ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगेः सेवा का परदा

बात उन दिनों की है जब मेरा दाखिला दिल्ली के एक प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय में सामाजिक कार्य पाठ्यक्रम में हुआ था। उस समय उसमें दाखिला लेकर मुझे बहुत खुशी हो रही थी तो उसके दो मुख्य कारण थे।
(File Photo)

बात उन दिनों की है जब मेरा दाखिला दिल्ली के एक प्रतिष्ठित केंद्रीय विश्वविद्यालय में सामाजिक कार्य पाठ्यक्रम में हुआ था। उस समय उसमें दाखिला लेकर मुझे बहुत खुशी हो रही थी तो उसके दो मुख्य कारण थे। पहला, मैं जिस क्षेत्र से संबंध रखता हूं, वह आर्थिक, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से हरियाणा के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में गिना जाता है। इसलिए मैंने सोचा कि सोशल वर्क का पाठ्यक्रम पूरा कर मैं पेशेवर रूप से अपने क्षेत्र की बेहतरी के काम करूंगा। दूसरा, स्कूली जीवन से ही सामाजिक कार्यों में मेरी विशेष रुचि रही है। किसी सामाजिक मुद्दे को लेकर जब भी कोई कार्यक्रम आयोजित होता तो मैं उसमें बढ़-चढ़ कर भाग लेता रहा हूं। उन दिनों राजस्थान में लगने वाले मेवात क्षेत्र के गोपालगढ़ कस्बे में धार्मिक स्थल के जमीनी विवाद को लेकर दो समुदायों के बीच सांप्रदायिक दंगा हुआ था। उसी के सिलसिले में कुछ समाजसेवी संगठनों ने जंतर-मंतर पर धरना-प्रदर्शन का आयोजन किया था। जब मुझे यह पता चला तो मैं बड़ी उत्सुकता के साथ उसमें शामिल होने के लिए जंतर-मंतर पहुंच गया। लेकिन वहां पहुंच कर देखा कि उस क्षेत्र के दो प्रतिष्ठित समाजसेवी संगठन धरना-प्रदर्शन को लेकर आपस में बहस कर रहे हैं। उस समय हालात यह थे कि एक संगठन के लोग बोल रहे थे कि ‘हमारे साथ धरना-प्रदर्शन करो’ तो दूसरे समाजसेवी संगठन के लोग भी यही बोल रहे थे। लेकिन कुछ समय बाद आपस में बातचीत के बाद दोनों संगठनों के लोग एक साथ धरना-प्रदर्शन करने पर सहमत हो गए। इसके बाद भाषणों का दौर शुरू हुआ, जिसमें लगभग हर समाजसेवी के मुख्य विचार इस प्रकार थे- ‘हम बहुत पिछड़े हैं, हमें कुछ करना होगा, कुछ करो, हम तुम्हारे साथ हैं वगैरह।’ उस समय उनके भाषण सुन कर मेरे जैसे युवा साथियों के मन में बहुत सारे विचार उमड़ रहे थे। ऐसा लगा कि जैसे सच में हम बहुत पिछड़े हैं और हमें अपने क्षेत्र के विकास के लिए कुछ करना चाहिए। इस तरह की और भी बातें दिमाग आती थीं। भाषण शुरू होने के साथ ही दोनों संगठनों से जुड़े लोगों ने अपने-अपने रजिस्टर लोगों को पकड़ा दिए, जिनमें नाम, पता, फोन नंबर और व्यवसाय लिखने के कॉलम दिए गए थे। उनमें अपने बारे में जानकारी लिखते हुए मुझे बहुत खुशी हो रही थी, क्योंकि लग रहा था कि जब कभी इस तरह के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे तो मुझे भी बुलाया जाएगा और इस तरह मुझे सामाजिक कार्यक्रमों में भाग लेने का मौका मिलता रहेगा। लेकिन उस वक्त मुझे बिल्कुल भी अंदाजा नहीं था कि वे लोग रजिस्टर में वहां आए लोगों से नाम इसलिए लिखवा रहे थे कि बाद में दिखा सकें कि कितने लोगों ने धरना-प्रदर्शन में भाग लिया है और उनका प्रदर्शन सफल रहा!

बहरहाल, उसके बाद मैंने समाजसेवा के नाम पर अलग-अलग क्षेत्रों में हुए अनेक कार्यक्रमों में भाग लिया। लगभग सभी की रूपरेखा एक जैसी होती है। समाजसेवी आते हैं और लोग ताली बजा कर उनका स्वागत करते हैं, फिर समाजसेवी अपना भाषण शुरू करते हैं। भाषण शुरू होते ही धीरे-धीरे हाथों में एक रजिस्टर आ जाता है, जिसमें अपना नाम, पता, फोन नंबर और व्यवसाय लिखना होता है। कभी-कभी कार्यक्रम में भाग लेने से पहले ही आपके बारे में पूरी जानकारी ले ली जाती है। ध्यान देने लायक बात यह है कि ज्यादातर समाजसेवी किसी भी क्षेत्र के पिछड़ेपन के लिए राजनीतिक लोगों जिम्मेदार मानते हैं। लेकिन दूसरी ओर राजनीतिकों के साथ राजनीतिक कार्यक्रमों में मंच साझा करने के लिए भी वे हमेशा ही उत्साहित दिखते हैं। इनमें से कुछ लोग तो राजनीति में प्रवेश के लिए समाजसेवा के कार्य को शक्तिशाली हथियार मानते हैं।

अकेले मेवात क्षेत्र में करीब पांच हजार गैर-सरकारी संस्थाएं रजिस्टर्ड हैं, जिनमें से केवल पांच-छह संस्थाएं धरातल पर नजर आती हैं। कुछ संस्थाओं की झलक केवल विशेष त्योहारों पर पोस्टरों में दिखाई पड़ती है। पिछले दो दशकों के दौरान तेजी से फली-फूली एनजीओ संस्कृति आर्थिक लाभ और शोहरत का एक साधन बन कर उभरी है। हालांकि कुछ संस्थाएं जमीनी स्तर पर बहुत अच्छा कार्य कर रही हैं, लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम देखने को मिलते हैं। आंकड़ों के मुताबिक पूरे भारत में करीब पैंतीस लाख गैर-सरकारी संस्थाएं पंजीकृत हैं। यानी करीब छह सौ लोगों पर एक संस्था। जबकि पूरे भारत में नौ सौ तैंतालीस लोगों पर एक पुलिसकर्मी है। चिकित्सकों के मामले में भी स्थिति दयनीय है। शिक्षकों के लाखों पद खाली हैं। दूसरी ओर, आज स्थिति यह है कि समाज में रसूख रखने वाले लोग गैरसरकारी संस्था खोल कर बैठे हैं। सामाजिक कार्यक्रमों और टीवी चैनलों पर ये लोग समाजसेवी के रूप में अपनी संस्था के साथ परिचय देते हैं। लेकिन सच्चाई यह है कि इनमें से ज्यादातर लोग समाजसेवा और दूसरों की भलाई के नाम पर अपनी भलाई कर रहे हैं!

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

  1. No Comments.
सबरंग