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दुनिया मेरे आगेः तबीयत तो ठीक है!

सुबह की सैर के समय उनसे अक्सर भेंट हो जाती। वे नमस्कार वाली मुद्रा के साथ पूछते- ‘स्वस्थ हैं न, तबीयत तो ठीक है?’ मुझे अचरज होता।
Author July 25, 2016 02:56 am

सुबह की सैर के समय उनसे अक्सर भेंट हो जाती। वे नमस्कार वाली मुद्रा के साथ पूछते- ‘स्वस्थ हैं न, तबीयत तो ठीक है?’ मुझे अचरज होता। मैं भी तो इन्हीं की तरह सुबह की सैर कर रहा हूं! बहुत धीमी चाल से नहीं, सामान्य गति से ही। फिर यह ‘तबीयत’ पूछने वाली बात कहां से आ गई? क्या इनको मुझमें कोई ऐसा लक्षण दिखा, जो तबीयत ठीक न होने का संकेत कर रहा हो? भीतर ही भीतर मेरा ध्यान सचमुच तबीयत की ओर चला जाता। कुछ असुविधा-सी महसूस होती। लगता मेरी सीधी-सीधी चाल को, मेरे प्रसन्न मन टहलने को, अचानक ही कोई ‘ब्रेक’ लग गया हो। वे कभी यह नहीं कहते थे कि ‘कैसे हैं?’ ‘तबीयत’ को लेकर ही सवाल करते थे।

एक दिन मैंने उन्हें रुकने का संकेत देकर पूछ लिया- ‘तबीयत की बात आप क्यों पूछते हैं? आपके यह पूछने पर मेरा ध्यान ‘शायद मेरी तबीयत ठीक नहीं है’ की ओर चला जाता है। मेरी तबीयत अभी तक तो ठीक ही है!’ वे अचकचाए, बोले- ‘अरे, यह तो हाल-चाल पूछने का एक ढंग है।’ मैंने कहा- ‘आप यह भी तो पूछ सकते हैं कि ‘आप कैसे हैं?’ ‘तबीयत’ या ‘स्वस्थ तो हैं’ के आते ही एक स्वास्थ्य-चिंता शुरू हो जाना स्वाभाविक है।’ वे सहमत हुए। आपके कहने से यह बात ध्यान में आ रही है कि ऐसा कुछ पूछना, वह भी सैर के समय, ठीक नहीं है। आपने अच्छा किया जो मेरा ध्यान इस आदत की ओर खींचा।

फोन पर भी जब ऐसे ही सवाल कोई करता है, तो मेरे मन में एक गुस्सा-सा फूटता है। अच्छा-खासा हंस-बोल और बतिया रहा था, अब अचानक मुझसे मेरी ही ‘मेडिकल रिपोर्ट’ क्यों मांगी जा रही है! एक दिन नगालैंड में नियुक्त राजभाषा हिंदी के एक अधिकारी का फोन आया। थोड़ी बातचीत के बाद अचानक उस सुदूर बैठे व्यक्ति ने पूछा- ‘और, आपकी तबीयत तो ठीक रहती है न?’ मैंने कुछ गुस्से में ही कहा- ‘यह स्वास्थ्य की बात कहां से आ गई? ठीक न होने पर क्या आप नगालैंड से इसी समय चल पड़ेंगे?’ वे इस तरह के जवाब के लिए तैयार नहीं थे। बोले- ‘अरे, आप नाराज क्यों हो गए! देखिए, जो साठ-सत्तर पार कर गए हों, उनकी तबीयत का हाल पूछना तो फर्ज ठहरा न!’

मुझे लगा यह तो दोहरी मार हो गई! मुझे मेरी उम्र की भी याद दिला दी गई है, मानो इस उम्र में पहुंच कर रोगी हो जाना स्वाभाविक बात हो। मैंने शांत मन से आपत्ति जताई। उन्होंने सफाई दी- ‘देखिए, आपकी तबीयत ठीक न होने पर यह सच है कि मैं यहां से चल तो नहीं पड़ूंगा, पर संवेदना भी तो कोई चीज होती है!’ थोड़ी देर के लिए मैं निरुत्तर-सा हुआ। फिर उनसे कहा- ‘आप समझ सकते हैं, दिन भर में अलग-अलग शहरों-जगहों से मुझे कोई पंद्रह-बीस फोन तो मिलते ही हैं। इनमें अक्सर तबीयत की बात भी कुछ लोग पूछते रहते हैं। तो यह ‘तबीयत’ वाली बात कुछ भारी पड़ जाती है न! इससे एक उकताहट-सी होती है!’ वे भी मेरी बात के कायल हुए।

पर सच बताऊं, आमने-सामने हो या फोन पर, यह ‘तबीयत’ वाली बात हमारे यहां खुद एक व्याधि बनी हुई है। आपको मामूली-सी चोट लगी हो और शरीर के किसी हिस्से में पट्टी बंधी हो तो आपकी खैर नहीं है। बार-बार उसे लेकर आपको कुछ सुनना पड़ेगा और कुछ कहना भी पड़ेगा ही। हरिशंकर परसाई की इसी प्रसंग पर एक तीखी व्यंग्य रचना है। एक सज्जन ‘तबीयत’ के बारे में पूछे जाने के सिलसिले से इतना उकता जाते हैं कि अत्यधिक सामान्य होने का ‘नाटक’ करने लगते हैं, जिससे तबीयत वाली बात आगे बढ़ ही न सके।

यह तो हम सबका अनुभव है कि अगर आप किसी कारण से जरा-सा दुबले हुए नहीं (भले डायटिंग या खुद को फिट रखने के लिए सैर और कसरत के कारण) कि कोई न कोई यह जरूर कह बैठेगा- ‘अरे, क्या हुआ, आप बहुत दुबले लग रहे हैं!’ संभव है किसी हारी-बीमारी के कारण ही ऐसा हुआ हो, पर तब भी क्या यह कहना ठीक है! ऐसे में अगर कोई यह कहे कि ‘आप अच्छे लग रहे हैं’ तो मनोबल बढ़ेगा, पर होता है उलटा। पश्चिमी देशों में जब तक कोई आपका अत्यंत आत्मीय, परिजन या प्रियजन न हो, ‘स्वास्थ्य’ के बारे में कोई आपको कुछ भी पूछ कर परेशान नहीं करता!

मुझे उन लोगों पर गर्व है और वे एक तरह की ताकत आपको देते हैं, जो अपनी ‘निजी’ पीड़ा को, रोग-शोक को अपने स्तर पर झेलते हैं और बेवजह किसी को परेशान नहीं करते। यों भी किसी भी व्यक्ति की मेडिकल रिपोर्ट क्या सार्वजनिक करने की चीज है? लेकिन देखता हूं कि ऐसे लोगों को भी लोगबाग परेशान करने से बाज नहीं आते हैं, भले ही ऐसा वे तथाकथित सदिच्छा के साथ करते हों!

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