April 27, 2017

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लेह में सिनेमा

लेह (लद्दाख) की खूबसूरती को हिंदी की कई फिल्मों में उतारा गया है, वह चाहे ‘जब तक है जान’ हो या ‘थ्री इडियट’। ‘थ्री इडियट’ की शूटिंग यहां के ड्रुक वाइट लोटस स्कूल में हुई थी, जिसे अब रैंचो स्कूल के नाम से पूरे लेह में जाना जाता है। पैन्गोंग झील को पूरे देश में […]

Author July 21, 2015 08:31 am

लेह (लद्दाख) की खूबसूरती को हिंदी की कई फिल्मों में उतारा गया है, वह चाहे ‘जब तक है जान’ हो या ‘थ्री इडियट’। ‘थ्री इडियट’ की शूटिंग यहां के ड्रुक वाइट लोटस स्कूल में हुई थी, जिसे अब रैंचो स्कूल के नाम से पूरे लेह में जाना जाता है। पैन्गोंग झील को पूरे देश में लोकप्रिय बनाने का श्रेय भी इसी फिल्म को जाता है। लेकिन अगर आपका इन फिल्मों को लेह में देखने का मन करे तो निराशा हाथ लगेगी, क्योंकि लेह में कोई सिनेमा हॉल नहीं है। दशकों पहले दर्शकों की कमी के चलते लेह का एकमात्र सिनेमा हाल बंद हो गया था और यहां की एक पूरी पीढ़ी सिनेमा हॉल में फिल्म देखे बिना बड़ी हो गई।

कश्मीर घाटी में जहां सिनेमा हॉल बंद होने का कारण राजनीतिकों और कट्टरपंथियों का हस्तक्षेप था, वहीं लेह-लद्दाख में इसकी वजह पूरी तरह सामाजिक थी। यहां फिल्में हॉल में देखने का चलन नहीं रहा। जब जिले में एकमात्र सिनेमा हाल था तो वहां नई फिल्में कभी नहीं लगती थीं। पुरानी फिल्मों को देखने जाने वालों में ज्यादातर वे मजदूर होते थे जो रोजी-रोटी की तलाश में दूसरे राज्यों से वहां आते थे। ऐसे में यहां फिल्म देखने की कोई संस्कृति विकसित नहीं हो पाई। उदारीकरण के रंग में अब लेह भी रंगने लग गया है और लोगों को मल्टीप्लेक्स सिनेमा हॉल की कमी खलती है। अब यह कमी कुछ हद तक पूरी होती लग रही है।

फिल्मों के शौकीन और पूर्व में पत्रकारिता एवं जनसंचार के प्रोफेसर रहे लेह के जिलाधिकारी सौगत बिस्वास को बीती फरवरी में पता चला कि यहां के लोग सिनेमा हॉल में जाकर फिल्में देखने के शौकीन नहीं हैं। चूंकि कोई बाजार है नहीं, इसलिए कोई सिनेमा हॉल या मल्टीप्लेक्स में निवेश नहीं करना चाहता। उन्होंने अपने पुराने ज्ञान का प्रयोग करते हुए एक अभिनव शुरुआत की और लेह के एक कभी-कभार प्रयोग में आने वाले सभागार को एक छोटे सिनेमा हॉल में बदल दिया।

फिर शहर के सभी सरकारी और निजी स्कूलों के लिए हफ्ते के हर शनिवार हिंदी, अंगरेजी की फिल्में और वृत्तचित्र बच्चों को सिनेमा हॉल के अनुभव के साथ मुफ्त में दिखाना शुरू किया। सरकारी स्कूलों के बच्चों के सभागार तक आने के लिए वाहन भी मुफ्त उपलब्ध कराए। लैमडॉन मॉडल सीनियर सेकेंडरी स्कूल के प्रधानाध्यापक एशे तुंदुप ने बताया कि सिनेमा बच्चों की जरूरत के हिसाब से दिखाया जा रहा है। पीएसबीटी द्वारा बनाए गए जो वृत्तचित्र सिर्फ अकादमिक जगत के बीच रह जाते थे, आज उन्हें लेह के लोग देख रहे हैं।

जबकि लेह-लद्दाख को केंद्र में रख कर कई शानदार वृत्तचित्र बने हैं। पर यहां के लोग उनके बारे में जानते भी नहीं थे। दसवीं की एक छात्रा सोनम ने फिल्म देखने के अनुभव के बारे में बताया कि सिनेमा कैसा होता है, यह पहली बार पता चला। जाहिरा के लिए वृत्तचित्र हॉल में देखने का अनुभव बहुत मजेदार रहा और रोज की नीरस जिंदगी से मुक्ति मिली। एक छात्रा शहर को उम्मीद है कि इस तरह के प्रयासों से एक दिन लेह में सिनेमा हॉल खुलेगा। खुद जिलाधिकारी सौगत बिस्वास का मानना है कि उनके इस प्रयास से सिनेमा देखने की संस्कृति विकसित होगी। बहरहाल, हम तो यही उम्मीद करेंगे की यहां के लोग भी कभी बड़े परदे पर लद्दाख की खूबसूरती को देख पाएंगे। अब शहर के बच्चे बिस्वास को ‘फिल्म वाले अंकल’ कहने लगे हैं।

मुकुल श्रीवास्तव

 

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First Published on July 21, 2015 8:31 am

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