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दुनिया मेरे आगेः सप्तपर्णी का शरद

कुछ दिन पहले सांझ का अंधेरा होते ही आसपास की हवा में अचानक एक अजीब-सी मादकता ने कदम रखे।
Author October 15, 2016 02:04 am

कुछ दिन पहले सांझ का अंधेरा होते ही आसपास की हवा में अचानक एक अजीब-सी मादकता ने कदम रखे। एक जिज्ञासा हुई और चल पड़े उसकी खोज में। थोड़ी ही दूर जब एक घने वृक्ष के नीचे पहुंचे तो अचरज, खुशी और कौतूहल के मिले-जुले भाव के साथ पूरा वजूद ही मानो थम गया। मादकता का स्रोत वहीं था। यह सप्तपर्णी थी। गंगा की ओर रुख किए नवोदित कलियां नदी के लिए कोई नया गीत गुनगुना रही थीं। जुड़ी हुई हथेलियों की तरह बने सात पत्तों के कई समूह अपने नवजात पुष्पों को बड़ी कोमलता से थामे जीवन को शारदीय श्रद्धा अर्पित कर रहे थे। सप्तपर्णी की सुरभि में ही उसका समर्पण है, उसकी मादकता में ही उसकी गीतांजलि है। उसके फूल खिले तो समझिए शरद आ गया।

रात जैसे-जैसे गहराती है, कमरे की आधी खुली खिड़कियों के पल्लों को एक ओर धकियाते हुए सप्तपर्णी की जिद्दी सुगंध कमरे में घुसी चली आती है। न पूरी तरह जागने देती है और न सोने देती है। लगता है कि अचानक किसी ने मधुशाला के दरवाजे खोल दिए हों। सप्तपर्णी के साथ कविगुरु रवींद्रनाथ ठाकुर का जिक्र आता है, क्योंकि ‘गीतांजलि’ के कुछ अंश उन्होंने इस वृक्ष के नीचे ही लिखे थे। उनके पिता महर्षि देवेंद्रनाथ ठाकुर सप्तपर्णी या छातिम के नीचे अक्सर ध्यान करते थे, इसका उल्लेख गुरुदेव से संबंधित कई पुस्तकों में आया है। उनके विश्वविद्यालय शांति निकेतन में आज भी दीक्षांत समारोह के समय छात्रों को सप्तपर्णी के गुच्छे दिए जाते हैं। इसके नाम से इसका अर्थ स्पष्ट है- सात पत्तों के गुच्छे होते हैं। इसमें और फूल इन्हीं के बीच उगते हैं। पत्तियां एक गोल समूह में सात-सात के क्रम में लगी होती है और इसी कारण इसे सप्तपर्णी कहा जाता है। बांग्ला भाषा में इसे छातिम कहते हैं।
सप्तपर्णी सदाबहार वृक्ष है। साल भर आपके सामने पूरी मासूमियत के साथ हरा-भरा खड़ा रहेगा, पर इसके दिल में क्या छिपा है, उसका उद्घाटन यह शरद की शुरुआत में ही करता है। इसकी सुरभि में एक तरह की निर्दयता है और वह इसलिए कि यह आपको बहुत बेचैन, हैरान कर देती है। आपको इसके बारे में पता न हो तो आपकी हालत कस्तूरी मृग की तरह हो जाती है और आप इधर-उधर इसकी तलाश में भटकते रहते हैं, जब तक कि कोई अनुभवी माली या वनस्पति शास्त्री नहीं मिल जाता और इस पर रोशनी नहीं डालता। कुछ लोग इसे ‘यक्षिणी का वृक्ष’ भी कहते हैं और मानते हैं कि इस पर यक्षिणी का वास होता है! वह अपनी सुरभि से लोगों को अपने पास आकर्षित करती है और उसके निकट जाने पर उन्हें मार देती है। शायद यही वजह है कि गावों और जंगलों में आदिवासी इसके पास से नहीं गुजरते। पीपल के साथ भी ऐसी ही धारणा जुड़ी है। सबसे अधिक जीवन शक्ति वाले इस सुंदर वृक्ष के संबंध में लोगों का मानना है कि इस पर प्रेतात्माएं बसती हैं। सौंदर्य के साथ कोई अंधविश्वास जोड़ देने में हमारी विकृत सोच को अजीब संतोष मिलता है!

इसके विरोधाभासी गुणों के कारण ही शायद ऐसा होता है, क्योंकि सप्तपर्णी के जितने आशिक हैं, उतने ही इसके रकीब भी हैं। कई लोग यह मानते हैं कि एक तरफ यह कई रोगों की दवा है, पर दूसरी तरफ दमे के रोगियों के लिए बहुत ही खतरनाक है। इसके विरोधी कहते हैं कि यह पेड़ सदाबहार तो होता है, लेकिन इस पर परिंदा भी नहीं बैठता। यह बात पूरी तरह सच नहीं लगती। वास्तव में परागण के दौरान फूलने वाले कई पेड़-पौधों के पराग-कण पॉलेन एलर्जी का कारण बनते हैं और यह बड़ी ही सामान्य किस्म की एलर्जी है। पराग-कणों के प्रति कई लोग संवेदनशील होते हैं और उन्हें इनसे गंभीर एलर्जी भी होती है। सप्तपर्णी का इसमें कोई खास दोष नहीं। परागण हर फलने-फूलने वाले पेड़ पौधों में होता है। प्राकृतिक चिकित्सा के जानकार लोगों के अनुसार प्रसव के बाद माता को अगर इसकी छाल का रस पिलाया जाता है तो उसमें दूध की मात्रा बढ़ जाती है। इसके अलावा, जुकाम, मलेरिया जैसे बुखार, घाव, अल्सर आदि की स्थिति में भी सप्तपर्णी की काफी उपयोगिता मानी जाती है।

अक्सर सोचता हूं कि या तो सप्तपर्णी के लिए ही शरद आता है या शरद के स्वागत के लिए सप्तपर्णी खिलती है! टीएस इलियट ने कविताओं के बारे में कहा था कि वे समझे जाने से पहले ही कुछ संप्रेषित कर देती हैं। सप्तपर्णी भी ऐसी ही कुछ है। इसके बारे में कोई कुछ जाने न जाने, यह अपना संदेश भेज देती है। एडिनबर्ग के वनस्पति शास्त्री प्रो सी एल्स्टन ने पहले इस फूल पर शोध किया था और इसलिए इसका वैज्ञानिक नाम ‘एल्स्टोनिया स्कोलरिस’ पड़ गया। खैर, जब तक सप्तपर्णी दिल में थी, ज्यादा खूबसूरत थी। अब समझ में आई तो थोड़ी मलिन हो गई! उसका अज्ञात और अपरिचित होना ही ज्यादा सुखद था!

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First Published on October 15, 2016 2:03 am

  1. S
    Samak Nagar
    Oct 15, 2016 at 6:25 am
    Name of the writer is missing. Cannot see it anywhere. Kindly mention it.
    Reply
सबरंग