March 27, 2017

ताज़ा खबर

 

दुनिया मेरे आगे

कहावतों के रंग

हम कह सकते हैं कि कहावत एक ऐसा बिंदु है, जिसमें असंख्य अनुभवों की कड़ियां संयुक्त रहती हैं।

नशे के विरुद्ध

जेएनयू, शिमला, सागर और वर्धा विश्वविद्यालयों के परिसर भी काफी बड़े हैं। लेकिन इनमें से कोई भी विश्वविद्यालय यह दावा नहीं कर सकता कि...

अंतिम अरण्य

गीता में कृष्ण ने कहा है- ‘नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावक: / न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुत:।’

अपने का मोल

भारत में इसका बाजार आज दुनिया के दूसरे देशों की तुलना में कहीं ज्यादा बड़ा हो चुका है। भारत में इन दिनों ‘अपना बच्चा’...

पैसे का पाठ

हमारे राज्य पश्चिम बंगाल के सरकारी और गैरसरकारी स्कूलों में कार्यरत शिक्षकों के लिए आजकल बीएड डिग्री अनिवार्य कर दी गई है।

दुनिया मेरे आगे: तनाव में मुस्कान…

ये घटनाएं नए दौर के काम के तनाव और उनसे उबरने के तात्कालिक और स्थानीय उपायों के उदाहरण हैं।

दुनिया मेरे आगे- भ्रम का भविष्य

हमारा देश दुनिया की बड़ी ताकत बनने जा रहा है और प्रयास, विज्ञान के शिखर पर नए मुहावरे गढ़ रहा है। ऐसे में अखबार...

दुनिया मेरे आगेः रंगकर्म में नौटंकी

पिछले दिनों दिल्ली में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की एक ग्रेजुएट साजिदा के निर्देशन में एक नाटक ‘तमाशा-ए-नौटंकी’ देखने का मौका मिला।

दुनिया मेरे आगेः हर रंग मुहब्बत का

मैं जब बड़ी हो रही थी तो मेरे आसपास अनेक बोली और भाषा के रंग थे। मैथिली, मगही, बांग्ला, उर्दू, पंजाबी, तेलुगू समेत बिहार...

दुनिया मेरे आगे- जिंदगी के घटते नंबर

उस अहसास के आधार पर सोचने को बदला भी है कई बार। क्योंकि सोचने और बात करने और जीने के बीच अगर कोई...

दुनिया मेरे आगे- दिखावे के दिवस

ज्यादा उम्र के लोग भी मात्र पैसा कमाने या उसे जोड़ने के नुस्खों में जुटे हैं। एक-दूसरे की होड़ में न जाने कितना...

रंग रसायन

घर के सब सदस्य मिलजुल कर कमर कस लेते थे। गुझिया, बेसन पापड़ी और मीठे, नमकीन शकलपारे बनाने के लिए। स्वागत में सत्कार का...

दुनिया मेरे आगे: चित्र में होली

होली भारतीय जन-जीवन का सबसे बड़ा और प्रिय त्योहार रहा है। आदि संस्कृति से जुड़ा होने के कारण होली का स्वरूप अत्यंत प्राचीन है।...

दुनिया मेरे आगेः सभ्य होने की चेतना

मैं उस विवाह समारोह में लोगों से मिल-जुल रही थी कि इसी बीच बहुत अच्छा कपड़ा पहने एक लड़का आया, मुझे ‘नमस्ते दीदी’ बोला,...

उम्मीदों के चिराग

यह दूरदराज के किसी पिछड़े ग्रामीण इलाके की बात नहीं है। यह सब हमारे देश की राजधानी दिल्ली में ही हुआ था।

मोर्चे पर स्त्री

हम सभी को तकनीक इस्तेमाल ने सबल और सक्षम बनाया है, अभिव्यक्ति के लिए मंच दिया है तो दूसरी ओर महिलाओं के सामने मुश्किलें...

सपने के बरक्स

दिक्कत शायद यह है कि शिक्षा की इस इकहरी व्यवस्था में हम उन सबको ‘ज्ञान’ ही नहीं मानते।

दुनिया मेरे आगे- अनोखा संगम

मौत की घड़ी के चुनाव यानी स्वैच्छिक मृत्यु को लेकर कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार संरक्षकों के बीच चल रही बहस के पक्ष और विपक्ष...

सबरंग