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अफगानिस्तान से पहली मुलाकात मां के जेहन में बसे किस्सों के जरिए हुई थी। बंटवारे के बाद पाकिस्तान की जमीन को दुखी मन से छ़ोड़ने वाली मां अफगानों, पठानों के शौर्य, महिलाओं के पहनावे, सूखे मेवे के स्वाद आदि को लेकर हमारी जानकारी में इजाफा करने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी।
Author August 10, 2015 08:27 am

अफगानिस्तान से पहली मुलाकात मां के जेहन में बसे किस्सों के जरिए हुई थी। बंटवारे के बाद पाकिस्तान की जमीन को दुखी मन से छ़ोड़ने वाली मां अफगानों, पठानों के शौर्य, महिलाओं के पहनावे, सूखे मेवे के स्वाद आदि को लेकर हमारी जानकारी में इजाफा करने का कोई मौका नहीं छोड़ती थी। पर मां के उकेरे गए अफगानिस्तान और आज के उस अफगानिस्तान में बहुत बड़ा फासला साफ नजर आता है, जिसमें पढ़ने-लिखने वाली फरखंदा को निराधार आरोप लगा कर कट्टरपंथी पीट-पीट कर मार डालते हैं और आग के हवाले कर देते हैं।

फरखंदा का कसूर महज यह था कि उसने औरतों को मजहब के बहाने गुमराह करने वालों से आगाह किया। औरतों को रोशनी दिखाने वाली फरखंदा की नसीहत कट्टरपंथियों को शैतान का प्रवचन लगी, उसे एक साथ कई खतरे नजर आए। धर्म के बहाने औरतों को कमजोर बनाए रखने का धंधा चौपट होने से लेकर स्त्री अधिकारों और बदलती दुनिया के उजाले के दूरदराज तक फैलने का खतरा।

खैर, हाल में पटना में संयुक्त राष्ट्र के एक अधिकारी से मुलाकात हुई। इस अफगानिस्तानी व्यक्ति से मैंने कुछ समय पहले काबुल में भीड़ के हाथों मार डाली गई फरखंदा का जिक्र छेड़ा। उन्होंने बहुत उदास लहजे में मुझे बताया कि काबुल के जिस इलाके में उस पढ़ी-लिखी युवती की हत्या कर दी गई, उसके पास ही उसका प्राथमिक विद्यालय था। टीवी पर जो तस्वीरें उन्होंने देखीं, उसमें फरखंदा अपने हमलावरों का सामना कर रही थी। उसकी हत्या के बारे में जो भी अफवाहें पढ़ने-सुनने को मिलीं, पर वह ऐसी मौत की हकदार नहीं थी। उनकी फिक्र के अक्स मेरे जेहन में गहरे उतरने लगे थे।

युद्ध फोटोग्राफर स्लेजिक कनाडा की रहने वाली हैं। उन्होंने 2004-06 के दौरान अफगान संघर्ष और वहां की महिलाओं की वास्तविक हालत को अपने कैमरे में कैद किया था। करीब दो साल पहले दिल्ली में स्लेजिक की छायाचित्र प्रदर्शनी में एक फोटो शमा का भी था। महज चौबीस साल की उम्र में शमा की हत्या इसलिए कर दी गई कि काबुल की उस मशहूर टीवी कलाकार ने विवाह नहीं किया था।

उसके आजाद खयाल के चलते दुश्मनों ने उसे बाड़े में बांधने की कोशिश की। पर वह उन्हें ललकारती रही। आखिर एक दिन उसकी हत्या कर दी गई्र। अफगानिस्तान में औरतों के प्रति बर्बरता और हिंसा थमती नजर नहीं आती। स्त्रियों के अधिकारों के लिए तमाम प्रगतिशील मुहिम के बरक्स किसी महिला की बातें बिना सुने भीड़ द्वारा मार डालना आधुनिक समय की एक बड़ी पीड़ा है। इसके बावजूद फरखंदा की हत्या का विरोध करने वाली महिलाओं ने समाज और सरकार को कम से कम यह संदेश तो पहुंचा ही दिया कि वे बेहतर हालात की हकदार हैं। औरतों ने बेखौफ होकर समाज को ललकारा। अपने-अपने घरों से बाहर निकलीं, उसका जनाजा लेकर गर्इं और खुद ही उसे दफन भी किया। शायद ऐसा पहली मर्तबा हुआ कि औरतों ने ही सारा मोर्चा संभाला। यह पहल स्त्री सशक्तीकरण का एक नया चेहरा मानी जा सकती है। दक्षिण एशिया में महिलाओं को प्रताड़ित करने के लिए न जाने कितनी पुरानी प्रथाएं इक्कीसवीं सदी में भी जारी हैं।

सवाल है कि मानव सभ्यता की विकास यात्रा में महिलाएं कहां खड़ी हैं। एक खबर के मुताबिक करीब चार महीने पहले राजस्थान विधानसभा में एक विधायक ने यह कहा था कि एक आइएएस के कलेक्टर होने के बावजूद इसलिए शादी नहीं हो रही कि सब जगह यह फैलाया जा रहा है कि वह डायन है। जब इतने ऊंचे पद पर बैठी किसी महिला के प्रति समाज का यह सोच है तो गांव की आम महिलाओं के साथ क्या होता होगा! एक अन्य विधायक ने बताया कि लक्ष्मणगढ़ में तो ‘डाकण’ का मंदिर है।

पचास लाख रुपए खर्च करके उसका जीर्णोद्धार किया जा रहा है। जबकि महिलाओं को डायन घोषित कर उन्हें गांव-घर, जायदाद से बेदखल करने या उनकी हत्या कर देने के किस्से देश के कई इलाकों से सुनाई पड़ते रहते हैं। बिहार के जमुई में एक गांधीवादी महिला ने मुझे बताया कि उन्होंने गांव की उन चार महिलाओं को कई दिनों तक आश्रम में आश्रय दिया था, जिन्हें गांव वाले डायन बता कर मारने की कोशिश में थे।

समाज और शासक वर्ग के अपनी सुविधानुसार स्त्री के वजूद को गढ़ने वाले खतरनाक लक्षण लोकतंत्र और मानवाधिकारों की मांग के युग में भी दिखते हैं। जब किसी कस्बे में अपनी पसंद के लड़के से शादी करने पर लड़की को नहर में फेंक दिया जाता हो, भोजन में नमक ज्यादा होने पर पति अपनी पत्नी की जान ले ले तो इक्कीसवीं सदी में भी यह अंधेरा और विकराल लगने लगता है।

 

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