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दुनिया मेरे आगे: दमन का समाज

हीरो अपनी नायिका से प्रेम तो जता रहा है, लेकिन इस परोक्ष धमकी के साथ कि अगर उसने कभी किसी और से प्रेम करने के बारे में सोचा तो उसका अंजाम अच्छा नहीं होगा!
Author नई दिल्ली | October 13, 2016 03:43 am
इस तस्वीर का इस्तेमाल सिर्फ खबर के प्रस्तुतीकरण के लिए किया गया है।

आजकल रेडियो से पुराने गीत सुन पाना किसी अचंभे से कम नहीं लगता है। सो उस दिन ‘तुम अगर मुझको न चाहो तो कोई बात नहीं… तुम अगर किसी और को चाहोगी तो मुश्किल होगी…’ गीत बजने लगा तो सोचा कि रेडियो की इस शिफ्ट में कौन भला मानुष बैठा होगा! लेकिन अगले ही पल इसी गीत की वजह से मन उद्विग्न हो गया, थोड़ा गुस्सा भी पैदा हुआ। हालांकि कभी यह गीत मुझे भी अच्छा लगता था।

आज इस गीत के मुखड़े को सुन कर ही एक अजीब जुगुप्सा पैदा हुई। हो सकता है कि इस गीत को मनोरंजन के दायरे में समेट कर देखा जाता होगा। लेकिन क्या इसे सिर्फ एक मनोरंजन के तौर पर देखा जा सकता है, जिसमें दर्शकों और श्रोताओं का एक हीरो अपनी नायिका से प्रेम तो जता रहा है, लेकिन इस परोक्ष धमकी के साथ कि अगर उसने कभी किसी और से प्रेम करने के बारे में सोचा तो उसका अंजाम अच्छा नहीं होगा! सवाल है कि नायिका पर किसका कब्जा है और उसे किसके इशारे पर अपनी जिंदगी तय करनी चाहिए! क्यों हीरो की शक्ल में एक पुरुष उसकी जिंदगी, भावनाओं और उसके फैसलों तक को संचालित करेगा? क्या इस तरह के गीतों और धारणाओं को ही एकदम सहजता से लेने का नतीजा नहीं है कि आज अक्सर हमारे सामने ऐसी घटनाएं आ रही हैं जिनमें अगर किसी लड़की ने किसी पुरुष के प्रेम प्रस्ताव को स्वीकार करने से मना कर दिया और अपने बारे में खुद कोई फैसला लिया तो उसे सरेआम चाकुओं से गोद कर मार डाला गया, उसके चेहरे पर तेजाब फेंक दिया गया, उनकी जिंदगी तबाह कर दी गई? कुछ समय पहले दिल्ली में एक लड़के ने सिर्फ ‘नहीं’ कहने के एवज एक लड़की को सड़क पर सबके सामने चाकू से गोद-गोद कर मार डाला, लोग बुत बने देखते रहे। ऐसी घटनाओं में बढ़ोतरी हमारे समाज की सोच और उसकी दिशा का साफ ब्योरा देती है।

अगर किसी ने प्रेम संबंधों से इनकार किया या कोई कई वजहों से मौजूदा प्रेम संबंध से बाहर निकलना चाहता है, तो इसे अपने अहं पर चोट के तौर पर क्यों लिया जाना चाहिए! दरअसल, प्रेम को जीने के एक रास्ते के तौर पर नहीं, बल्कि एक लक्ष्य की तरह देखा जाने लगा है, जिसे साधा नहीं गया तो जीवन को अर्थहीन मान लिया जाता है। प्रेम में नाकामी या इकतरफा प्रेम युवाओं के भीतर समझने और विचार करने की शक्ति को कमजोर करता दिख रहा है। ऐसे कई प्रेमी या तो आत्महत्या कर लेते हैं, लड़की की हत्या कर देते हैं या फिर तेजाबी हमले के अलावा लड़की को ऐसी गहरी चोट पहुंचा देते हैं, जिससे उसे आजीवन असाध्य दर्द और घाव के साथ जीने को विवश होना पड़ता है। किसी लड़की की एक ‘नहीं’ क्या इतनी प्रभावशाली है जो इंसानियत को मीलों पीछे छोड़ कर मर्द को इस कदर बर्बर बना देती है, उसकी सारी संवेदनाएं मर जाती हैं और वह जघन्य अपराध की राह पकड़ लेता है? भावनाएं तो खत्म हो ही रही हैं, लेकिन इस मानसिकता वाले लोगों के दिल से क्या समाज और कानून का डर भी निकल गया है?

जाहिर है, कानून पर अमल और प्रशासन की लचर हालत इसके लिए जिम्मेदार है। लेकिन पारिवारिक और सामाजिक परिवेश इस मानसिकता के लोगों को ऐसा करने के लिए तैयार करता है। बचपन से ही लड़की को लगभग हर बात पर बर्दाश्त करने की ऐसी आदत डाली जाती है कि वह जान देने तक सहन ही करती रह जाती है। कोई छेड़खानी करे, फब्ती कसे, पीछा करे यहां तक कि शारीरिक बदतमीजी करे तो भी चुप रह कर अनदेखी करने की सलाह दी जाती है कि मुंह खोलने पर बदनामी होगी। यानी जो लड़कियां ऐसे अपराधों के खिलाफ कुछ बोलना चाहती भी हैं तो उनकी आवाज को दबा दिया जाता है। उसका यह दमन समाज से लेकर पुलिस तक की ओर से होता है, कभी उल्टे उसकी भाव-भंगिमा या कपड़ों के जरिए लड़कों को उकसाने तो कभी बदनामी से डराने के नाम पर शिकायत दर्ज नहीं करने के तौर पर।

एक व्यक्ति इंसानी, सामाजिक और कानूनी मर्यादाओं को ताक पर रख कर किसी के मान-सम्मान का उल्लंघन करता है, उसके खिलाफ हिंसा करता है, तो ऐसा करने वाले की इज्जत नहीं जाती और जो लड़की भुक्तभोगी और पीड़ित होती है, उसकी ‘इज्जत’ चले जाने की बात की जाती है! आम बोलचाल में लड़की की ‘इज्जत’ चले जाने जैसे शब्दों का प्रयोग कर हम स्त्री के मानवीय अधिकारों का हनन ही करते हैं। स्त्रियों के खिलाफ यौन हिंसा के बीज समाज घर में ही रोपता है। घर का लड़का अपनी बहन को अपने विचार रखने की आजादी के अधिकार से वंचित देखता है तो वह बाकी किसी भी स्त्री की ‘नहीं’ सुनने को तैयार नहीं होता। इसलिए परिवार में ही ऐसी सूझबूझ की जरूरत है जो लड़कियों को निर्भीक बनाए और लड़कों को स्त्री के प्रति इंसानी रवैया अपनाने का पाठ पढ़ाए।

 

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First Published on October 13, 2016 3:38 am

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