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सरोकार का पाठ

प्रतिभा कटियार तकरीबन महीने भर बाद स्कूल खुले। सरकारी स्कूल। शिक्षकों के लटके हुए चेहरे, टालमटोल, नए सिरे से बहानों की खोजबीन, छुट्टियां और बढ़ जाने के चमत्कारी संदेश का इंतजार कितना कुछ बयान करता है। एक तरफ बेहतर शिक्षा को लेकर तमाम पड़ताल, कवायद, प्रशिक्षण आदि की बात हो रही है, चिंताएं सामने आ […]
Author January 31, 2015 16:25 pm

प्रतिभा कटियार

तकरीबन महीने भर बाद स्कूल खुले। सरकारी स्कूल। शिक्षकों के लटके हुए चेहरे, टालमटोल, नए सिरे से बहानों की खोजबीन, छुट्टियां और बढ़ जाने के चमत्कारी संदेश का इंतजार कितना कुछ बयान करता है। एक तरफ बेहतर शिक्षा को लेकर तमाम पड़ताल, कवायद, प्रशिक्षण आदि की बात हो रही है, चिंताएं सामने आ रही हैं, दूसरी ओर शिक्षकों का अपने काम को लेकर यह रवैया! क्यों इन शिक्षकों के भीतर उत्साह नहीं स्कूलों के खुलने का? क्यों मन में आतुरता नहीं अपने बच्चों से मिलने की, उनके सिर पर हाथ फिराने की? क्यों उकताहट नहीं इतनी लंबी छुट्टियों से? क्यों मन में उत्साह नहीं अपने काम से वापस जुड़ पाने का? ये सवाल मुझे बहुत बेचैन करते हैं। शायद मेरे हिस्से भी ऐसे ही उकताए हुए शिक्षक आए होंगे, इसीलिए बहुत छोटी उम्र में जब कुछ भी समझ नहीं बनी थी, यह तय कर लिया था कि शिक्षक नहीं बनूंगी। हालांकि आगे चल कर वह राय बदल गई।

पिछले कुछ बरसों से सरकारी स्कूलों से जुड़ने, उन्हें देखने-समझने, महसूस करने का मौका मिल रहा है। ऐसा लगता है सामने नन्ही-नन्ही कोरी हथेलियां हैं, ढेर सारी चमक लिए हुए आंखें…! उन हथेलियों में लकीरें खींचनी हैं, उन आंखों में सपने बोने हैं। जिस प्यार से बच्चे अपने शिक्षक को देखते हैं, उन पर भरोसा करते हैं, वह असाधारण होता है। जीवन को सार्थकता मिलने के अवसर सामने होते हैं… जिंदगी भर के लिए किसी के दिल में बस जाने के अवसर…! सीखना-सिखाना तो बाद की बात है, शुरुआत तो रिश्ता बनने से होती है। उत्तराखंड में कुछ ऐसे शिक्षकों से मिली, जिन्होंने अपने बच्चों से बढ़ कर अपने स्कूल के बच्चों को प्यार दिया। शिक्षक मस्त-मगन बच्चों के साथ खेल रहे होते हैं। सीख और सिखा रहे होते हैं। छुट्टी होने पर भी न बच्चे घर जाना चाहते हैं न शिक्षक। अपने वेतन का कुछ हिस्सा भी बच्चों के ऊपर खर्च करना। किसी को लगता है कि हमारे काम के एवज में बच्चों की मुस्कुराहटें, उनके माता-पिता का हम पर विश्वास, सब कुछ दे देता है। सरकारी वेतन तो हमें बोनस में मिलता है। उन्हें किसी तरह की ड्यूटी लगने से शिकायत नहीं है। बस एक ही चिंता कि हमारे बच्चे कैसे प्राइवेट स्कूलों से भी अच्छी शिक्षा पा लें। रोज पढ़ाने के नए ढंग ढूंढ़ना, उनके मिड-डे मील को और स्वादिष्ट और पौष्टिक बनाने की चिंता। दूसरी तरफ स्कूल जाने के नाम पर बहाने बनाने वाले शिक्षक। महंगी गाड़ियों से स्कूलों में जाकर हाजिरी की औपचारिकता, कम स्कूल जाना पड़े इसका इंतजाम, सिफारिश, बच्चों से दूरी, उनके प्रति स्वभाव में हिकारत, स्कूल के मिड-डे मील से पैसा बचा पाने की जुगत, ड्यूटी लग जाने की चिडचिड़ाहट। साफ है, जिन्हें अपने काम से प्यार नहीं, उनमें उकताहट होगी।

दुनिया में शिक्षक होने से बड़ा वरदान कोई नहीं। दुनिया भर की समस्याएं बच्चों की मुस्कुराहटें दूर कर देती हैं। बस आप किसी मासूम को दिल से गले लगाइए। उसकी आंखों में आपके लिए जो प्यार और भरोसा जागेगा, उसमें जीवन की सार्थकता होगी। लेकिन ऐसा होगा तब, जब हम उस सार्थकता के योग्य होंगे। हमारी अयोग्यता के चलते ही जीवन हमें खारिज कर देता है। हम सिर्फ सांसों में बचते हैं, जीवन में नहीं। नौकरी एक बोझ, काम सिरदर्द बनने लगता है और नतीजा सब गड़बड़। बस एक बात जेहन में आती है कि ये सारे उकताए, शिकायतों से भरे शिक्षक क्या एक बार नहीं सोचते कि जब उनके पास यह नौकरी नहीं थी तो वे कितने बेसब्र थे इसे पाने के लिए? मैं यह नहीं कहती कि शिक्षकों की समस्याओं पर बात नहीं होनी चाहिए, यह भी नहीं कि उन्हें किसी देवता की तरह देखा जाए। मैं सिर्फ एक व्यक्ति के तौर पर शिक्षकों के जीवन के आसपास मंडराते सुख और सार्थकता के उस भाव की बात करना चाहती हूं, जिसे अक्सर वे उपेक्षित कर रहे होते हैं।

 

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