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पिछले दिनों पूर्वी दिल्ली नगर निगम के उर्दू शिक्षकों के लिए टेक महिंद्रा फाउंडेशन में तीन दिवसीय उर्दू शिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में महज ग्यारह प्रतिभागी आए थे। हम अक्सर तमाम रिपोर्ट के हवाले से कहते रहते हैं कि छठी और आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को दूसरी या तीसरी […]

Author July 16, 2015 08:34 am

पिछले दिनों पूर्वी दिल्ली नगर निगम के उर्दू शिक्षकों के लिए टेक महिंद्रा फाउंडेशन में तीन दिवसीय उर्दू शिक्षण कार्यशाला का आयोजन किया गया। इस कार्यशाला में महज ग्यारह प्रतिभागी आए थे। हम अक्सर तमाम रिपोर्ट के हवाले से कहते रहते हैं कि छठी और आठवीं कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों को दूसरी या तीसरी कक्षा की भाषायी समझ और गणित की दक्षता नहीं है। यहां तो शिक्षकों का आलम संतोषजनक भी नहीं था।

गौरतलब है कि दिल्ली में उर्दू माध्यम के स्कूल और शिक्षकों की खासी कमी है। उर्दू शिक्षकों की नियुक्ति 1990 के बाद से नहीं हुई। एक अध्यापिका ने बताया- ‘अब बच्चे उर्दू माध्यम से पढ़ना नहीं चाहते!’ दरअसल, कई बार छठी और आठवीं में आ चुके बच्चे बताते हैं कि उन्हें उर्दू में पढ़ाने वाला कोई नहीं है। विज्ञान, गणित, समाज विज्ञान को उन्हें हिंदी माध्यम में पढ़ाया जाता है, जो उन्हें समझ नहीं आता। यह एक बड़ा कारण है कि बच्चे या फिर अभिभावक अब खुद नहीं चाहते कि उनका बच्चा उर्दू माध्यम से तालीम हासिल करे। उर्दू बतौर भाषा और विषय के तौर पर पूरे भारत में पढ़ाई जा रही है। अफसोसजनक यह है कि इस भाषा के साथ राजनीतिक बर्ताव तो होते हैं, लेकिन इसके विकास और उन्नयन के लिए पुख्ता कदम नहीं उठाए गए हैं।

अक्सर भाषायी गोष्ठियों में यह सवाल बड़ी शिद्दत से उठाया जाता है कि उर्दू और हिंदी को दो नजरिए से देखा जाता रहा है। एक ओर हिंदी और दूसरे मुहाने पर खड़ी उर्दू हमेशा से ही उपेक्षित रही है। यह तर्क देने वाले भूल जाते हैं कि आमफहम भाषा में उर्दू का समावेश जिस सहजता के साथ होता आया है, उसे देखते-सुनते हुए इसका इल्म भी नहीं होता कि हिंदी में उर्दू इस कदर गुंफित है कि उसे निकालना संभव नहीं है।

अगर उर्दू, अरबी, फारसी के शब्दों को हिंदी से बाहर कर दें तो वह कैसी हिंदी होगी, इसका अनुमान लगाना कठिन नहीं है। हाल ही में मानव संसाधन मंत्रालय को सुझाव दिए गए कि हिंदी से उर्दू, अरबी, फारसी के शब्दों, मसलन दोस्त, अखबार, दफ्तर, बाजार आदि को निकाल बाहर करना चाहिए। इसके लिए दिए गए तर्क को सुन कर हंसी ही आ सकती है कि इससे हिंदी खराब हो रही है। इस तरह हिंदी अशुद्ध हो रही है।

इन तर्कों की मंशा से साफ जाहिर है कि यह एक खास वैचारिक पूर्वग्रह से उठाई गई मांग है। जबकि भाषा विज्ञान के लिहाज से विचार करें तो पाएंगे कि किसी भी भाषा में विभिन्न बोलियों, भाषाओं के शब्द उन्हें खराब करने के बजाय उन्हें सवंर्धित ही करते हैं। सच तो यह है कि भाषा की छटाएं विभिन्न भाषा-बोलियों के शब्दों से और भी प्रभावकारी हो जाती हैं। जो लोग भाषायी शुद्धता के तर्क पर हिंदी और उर्दू को अलग करना चाहते हैं, उन्हें इस पर भी विचार करना होगा कि क्या वे गंगा-जमुनी संस्कृति यानी हिंदी-उर्दू की मिली-जुली तहजीब को विलगाना चाहते हैं? क्या वे चाहते हैं कि भाषायी संघर्ष को बढ़ाया जाए?

आज उर्दू की हालत कुछ तो राजनीति और कुछ भाषायी शुद्धतावादियों की वजह से खराब है। अगर उर्दू भाषा को एक खास वर्ग, जाति, धर्म और संप्रदाय से अलग करके देखने की कोशिश करें तो पाएंगे कि वह जुबान हिंदुस्तानियों की आज भी रही है। आजादी के बाद की जो पीढ़ी जिंदा है, वह पंजाबी और हिंदू परिवार आज भी उर्दू के अखबारों को चाव से पढ़ते हैं। उनकी पंजाबी भी कहीं न कहीं उर्दू के साथ गलबहियां किया करती है।

कौशलेंद्र प्रपन्न

 

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First Published on July 16, 2015 8:34 am

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