़े पहने थे। उसने मेरे भतीजे का नाम लेकर कहा कि भइया ने अपनी शादी पर मुझे आने के लिए कहा था, इसलिए आ गया। मैंने गौर किया कि वह लगातार संकोच कर रहा था और एक ओर खड़ा होकर बाकी लोगों को देख रहा था। उसकी झिझक दूर करने के लिए मैं अपने साथ उसकी सेल्फी लेने लगी। इसी बीच मेरी एक परिचित संबंधी वहां आ धमकीं और उन्होंने मुझे आवाज देकर बुलाया। अंदर जाने पर उन्होंने मुझे डांटते हुए कहा कि एक तो मुझे ये नहीं समझ आ रहा है कि इस स्वीपर को शादी में किसने बुलाया और दूसरे, तुम इसे इतना गले लगा कर फोटो क्यों खींच रही हो!

मैं बेहद हैरान थी उनकी बातें सुन कर! ज्यादा दुख इस बात पर हो रहा था कि वे काफी पढ़ी-लिखी थीं। मैंने उन्हें समझाने की कोशिश की कि मेरी नजर में वह मेरे दोस्तों की तरह ही एक व्यक्ति है। लेकिन वे मेरे साथ-साथ भतीजे पर भी नाराज होती रहीं। हालांकि मैंने अपने दोस्तों के बीच उदार और प्रगतिशील के रूप में जानी जाने वाली महिला को देखा था कि कैसे वे टॉयलेट साफ करने वाले उस लड़के को पैसे फेंक कर दिया करती थीं। जब मुझे समझ में आया कि उनके ऐसे व्यवहार का कारण जाति के बारे में उनकी सोच है, तब इस बात पर कई बार उनका मुझसे तीखा झगड़ा भी हुआ था। मैं सोच रही थी कि इतनी पढ़ाई-लिखाई और उदार होने की घोषणा के बाद भी आंटी के दिमाग में जाति को लेकर इस तरह की पिछड़ी और अमानवीय बातें कैसे भरी हुई हैं। ऐसा लगता है कि कुछ लोग बस डिग्री के लिए पढ़ाई करते हैं, लेकिन उनके भीतर चेतना के स्तर पर विकास नहीं हो पाता। शायद शिक्षित होने और वैचारिक रूप से सचमुच प्रगतिशील होने में काफी अंतर है!

यहीं मुझे साबित्रीबाई फुले याद आती हैं, जिन्हें न केवल खुद शिक्षित होने में तमाम सामाजिक बाधाओं का सामना करना पड़ा, बल्कि जब उन्होंने पहली बार लड़कियों के लिए स्कूल खोला तो उन्हें रोकने के लिए सत्ताधारी तबकों ने हर संभव रास्ता अख्तियार किया। जब वे पढ़ाने जाती थीं लोग उनके ऊपर मिट्टी, गोबर और कीचड़ फेंकते थे। हालत यह थी कि वे थैले में एक साड़ी अलग से लेकर जाती थीं, ताकि स्कूल में जाकर बदल लें। उस समय महिलाओं, खासकर दलित-वंचित जातियों की लड़कियों की पढ़ाई के बारे में कोई सोचता भी नहीं था। उन्हें परेशान करने वाले थक गए, लेकिन वे रुकी नहीं। पढ़ाई के साथ-साथ वे बाल-विवाह और सती प्रथा जैसी कुरीतियों के खिलाफ भी काम करती थीं।

सावित्रीबाई फुले के बारे में बताने का संदर्भ यह है कि उनके लिए पढ़ाई-लिखाई केवल सामान्य रूप से शिक्षित होने का मामला नहीं था, बल्कि सामाजिक गैरबराबरी के खिलाफ चेतना के विकास और विस्तार का सवाल भी था। जो शिक्षा मानवीय चेतना की वाहक नहीं बने या गैरबराबरी के खिलाफ लड़ाई को ताकत नहीं दे, उसका क्या मतलब! मेरी वे संबंधी बहुत शिक्षित और धनी हैं और उदार भी मानी जाती हैं। लेकिन इसके बावजूद अगर वे किसी साफ-सफाई करने वाले मेरे भाई या दोस्त जैसे युवक को छूने से भी मना करती हैं तो यह उनकी समूची शिक्षा-दीक्षा और सोच को कठघरे में खड़ा करती है। मेरी नजर में उनके बजाय वह व्यक्ति बेहतर है जो कम पढ़ाई-लिखाई के बावजूद मेरे साथ या खासतौर पर समाज के दलित-वंचित तबकों के साथ बराबरी के साथ पेश आता है।

अगर मुझे मिली शिक्षा घर-परिवार और समाज से मिला धार्मिक व्यवहार या जाति का दंभ किसी से भेदभाव करने के खिलाफ नहीं खड़ा करती है तो वह बेमानी है। अब जब भी मैं उस लड़के का सहमा हुआ चेहरा याद करती हूं तो कई तरह के खयाल आने लगते हैं। ठीक उस वक्त उसे कैसा लगता होगा जब कोई सिर्फ उसकी जाति की वजह से कमतर और दूर रहने लायक बर्ताव करता होगा, मेहनत के पैसे फेंक कर देता होगा। मैं खुद को उसकी जगह रख कर देखती हूं और इस समूची व्यवस्था पर शर्मिंदगी से भर जाती हूं।

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First Published on March 10, 2017 2:25 am

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