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दुनिया मेरे आगेः दफ्न सपने

तब मेरी उम्र कोई पच्चीस वर्ष रही होगी। पूरा परिवार ऐसे तैयार हुआ था जैसे हम मेला देखने जा रहे हों। मेला ही तो था... भाई के लिए लड़की देखने जाना।
Author November 25, 2016 02:59 am
प्रतीकात्मक तस्वीर

कुमकुम सिंह

तब मेरी उम्र कोई पच्चीस वर्ष रही होगी। पूरा परिवार ऐसे तैयार हुआ था जैसे हम मेला देखने जा रहे हों। मेला ही तो था… भाई के लिए लड़की देखने जाना। लड़के की बहन होने की ठसक पता नहीं कहां से मेरे पोर-पोर में घुस गई थी। आज उन दृश्यों को दोहराती हूं तो खुद को लेकर ही एक हिकारत-सी होती है। काश, मैं परवरिश के क्रोशिये से अवचेतन की कमीज में कसीदाकारी की तरह टांक दी गई उन पैबंदों को नोच कर फेंक पाती। हम एक आलीशान कोठी में दाखिल हुए। पूरा परिवार हमारे स्वागत में पंजों पर खड़ा था। कोई बीस लोगों का कुनबा आवभगत में ऐसे जुट गया था जैसे हम उनकी तकदीर की किसी बंद कुंडी की चाबी लेकर आए हों और अगर हम खुश न हुए तो अपने साथ लेकर लौट जाएंगे।
करीब बीस मिनट बाद एक लड़की अपनी बहन के साथ कमरे में दाखिल हुई और मेरे बगल में आकर बैठ गई। एड़ियां फटी, बदन पर सामान्य गुलाबी सूट और गोरा रंग। उम्र तेईस साल और कद-काठी भी मामूली। कुल मिला कर एक सामान्य पहाड़ी लड़की। लेकिन उसमें एक बात अलग थी जो अमूमन ऐसे मौकों पर लड़कियों में नहीं होती। कोई भय, हिचक या संकोच नहीं। वह बेबाक और आत्मविश्वास से लबरेज थी। मैं ठीक से देख पाती कि उसने बात करनी शुरू कर दी। मेरी भौंहें चढ़ गर्इं। अरे! लड़की तो बड़ी ‘तेज’ है। खैर, हमने भाई के साथ उसे बात करने के लिए छोड़ दिया। एक दूसरे को समझने के मौके के नाम पर मध्यवर्ग की इस नाटकीयता का फरेब अब बेहतर समझ में आता है। सारी पटकथा पहले से तय होती है। मां ने लड़की की गोद में नेग रख दिया और मैंने जाते-जाते उसे भाभी पुकार लिया। छह महीने में शादी हो गई और भाभी हमारे घर आ गर्इं। उनके लिए यह शादी जो रही हो, हमारे लिए इसका महत्त्व बस इतना था कि परिवार को संभालने वाला कोई आ गया।

मुझे आज भी याद है जब भाभी विदा होकर घर में दाखिल हुर्इं। घर की इकलौती बेटी जो सब कुछ पीछे छोड़ कर भविष्य के अंधकूप में चलती चली आई थी, मेरे लिए सिर्फ भाभी नाम की सजावट थी। मैं बार-बार उन्हें रूज, मस्कारा, लिपस्टिक और पायल, बिंदी, बिछिया के लिए टोक रही थी। कोई कमी न रहे। खानदान, पड़ोसी, परिचित सब कसर निकालने को तैयार बैठे थे। भाभी अंदर दाखिल हुर्इं। पूजा-पाठ का जंजाल निबटा नहीं कि महिलाओं की फरमाइश शुरू। नई बहू से भजन गवाओ, एक डांस करवाओ, न जाने क्या क्या। उफ्फ… और सबसे बुरा, इसमें मैं सबके साथ थी। बिना यह समझे कि उन पर क्या गुजर रही होगी। पता नहीं किस शक्ल में पिता को खोज रही हों! क्या पता वे मुझमें अपनी दोस्त तलाश रही हों! पर उससे हमें क्या फर्क पड़ता है? उस रोज मैंने जाना कि बहू परिवार की उम्मीदों, महत्त्वाकांक्षाओं और कुंठाओं की पालकी ढोने वाली वह खूबसूरत ‘कहार’ होती है जिसके कंधे कभी दर्द नहीं करने चाहिए।

अगले दिन घर में सिर्फ परिवार के लोग थे। हमें उम्मीद थी भाभी लाल साड़ी पहन कर, सिर पर पल्ला रख कर बाहर आएंगी। वे हरी साड़ी में बिन सिर पर आंचल लिए रसोई में चली गर्इं। मुझे फिर अजीब लगा। ये शर्मार्इं क्यों नहीं? बड़ी तेज हैं! ऐसी बहुत-सी बेकार की बातें। अब सोचती हूं तो जवाब खुद ही पा लेती हूं। वह बेशर्मी नहीं थी, सरलता थी। चालाकी नहीं, सादगी थी। यह उनका खुलापन था कि पहले दिन से ही एक बेगाने घर को ऐसे अपना लिया था जैसे हमेशा से इसी का हिस्सा रही हों। आज भैया-भाभी का पांच साल का बेटा है और दस महीने की बेटी। ऐसा नहीं कि इन बरसों में भाभी से टकराव नहीं हुए। लेकिन वे तो मियां-बीवी, मां-बेटी और बाप-बेटे के भी बीच हुए। पर भाभी के साथ हुए हर टकराव ने उन्हें हमारे और करीब ला दिया। ऐसा लगता है कि भाभी हैं तो घर है। भाभी हंसती हैं तो घर हंसता है। रौनक रहती चौखट पर। लेकिन किसी को पता भी नहीं चलता कि उन्होंने घर की किस उम्मीद के नीचे अपनी किस चाहत को… किन सपनों को चुपके-से दफ्न कर दिया है।

आज इसे बेहतर समझ पाती हूं। खुद को मार कर दूसरों को जिंदा कर देने का यह हुनर न जाने हम औरतों को कौन सिखाता है? जब भी भाभी को देखती हूं तो तेईस साल की वही सहमी, लेकिन साहसी लड़की याद आती है जिसके साथ मैं बहुत स्वार्थी, संकीर्ण और संवेदनहीन थी। काश, मैं अनचाहे अतीत की उन तमाम भित्तियों पर लिख पाती…! मगर क्या यह कहानी केवल भाभी की है! अब सोचती हूं तो यह उन तमाम औरतों की सच्ची कहानी लगती है, जिनके भीतर न जाने कितनी इच्छाएं, खुद को एक व्यक्तित्व बनाने के सपने पलते रहते हैं और बस एक जगह आकर दफ्न हो जाते हैं।

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