December 08, 2016

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दुनिया मेरे आगेः आस्था के आगे

दिल्ली के रोहिणी इलाके में ढाई-तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित उस अस्पताल में उसे पहुंचना था, जहां उसका इलाज पहले से चल रहा था। दरअसल, उसका डायलिसिस वहीं पर होता था।

दिल्ली के रोहिणी इलाके में ढाई-तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित उस अस्पताल में उसे पहुंचना था, जहां उसका इलाज पहले से चल रहा था। दरअसल, उसका डायलिसिस वहीं पर होता था। मगर उतनी ही दूरी को पार करने में उसके पति को डेढ़ घंटे से ज्यादा वक्त लगा, जो अपनी कार से उसे वहां ले जा रहे थे। लेकिन इस देरी से उसकी जीवनलीला समाप्त हो गई। हाल ही में दिल्ली में अत्यधिक प्रदूषण की वजह से हवा में घुटन इस कदर बढ़ गई थी कि यहां से सभी निवासी तबाह थे। उसने पति से कहा कि मेरा दम घुट रहा है, अस्पताल ले चलो। पति ने तुरंत गाड़ी में बिठाया और छोटी बेटी को साथ ले अस्पताल की ओर निकले। लेकिन रास्ते में एक धार्मिक जुलूस के कारण भारी भीड़ में उनकी गाड़ी डेढ़ घंटे जाम में फंसी रही। तब तक परिवार के अन्य सदस्य भी किसी तरह वहां पहुंचे और भीड़ में मौजूद लोगों से अनुरोध करते रहे, हाथ जोड़ते रहे कि मेहरबानी करके गाड़ी निकलने दीजिए, नहीं तो एक की जान चली जाएगी। लेकिन आस्था के नाम पर लगभग उन्माद की स्थिति में पहुंचे लोगों के झूमने की गति धीमी नहीं हुई, ढोल की थाप पर नाचने में वे मस्त रहे। किसी ने गौर करना तक जरूरी नहीं समझा और इस बीच नीरू की नब्ज धीरे-धीरे डूब गई। अस्पताल के गेट तक पहुंचने के पहले ही उसने अंतिम सांस ले ली थी, डॉक्टर ने उसे मृत घोषित करने की औपचारिकता निभाई। नीरू के परिवार के तमाम लोगों के पास खुद को ढांढस बंधाने के सिवा कोई चारा नहीं था। पता नहीं, वे उस धार्मिक जुलूस की रिवायत के बारे में क्या सोच रहे थे। हालांकि घर में खुद उन्होंने वही पूजा की थी।

नीरू की दो बेटियां हैं जो अब किशोरावस्था पार कर चुकी हैं। पूरा परिवार धार्मिक प्रवृत्ति का है, इसलिए पूरा परिवार सांत्वना दे रहा था कि कोई बात नहीं, जब भगवान को यही मंजूर था तो हमें यह भी स्वीकार है। निश्चित तौर पर ऐसी मौत की यह कोई पहली या आखिरी घटना नहीं है जिसमें धर्म की पताका लहराते चल रहे जुलूसों के चलते किसी मरीज को अंतिम सांस गिननी पड़ी हो। उसे किसी तरह तत्काल चिकित्सा सहायता की आवश्यकता थी। लेकिन लोगों के लिए अपना उन्माद प्राथमिक था।

लेकिन केवल धार्मिक जुलूस नहीं, कई बार किसी मंत्री के काफिले के चलते या किसी मुख्यमंत्री के आगमन पर सड़कों पर आवाजाही रोकने के लिए खड़े किए गए प्रतिबंधों के चलते भी ऐसी मौतों की खबर आती हैं। लेकिन क्या ऐसी स्थितियों को हमें यों ही भगवान भरोसे छोड़ देना चाहिए? नेताओं और मंत्रियों के चलते सड़कों पर आवाजाही आम लोगों के लिए क्या रही है, यह छिपा नहीं है। हाल के वर्षों में धार्मिक जुलूसों का सिलसिला और उन्माद ज्यादा तेजी से बढ़ता ही जा रहा है। न तो हमारे यहां सड़कें ऐसी हैं कि इस तरह की भीड़ आराम से गुजरे, न ही नदियां और तालाब ऐसे बचे हैं कि बड़ी संख्या में मूर्तियों के विसर्जन के बाद कोई नदी सामान्य हालत में रह सके। लोग जब आस्था का चश्मा लगा कर धार्मिक जुलूस में सड़क पर उतरते हैं तो एंबुलेंस की आवाज भी उन्हें सुनाई नहीं देती है। एंबुलेंस को लेकर सख्त नियम हैं, लेकिन उनमें से एक का भी पालन नहीं होता। पश्चिमी देशों में अगर एंबुलेंस का सायरन किसी अन्य वाहन के ड्राइवर को सुनाई भी दे तो वह गाड़ी को तुरंत एक किनारे खड़ी कर लेता है, ताकि एंबुलेंस के लिए रास्ता आसान हो जाए।

पिछले दिनों जर्मनी की पूर्व राजधानी बॉन का अनुभव एक युवा साथी बता रही थीं कि किस तरह वे लोग फुटपाथ पर चल रहे थे और पीछे से एंबुलेंस का सायरन सुनाई दिया और देखते ही देखते वाहन किनारे होते गए, गोया उन पर किसी ने जादू की छड़ी घुमा दी हो। अपनी मांगों को लेकर जब जनता प्रदर्शन-धरना करती है तो उसे पुलिस से इजाजत लेनी पड़ती है। यही नहीं, ऐसे विरोध प्रदर्शन के लिए शहरों में जगहें भी निर्धारित की गई हैं। लेकिन आए दिन सड़कों पर अराजकता फैलाने के लिए कहीं कोई प्रशासनिक अड़चन या बाधा नहीं पेश आती, बहाना चाहे आस्था का हो या किसी उत्सव का। नीरू के घर वाले तो अज्ञात लोगों के खिलाफ केस दायर नहीं करेंगे जो सड़क जाम कर ढोल की थाप पर डांस कर रहे थे। उन्हें यह भी पता है कि ऐसा करने की हिम्मत जुटाएं भी तो कुछ हासिल नहीं होगा। लेकिन जनता के प्रबुद्ध कहे गए हिस्से जो इस बढ़ती आक्रामकता से आतंकित हैं और उन्हें अहसास भी है कि कभी कोई नीरू की हालत में पहुंच सकता है, आखिर उन्हें क्या करना चाहिए!

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First Published on November 18, 2016 2:08 am

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