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दुनिया मेरे आगेः धरोहर पर बुलडोजर

मस्लहत आमेज होते हैं सियासत के कदम, तू न समझेगा सियासत, तू अभी इंसान है। मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग, चुप कैसे रहूं,हर गजल अब सल्तनत के नाम एक बयान है।
Author September 30, 2017 03:07 am

राजेश सेन

मस्लहत आमेज होते हैं सियासत के कदम, तू न समझेगा सियासत, तू अभी इंसान है। मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग, चुप कैसे रहूं,हर गजल अब सल्तनत के नाम एक बयान है। हिंदी गजलों के बेताज बादशाह और मकबूल शायर-कवि दुष्यंत कुमार आज भले हमारे बीच नहीं हैं मगर उनके ये शेर पढ़ते ही अचानक वे हमारी स्मृतियों में आ प्रकट होते हैं। उन्हें साहित्य-जगत में हिंदी गजलों का ‘गालिब ’ कहा जाता है ! वही गालिब जिनका लिखा हर शेर अपने कहन में गालिबन हकीकत होकर भाषा में एक कहावत के तौर पर शुमार किया जाता रहा है। वैसे ही दुष्यंत कुमार का कहा गया हरेक शेर सच्चाई की गालिबन तीरे-नीमकश मिसाल समझा जाता है। तभी तो उनकी कही हर गजल आज भी सल्तनत के नाम एक मौजूं बयान नजर आती है।

दुर्भाग्य से वही दुष्यंत कुमार आज अपने ही घर भोपाल में अपनी यादों के चिह्नों में बिसरा दिए जा रहे हैं। गौरतलब है कि भोपाल में जहां कभी दुष्यंत कुमार का आशियाना हुआ करता था उस मकान को स्मार्ट होने जा रहे शहर की निर्मम कीमत पर बुल्डोजर चला कर ढहा दिया गया है। ये वही सरकारी आशियाना है जहां दुष्यंत कुमार ने कभी एक सरकारी मुलाजिम के तौर पर रहते हुए अपने जीवन का रचनाधर्मी समय गुजारा था और वहीं रहकर जीवन की आखिरी सांस भी ली थी। कहा तो यह भी जाता है कि उनका कालजयी गजल-संग्रह ‘साये में धूप’ भी उन्होंने इसी आशियाने में रहते हुए रचा था, जो आज हिंदी गजलों को दशा और दिशा देने में एक मील का पत्थर समझा जाता है, और जिसका एक-एक हर्फ आज भी बिगडैÞल व्यवस्था के खिलाफ पारित एक दंडादेश है। गौरतलब यह भी है कि इस संग्रह में समाहित सभी गजलों का एक-एक शेर अपने-आप में एक मुकम्मल दर्शन भी लिए हुए है, ठीक वैसे ही, जैसे कबीर का एक-एक दोहा शोध-लेखकों के लिए पीएचडी करने के लिए अपने भीतर मुकम्मल अर्थ समेटे होता है।

ऐसे कालजयी रचनाकार की अमिट स्मृतियों को एक कृतघ्न समाज के तौर पर भोपाल के स्थानीय निकाय और सरकार द्वारा ऐसे उजाड़ दिया जाना उनके साहित्यिक अवदान के साथ छल जैसा लगता है।
दुष्यंत कुमार का साहित्यिक अवदान और उनकी अमूल्य स्मृतियां न सिर्फ भोपाल शहर या मध्यप्रदेश के लिए संजोने लायक धरोहर है बल्कि समूचे देश के साहित्य-समाज के लिए भी सहेजने वाली नेमत-अमानत जैसी है। किसी ने ऐसी कल्पना भी नहीं की होगी कि उनकी यादों को इस निर्ममता से शहर के विकास की थोथी कीमत पर मिटा-बिसरा दिया जाएगा। यह एक क्रांतिकारी कलमकार के प्रति एक शहर की निजी कृतघ्नता नहीं तो और क्या है कि वह अपने-आप को खूबसूरत बनाने की जुगत में अपनी ही पहचान के अमूल्य-चिह्नों को मिटाने पर आमादा है। कहना जरूरी हुआ जा रहा है कि निश्चित ही यह एक शहर का अपनी पहचान को लेकर एक निहायत साहित्य-हंता कदम है। जाहिर है कि भोपाल शहर की साहित्यिक पहचान में दुष्यंत कुमार के साहित्यिक-अवदान और कद का बहुत बड़ा योगदान है। आज अगर भोपाल के साहित्यकारों की सूची बनती है तो दुष्यंत कुमार का नाम बढ़चढ़ कर लिया जाता है। जब इस शहर को उनके नाम से इतना प्रेम है तो आखिर उनकी धरोहरों का सहेजने में कौन सा नुकसान हो जाता।

खबर तो यह भी है कि अब दुष्यंत कुमार के नाम पर बने संग्रहालय को भी जल्द ही ढहा दिया जाएगा। अगर ऐसा होता है तो यह कदम भोपाल में विकास के कर्णधारों द्वारा शहर को साहित्यिक समृद्धि और विरासत के लिहाज से कुरूप बनाने की कवायद से ज्यादा कुछ नहीं होगा। जब कोई अभिजात्य विकास-क्रम अपने स्वर्णिम अतीत के विराट चिह्नों को बर्बाद कर अपना तथाकथित मेक-अप कर रहा होता है तब वह अपनी ही सुंदरता में दिखाई देने वाली कुरूपता के बदसूरत प्रतिमान भी गढ़ रहा होता है। अंधे शहरी विकास की दौड़ में यह भूला जा रहा है कि दुष्यंत कुमार की पहचान भोपाल से नहीं है। अलबत्ता, अपनी पहचान के लिए कोई भी कालजयी साहित्य-पुरोधा किसी शहर के नाम का मोहताज भी नहीं होता बल्कि आखिरकार उस शहर को ही अपनी पहचान के लिए अपने उस होनहार सृजक की पहचान का मोहताज होना पड़ता है।

लगता तो नहीं लेकिन यह उम्मीद रखनी चाहिए है भोपाल की स्थानीय निकाय व्यवस्था देर-आयद दुरुस्त-आयद की तर्ज पर समझदारी दिखाएगी और अपनी भूल का आज नहीं तो कल अहसास अवश्य करेगी! और वह अपनी भूल को किसी प्रायश्चित मोड़ पर यू-टर्न लेकर सुधार भी लेगी। आखिरकार, किसी भी भटकी हुई व्यवस्था को अक्ल-दाढ़ आने के लिए किसी मुहूर्त विशेष के इंतजार की दरकार तो कतई नहीं होती दुष्यंत कुमार के एक शेर से ही बात करनी पड़ेगी: सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

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