May 23, 2017

ताज़ा खबर

 

दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगे- दीवार के पार

उस दिन भी घर से निकलना रोज की तरह ही सामान्य था। मन में कई तरह के कामों को पूरा कर लेने का संकल्प,...

दुनिया मेरे आगे- मेले का झमेला

पड़ोसन के रोने की आवाज कानों में आई तो उनकी फिक्र हुई। सांत्वना देते हुए वजह पूछा तो उन्होंने बताया कि वे हनुमान मंदिर...

दुनिया मेरे आगेः साथ छोड़ गई परछार्इं

आमतौर पर यह माना जाता है कि परछार्इं कभी आपका पीछा नहीं छोड़ती। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि साल में अमूमन दो बार...

दुनिया मेरे आगेः स्वच्छता का ठौर

हाल ही के सर्वेक्षण के बाद मध्यप्रदेश के कुछ शहर देश के स्वच्छ शहरों में शुमार हुए हैं। भोपाल उनमें से दूसरा है और...

दुनिया मेरे आगे- धारणा के बरक्स

सरकारी स्कूलों में काम कर रहे अध्यापकों के प्रति कई प्रकार की धारणाएं बनी हुई हैं। ये धारणाएं शिक्षकों के अपने कर्तव्य से विमुख...

दुनिया मेरे आगे-चिड़िया का मन

कविता और चिड़िया में कोई साम्य हो, न हो, ‘उड़ान’ की अद्भुत क्षमता होती है। दरअसल, यह उड़ान ही दोनों की जीवंतता का रहस्य...

जीवन की सांझ

इधर बहुत दिनों के बाद मेरा अपने एक आत्मीय बुजुर्ग दंपति के घर जाना हुआ।

दुनिया मेरे आगे- स्मृतियों में कलम

हालांकि शब्दों को कागज पर उतारने के लिहाज से देखें तो इसका बहुत विस्तार हुआ है, लेकिन अब उसमें कलम की भूमिका घटी है।...

दुनिया मेरे आगेः समांतर दृश्य

हम किन चीजों से घिरे हुए हैं, यह देखते रहना चाहिए। इससे एक तो हम खुद को स्थित कर पाएंगे और दूसरी बात हमें...

दुनिया मेरे आगेः अधिकारों की चेतना

छत्तीसगढ़ गांवों का प्रदेश है। गांव का जन-जीवन आज भी अपनी लोक-अस्मिता के साथ धड़कता है। आधुनिकता ने कुछ दस्तक तो दे दी है,...

दुनिया मेरे आगेः जिम्मेदारी का घड़ा

गरमी की तपन बढ़ने के साथ ही वैसे लोगों की याद आना लाजिमी है जिन्होंने कभी तालाब बचाने की बात की तो कभी कुएं...

मौसम की आहट

कैसी बारिश होगी, गरमियों में अधिकतम तापमान क्या होगा, पहाड़ों की बर्फ किस गति से पिघलेगी, कितना ठिठुरेंगे मैदानी रहवासी सर्दियों के मौसम...

दुनिया मेरे आगे- धारणाओंं की धुरी

मुझे यह समझ दी कि साफ-सफाई के काम को छोड़ कर कम से कम शहरों में अब बहुत सारे काम-धंधे का धर्म या...

दुनिया मेरे आगे- दूसरों की खातिर

हवा, पानी, खुशबू, रंग, सौंदर्य, फल, फूल ही नहीं, आग, रोशनी और संगीत- सभी औरों के लिए हैं।

दुनिया मेरे आगेः उन बादलों के नाम

मेरा चांद डूबा नहीं था, बस छिप गया था। चांद पर बैठी बूढ़ी अम्मा न जाने कब से चरखे पर सूत कात रही थी।

दुनिया मेरे आगेः छोटे-छोटे झूठ

सुबह-सुबह सबको जल्दी होती है। कोई बस के पीछे भागता है तो कोई अपने बच्चों के साथ स्कूल छोड़ने की जल्दी में दौड़ रहा...

अनदेखी की धरोहर

मैं मुंबई से वास्तुकला में डिग्री लेकर दिल्ली आ गया था। चार-पांच वर्षों से एक प्राइवेट कंपनी में वास्तुकार था।

दुनिया मेरे आगे- सोचने की सीमा

आन्या लिखने की सुविधा के लिए चुना गया एक नाम और उदाहरण भर है। वह इसी साल पहली कक्षा में गई है।

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