ताज़ा खबर
 

दुनिया मेरे आगे

दुनिया मेरे आग- उजालों की खेती

वास्तव में रोशनी के अस्तित्व को समझने के लिए अंधेरे का अस्तित्व नितांत जरूरी है। यह अस्तित्व न हो तो अंधेरों को अवश्यंभावी नियति...

विद्यापति का प्रासंगिक होना

इस रिंग सेरेमनी के दो महीने के बाद एक दिन उस लड़के ने लड़की से कहा कि वह शादी नहीं कर सकता क्योंकि वह...

दुनिया मेरे आगेः हाशिए पर जीवन

राजस्थान में भील, बनजारा, गरासिया और गाड़िया लुहार-ये ऐसी वनवासी जनजातियां हैं जिन्हें विकास का आंशिक लाभ भी अभी तक नहीं मिल पाया है।...

दुनिया मेरे आगेः श्रद्धा का दोहन

नित्य की तरह उस दिन घर से कॉलेज जाते समय लाल बत्ती पर आॅटो रुकते ही नौ-दस वर्ष का लड़का छोटी डोलची में सार्इं...

दुनिया मेरे आगे- अंधेरे में लौ की तलाश

आजकल तो ऐसी भविष्यवाणियों के आकलन कुछ नुस्खानुमा या फार्मूला आधार पर भी होने लगे हैं। बेशक ऐसे आकलनों पर ‘धूल में लट्ठ मारने’...

दुनिया मेरे आगे- श्रम का पहाड़

पानी के गदेरे अपने पूरे शबाब पर थे। पहाड़ के हर तरफ से पानी टपक रहा था। सड़क पर फिसलन भी थी पर गाड़ी...

दुनिया मेरे आगे- आधारशिला

मेरी एक परिचित लड़की है शोभा। अपने पति के साथ उसके संबंधों में इतनी तल्खी आ गई कि उसके सास-ससुर ने उसके माता-पिता को...

दुनिया मेरे आगे- रम्य रूप  

महाराणा जयसिंह ने इस झील का निर्माण किया इसलिए यह जयसमंद कहलाया। पर इसका एक और भी नाम है, ढेबर दर्रा।

दुनिया मेरे आगेः बारात की पंगत

लोगों के तरह-तरह के शौक होते हैं। कुछ लोग बारातों में जाने के शौकीन होते हैं, बल्कि यह कहिए कि वे जन्मजात बाराती होते...

दुनिया मेरे आगेः विकास के निशां

उसे देखकर कई भाव उभरते हैं। लगता है, किसी ने अमरूद का आधा हिस्सा खाकर फेंक दिया हो। या कि किसी ने बर्थडे की...

दुनिया मेरे आगे- आधुनिकता और स्त्री

स्त्री का संघर्ष ज्यादा बड़ा है। हमारा समाज कहता तो है कि आज की नारी पूरी तरह आजाद है लेकिन यह सिर्फ एक बड़बोलापन...

दुनिया मेरे आगे-नेकी और बदी

कुछ दिन पहले की बात है मेरे शहर का एक युवा रात को भोजन के बाद टहलने निकला। निश्चिंत होकर टहलने के मूड में...

दुनिया मेरे आगे- आॅस्कर की आस

अभी राजकुमार राव की फिल्म न्यूटन को आॅस्कर के लिए भेजा गया है, प्रचार इसी बात का किया गया प्रदर्शन के वक्त। क्या परीक्षा...

दुनिया मेरे आगे – ताकतवर ज्ञान

हम इनकी असफलता को स्वाभाविक घटना मानते हैं जिसमें शिक्षा व्यवस्था की कोई भूमिका नहीं है। यह व्याख्या संसाधन की उपलब्धता और सीखने के...

दुनिया मेरे आगेः धरोहर पर बुलडोजर

मस्लहत आमेज होते हैं सियासत के कदम, तू न समझेगा सियासत, तू अभी इंसान है। मुझमें रहते हैं करोड़ों लोग, चुप कैसे रहूं,हर गजल...

दुनिया मेरे आगेः हिंदी का बाजार

तीन सौ साठ डिग्री का पूरा एक चक्कर लगाकर घड़ी की सुइयां पूरा करती हैं एक दिन।

दुनिया मेरे आगे – परदेस में अपनी बोली बानी

अपनी भाषा-बोली से लगाव, दुनिया की दूसरी भाषाओं और संस्कृतियों को समझने और उनके अंतर्संबंध की खोज की लालसा पैदा करता है।

दुनिया मेरे आगे- बच्चे कहां हैं महफूज

जब स्कूलों में बच्चों के साथ गलत हरकतें की जाती हैं तो समाज को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि आखिर हमारे...

सबरंग