January 16, 2017

ताज़ा खबर

 

दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आगे: अलाव के इर्द-गिर्द

गांवों में वक्त के साथ आए अनेक बदलावों के बावजूद परंपरा के प्रयोग लगातार चलते रहते हैं।

दुनिया मेरे आगेः शब्द की संवेदना

कई बार खास संदर्भों में किसी शब्द का प्रयोग उस शब्द और संदर्भ, दोनों को बहस के दायरे में ला खड़ा करता है। विशेष...

दुनिया मेरे आगेः जीवन की खिड़कियां

मेरे पिता ने एक दिन कहा था- जब भी तुम एक अच्छी किताब पढ़ लेती हो, उसी क्षण दुनिया में कहीं और खुल जाता...

दुनिया मेरे आगे: संस्कृति की परतें

एक पर्यटक की हैसियत से मैं पहले भी दिल्ली घूम चुका था, लेकिन चार साल पहले देश की राजधानी में रह कर नौकरी करने...

दुनिया मेरे आगे: गांव का रास्ता

चीन में साम्यवादी पार्टी की सत्ता स्थापित होने के बाद 1953 से ही युवाओं को ग्रामीण क्षेत्र में कृषि कामगारों के पास भेजने की...

बाजार का बुखार

इक्कीसवीं सदी में सीखने और सिखाने के संस्थागत माध्यमों की कड़ी में बाजार और विज्ञापनों का नाम भी जोड़ा जा सकता है।

विवशता की बेटियां

मुझे उसका चेहरा कुछ खिंचा-खिंचा लगा। वह रोज की तरह झाड़ू उठा कर अपने काम में लग गई।

दुनिया मेरे आगेः विश्वास का संकट

पिछले कुछ दिनों से व्यक्तिगत काउंसिलिंग करते हुए कुछ ऐसे अनुभव हुए, जिन्हें जयपुर में कुछ समय पहले हुई आत्महत्या की चार घटनाओं के...

दुनिया मेरे आगेः आत्मपीड़न का साहित्य

अगर साहित्य वास्तव में समाज का दर्पण है तो उसे दर्पण का धर्म निभाना चाहिए। यथार्थ का ईमानदारी से बयान करके, समाज के चेहरे...

दुनिया मेरे आगेः भरोसे के पैमाने

कल्पना के घोड़े पर सवार होकर अंतरिक्ष की सैर करने वाले लोग बहुत बड़ी संख्या में मिल जाते हैं। इसमें बच्चे, युवा लड़के-लड़कियां और...

दुनिया मेरे आगे: सुविधा की संवेदना

आजकल अक्सर मेरे पैर छिल जाते हैं। दरअसल, मैंने भाई के साथ अपनी स्कूटी से जाना शुरू किया है।

दुनिया मेरे आगे: रटना बनाम जानना

हमारे यहां बच्चों के पाठ्यक्रम पर चिंतन बहुत कम होता है। इसीलिए कई दशकों से बच्चे एक तरह की ही अंग्रेजी और हिंदी कविता...

बचेगा वही जो रचेगा

भोर का उजास मन को गढ़ता है, कुछ रचने के लिए। पक्षियों की चहचहाहट से मन उल्लसित होता बहुतेरी बार आकाश बन जाता है।

दुनिया मेरे आगेः यह आखिरी दिन

वर्ष का यह आखिरी दिन भी धीरे-धीरे अस्त होते सूर्य के साथ खत्म हो जाएगा। याद सिर्फ आने वाला कल है जिसे हम सब...

दुनिया मेरे आगेः कब तक बचेंगे हाट

संसार में गुलाबी नगर के नाम से जाना जाने वाला जयपुर शहर अनेक कारणों से विख्यात रहा है। चाहे वह यहां की वास्तुकला हो,...

सपनों के बाजार में

जिंदगी में सपने और सच उन रेल की पटरियों की तरह है जो साथ-साथ तो चलते हैं, लेकिन आपस में मिल नहीं पाते हैं।

नाम बेनाम

पहले आमतौर पर लोग अपने बच्चों का नाम देवी-देवताओं के नाम पर रखते थे।

सीखने के पड़ाव

शिक्षकों की ‘हतई’ यानी चौपाल, जहां कुछ दिन पहले सुबह से ही शिक्षक एकत्र हो गए थे।

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