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आंदोलन बनाम अड़ंगा

‘आए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास’। आमजन का काम करने का संकल्प लेकर सत्ता में आए लोग आपसी मनमुटाव की निरर्थकता में लगे हैं। सत्ता में आना और सत्य का सामना करना क्यों विपरीत परिस्थिति दर्शाता है? सत्ता में आने से पहले जो जनकार्य के लोकतांत्रिक हरिभजन की आशा जगाते हैं, वही सत्ता पाते […]
Author April 29, 2015 08:59 am

‘आए थे हरिभजन को, ओटन लगे कपास’। आमजन का काम करने का संकल्प लेकर सत्ता में आए लोग आपसी मनमुटाव की निरर्थकता में लगे हैं। सत्ता में आना और सत्य का सामना करना क्यों विपरीत परिस्थिति दर्शाता है? सत्ता में आने से पहले जो जनकार्य के लोकतांत्रिक हरिभजन की आशा जगाते हैं, वही सत्ता पाते ही पुराने घावों की पपड़ी खुरचने क्यों लग जाते हैं? यह हमारा सामाजिक दुराग्रह है या फिर लोकतांत्रिक कमजोरी? क्यों दिल्ली के जनमानस को उनकी गलती का अहसास कराया जा रहा है? क्यों दिल्ली के सत्तारूढ़ दल का दंगल सामाजिकता को राजनीति से अलग कर देखने पर मजबूर कर रहा है?

आम आदमी पार्टी में छिड़े अहं के टकराव को कैसे समझा और पचाया जाए? ऐसा क्यों होता है कि बदलाव के लिए आंदोलन करने वाले सत्ता पाते ही आंतरिक अनबन में लग जाते हैं? क्यों आंदोलन में अराजकता सह ली जाती है, मगर सत्ता पाने पर केवल अराजक की चलती है? सत्ता ऐसे क्यों बौराती या भौंचक्का करती है कि अपने ही पराए लगने लगते हैं?

आंदोलन के आनंद में पग-पग साथ चलने की कसमें खाने वाले सत्ता पाते ही कदम-कदम पर एक दूसरे को अड़ंगी देने पर आमादा हो जाते हैं। क्या इसी को वैकल्पिक राजनीति का लोकतांत्रिक संदेश मानना चाहिए?

अगर सत्य इतना कड़वा होता है, तो सत्ता में मिठास कहां से आएगी! और अगर सत्ता में समन्वय की मिठास नहीं है तो सत्ता कार्य में सेवाभाव की सामाजिकता कहां से आएगी? क्यों केजरीवाल की ‘आप’ सत्ता में आते ही कपास ओटने में लग गई है? जनमत के उत्तरदायित्व होते हैं, जिन्हें आपसी मनमुटाव और जोड़-तोड़ के मतों की राजनीति से अलग रखने पर ही सेवाकार्य संभव हो सकते हैं।

क्या आंदोलनों का सत्ता परिवर्तन तक ही महत्त्व रहता है? अगर ऐसा है तो फिर सत्ता परिर्वतन के लिए आंदोलन क्यों नहीं होने चाहिए! लेकिन फिर सरकार की स्थिरता का क्या होगा! जनता की भागीदारी के बिना कोई आंदोलन लोकप्रिय या सफल नहीं होते हैं। बेशक आंदोलन चलते रहने चाहिए, लेकिन जनता की भागीदारी की गारंटी कौन ले सकता है और फिर राजनीति में विकल्प का क्या होगा? अगर केजरीवाल गुट को सत्ता पाते ही बदला लेने की जिद थी तो योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार को भी समझना चाहिए था। वे केजरीवाल की सत्ताकांक्षा के हमराही थे। आंदोलन अगर एकजुटता में होते हैं, तो सत्ता कैसे अलग-अलग चलाई जा सकती है?

क्या आंदोलन का उद्देश्य सत्ता के सरोकारों से भिन्न होता है? ‘आप’ को सत्ता तो केजरीवाल की अगुआई में ही मिली थी। जीत में योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण और आनंद कुमार के आदर्श विचार रहे और केजरीवाल और उनके साथियों के जमीनी प्रयास रहे। केजरीवाल को ही दिल्ली के मुख्यमंत्री का उम्मीदवार चुना गया था। ताली कभी एक हाथ से नहीं बजती। दो हाथ अगर एक-दूसरे के लिए सराहना में जुड़ नहीं सकते, तो नम्रता में एक कैसे हो सकते हैं। पूर्ण सत्ता पूरी निर्ममता ही दर्शाती है। यह सच सिद्ध हुआ है कि आंदोलन एकता में होते हैं और सत्ता अकेले में चलाई जाती है।

इसलिए जिन्हें दिल्ली में ‘हरिभजन’ के लिए लाया गया था, उन्हें अपना-अपना कपास ओटना ही राजनीतिक नियति लग रही है। आप की राजनीति में सेवा की नीयत भी चिर-परिचित सत्तानीति में समाई लग रही है। यही सेवा और सत्ता का विरोधाभास है। आंदोलन में अराजकता चलती है, मगर सत्ता में अराजक की चलती है। सड़क पर आंदोलन करने वाले क्यों सरकार चलाने में सत्ता के कीचड़ में सने नजर आ रहे हैं? सड़क की अराजकता में सरकार की नीति और गतिहीनता को साकार किया जा रहा है। जो अराजकता दिखी है, उसकी आशा जनता ने नहीं की थी।

अंदरूनी व्यक्तिगत मतभेदों को नहीं सुलझा पाने की जिम्मेदारी दल के नेता की निर्णायक समझ पर होती है। सत्ता का अहंकार तो सामान्य जन में भी घर करता है। फिर ‘स्वराज’ की बात करने वाले सभ्य समाज में सत्ता आते ही ‘स्वयंराज’ कैसे हावी हो जाता है। आदर्श और वैचारिक राजनीति क्यों अहंकारी सत्ता में बदल जाती है! सत्ता में आते ही ‘आप’ के सेवा शासन के वादे दलीय अनुशासनहीन मुद्दे बन गए हैं।

जनकार्य के जरूरी मुद्दों की परवाह नहीं है। क्या सत्ता के केजरीवाल, आंदोलन के केजरीवाल नहीं रह गए हैं? प्रशांत भूषण, योगेंद्र यादव और आनंद कुमार सरकारी तिकड़म को कम आंक कर आदर्शवाद का झंडा फहराने में लगे हैं। सरकार की कार्यकुशल स्थिरता उसके नेताओं की एकता पर भी केंद्रित रहती है। आखिर जनमत को बांटने में राजनीतिक नुकसान है। सत्ता क्यों विचारवाद को व्यक्तिवाद में बदल देती है और क्यों हरा-भरा बगीचा बनाने आए लोग बेबस घास काटने में लगे हैं?

संदीप जोशी

 

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