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सपने के बरक्स

दिक्कत शायद यह है कि शिक्षा की इस इकहरी व्यवस्था में हम उन सबको ‘ज्ञान’ ही नहीं मानते।
Author March 7, 2017 06:31 am
समाज में एक वर्ग ऐसा भी होगा जो कहता होगा कि शिक्षा उत्पीड़न से मुक्ति देगी। उस वर्ग के लोग शिक्षा को सुंदर सपने की तरह देखते होंगे और उसे मुक्ति की एकमात्र युक्ति मानते होंगे।

शचींद्र आर्य

समाज में एक वर्ग ऐसा भी होगा जो कहता होगा कि शिक्षा उत्पीड़न से मुक्ति देगी। उस वर्ग के लोग शिक्षा को सुंदर सपने की तरह देखते होंगे और उसे मुक्ति की एकमात्र युक्ति मानते होंगे। मैं यहां ठहर कर कुछ देर सोचना चाहता हूं। उनका शिक्षा से तात्पर्य आखिर क्या है? क्या वे समाज के दमित, उत्पीड़ित, वंचित समुदायों के इस औपचारिक शिक्षा से गुजर जाने की बात कर रहे हैं? वे उन्हें किन कौशलों से युक्त होता देखना चाहते हैं? क्या मौजूदा शिक्षा उनकी वर्तमान विषम परिस्थिति से पर्दा उठाने के लिए पर्याप्त है? हमने इस शिक्षा के ढांचे और शिक्षा से इतनी सारी अपेक्षाएं क्यों बांध रखी हैं, समझ नहीं आता! पिछले कुछ दिनों से जिस जगह पर हूं, वहां शिक्षा की सरकारी योजनाएं अपने लाव-लश्कर के साथ उपस्थित हैं। गांव में ही आठवीं कक्षा तक सरकारी विद्यालय है। मध्याह्न भोजन की समुचित व्यवस्था ग्राम प्रधान की निगरानी में सुचारु रूप से चल रही है। वर्दी आती है, बंट जाती है। सत्र शुरू होने पर किताबें आती हैं, वे भी वितरित हो जाती हैं। पर जितने बच्चे उन कमरों में नहीं हैं, उससे ज्यादा वे उन गलियों, घरों में और बाहर अपने-अपने कामों में व्यस्त हैं। उनकी पढ़ने में रुचि उस स्तर पर नहीं हैं। जब मैं उनसे इसका कारण पूछता हूं तो वे उलटे मुझसे पूछ बैठते हैं। तब उनके इस मूलभूत प्रश्न का मेरे पास कोई जवाब नहीं हैं कि ‘वे पढ़-लिख कर क्या करेंगे!’ जो वे उसके बाद करेंगे, अभी से ही कर रहे हैं।

थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि अगर कोई शिक्षा को सर्वहारा में चेतना का माध्यम देख रहा था, तब तो यहां उसका यह विचार काम नहीं करेगा। ऐसी स्थिति में हमें क्या करना होगा। इस समुदाय का आकार भले छोटा है। लेकिन अगर यह शिक्षा को भविष्य में मिलने वाली नौकरी के साथ जोड़ कर नहीं देखता, तब वह किस तरह का समाज है? क्या उसने हमारी सामाजिक संरचना के सबसे मार्मिक स्थल पर अनजाने ही चोट तो नहीं कर दी? जिस दौड़ में अधिसंख्य लोग बेतहाशा दौड़े जा रहे हैं, उस रास्ते पर एक छोटा समूह चलने से भी मना कर रहा है। उसे यह तो नहीं पता चल गया कि यह शिक्षा उन्हें अपने परिवेश से काट देगी और उन्हें किसी कृत्रिम समाज का सभ्य नागरिक बना कर छोड़ेगी! इतना होने पर भी मेरे सवालों का जवाब मिलता नहीं लगता। क्यों हमें लगता है कि शिक्षा संघर्ष का औजार बनेगी और लोगों को संगठित करेगी? जबकि हम देख रहे हैं कि यह समूचा शैक्षिक ढांचा ही समाज से कटा हुआ है। चेतना शिक्षा लेकर आएगी और उसके अंदर हमारे समाज को बदल देने वाले सवाल उठेंगे। कितना अजीब है ऐसा सोच पाना। मेरे पास इसका अपना उत्तर है, जहां हम सब शायद सामाजिक असमानता को आर्थिक प्रगति से दूर करने के दिवास्वप्न में खुद को व्यस्त कर लिया करते हैं। क्या यहां हम गलती नहीं कर रहे हैं? सिद्धांतकारों की तरह हम भी यह मान कर बैठे हैं और उनकी तरह हम भी शिक्षा को एक उपकरण की तरह देख रहे हैं, जहां उसका संबंध कुछ पेशों और उनसे जुड़े कौशलों से जुड़ता हुआ लगता है।

जहां तक जो पढ़ जाएगा, उसे उस तरह के काम मिलने में सहूलियत होगी। शिक्षाशास्त्री इसमें समाजशास्त्रीय विश्लेषण से जो व्याख्या करते हुए पाए जाएंगे, उसमें वे विषयों को चुनने और उन्हें चुनने वालों के वर्गीय आधार को स्पष्ट देख रहे होंगे। किसके पास सांस्कृतिक पूंजी है और कौन किस तरह के विषयों के रुझानों से संपन्न है, यह लगभग पहले से तय है। इसमें विचलन आरक्षण आदि सरकारी प्रावधानों से देखने को मिलता है, जिसे सब नकारात्मक दृष्टि से देखने के अभ्यस्त हैं। इतना आगे आ जाने पर भी लगता है कि सारी बहस वहीं की वहीं घूम रही है। प्रश्न है कि इस शिक्षा से आगे हम कब सोचना शुरू करेंगे? क्यों हमारी टेक सभी को शिक्षित करने से शुरू होती है? क्यों नहीं हम उन समांतर, वैकल्पिक, अल्पज्ञ ज्ञान कोशों को सृजित और पोषित करने के लिए कुछ करना चाहते? दिक्कत शायद यह है कि शिक्षा की इस इकहरी व्यवस्था में हम उन सबको ‘ज्ञान’ ही नहीं मानते। हमारी परिभाषा में जो इस खांचे में नहीं समाएगा, वह हमारी दृष्टि में हमसे कमतर होगा। लेकिन क्या हमने कभी विचार किया है कि हम उन सबकी निगाह में क्या लगते होंगे जो शिक्षा के पूरे विमर्श को नए सिरे से रचने में किसी भी तरह की रुचि नहीं रखते। उनकी नजर में हम अपने ही बनाए जाल में फंसती जा रही मकड़ी हैं, जिसे यह नहीं पता चल पा रहा कि इस मकड़जाल से बाहर आने का कौन-सा रास्ता उसने छोड़ा था!

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First Published on March 7, 2017 6:31 am

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