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राहत के वन

रविशंकर रवि एक सींग वाले दुर्लभ गैंडे के बारे में काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क से मिली ताजा जानकारी वन्यजीव प्रेमियों के लिए सुखद है। आमतौर पर काजीरंगा गैंडों की हत्या के लिए चर्चा में रहा है। इस साल के पहले तीन माह के दौरान करीब एक दर्जन गैंडों की मौत हो चुकी है। जबकि पिछले वर्ष […]
Author April 8, 2015 08:22 am

रविशंकर रवि

एक सींग वाले दुर्लभ गैंडे के बारे में काजीरंगा राष्ट्रीय पार्क से मिली ताजा जानकारी वन्यजीव प्रेमियों के लिए सुखद है। आमतौर पर काजीरंगा गैंडों की हत्या के लिए चर्चा में रहा है। इस साल के पहले तीन माह के दौरान करीब एक दर्जन गैंडों की मौत हो चुकी है। जबकि पिछले वर्ष बीस गैंडे मारे गए थे। इसके लिए वन विभाग की काफी आलोचना होती रही है। गैंडा असम का प्रतीक और पहचान है। इनकी हत्या पर मचे कोहराम के बीच इनकी गिनती पर ताजा रिपोर्ट से वन विभाग और वन्यप्रेमियों को राहत मिली होगी।

हर दो साल के अंतराल पर गैंडों की गणना होती है। गत चौबीस से सत्ताईस मार्च के दौरान काजीरंगा राष्ट्रीय उद्यान में कराई गई बारहवीं गणना में गैंडों की संख्या बढ़ कर दो हजार चार सौ एक हो गई है, जो 2013 की तुलना में पचहत्तर अधिक है। यों अंतिम रिपोर्ट आनी अभी बाकी है। जाहिर है, गैंडों की हत्या के बावजूद वन विभाग लगातार उनकी हिफाजत का प्रयास कर रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो शायद गैंडों के अस्तित्व पर भी खतरा मंडराने लगता। 1905 में उनकी संख्या मात्र बीस जोड़े तक सीमित हो गई थी। अब उनकी आबादी लगातार बढ़ रही है।

हालांकि इसमें दो राय नहीं है कि आज भी पूरी तरह उनकी हत्या रोकी नहीं जा सकी है। लेकिन इसके लिए हर स्तर पर प्रयास जारी हैं। गैंडों की हत्या या उनका शिकार रोकने और उनके संरक्षण के लिए दीर्घकालीन योजनाओं की जरूरत है। काजीरंगा की क्षमता अभी दो हजार सात सौ पचास गैंडों को पालने की है। जैसे-जैसे उनकी आबादी बढ़ेगी, उनके लिए नए ठिकाने की तलाश भी जरूरी है। पबितोरा वन्यजीव अभयारण्य में गैंडों का घनत्व काफी है। इससे उन्हें चारे के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है। नए ठिकाने के तहत कुछ गैंडों को मानस राष्ट्रीय उद्यान भेजा गया है। वहां भी शिकारी उनके पीछे पड़े हैं। जबकि मानस राष्ट्रीय उद्यान को तुलनात्मक रूप से सुरक्षित और बेहतर जगह माना जाता है।

बहरहाल, गैंडों की आबादी बढ़ने का यह मतलब नहीं है कि उनके संरक्षण और सुरक्षा के प्रति अब निश्चिंत हो जाया जाए। गैंडों के लिए नए या मौजूदा ठिकानों के विस्तार पर अभी से सोचने की जरूरत है। इस क्रम में वयस्क गैंडों की सुरक्षा सबसे जरूरी है, क्योंकि इस पशु की आबादी बढ़ाने में उनका ही मुख्य योगदान रहता है। इसके अलावा, वयस्क-अवयस्क गैंडे और बच्चों के बीच संतुलन बैठाना भी जरूरी है। शिकारियों से गैंडे को बचाने के लिए निगरानी तंत्र को ज्यादा व्यवस्थित करना होगा और कर्मचारियों की संख्या बढ़ानी होगी। गैंडे को बचाने के लिए स्थानीय लोगों की मदद से टास्क फोर्स बनाने का प्रस्ताव अच्छा है। स्थानीय लोग बाहरी संदिग्ध लोगों को आसानी से पहचान लेते हैं।

अगर केवल शिकारियों की गतिविधियों पर ही ठीक से नजर रख ली जाए तो बहुत हद तक सफलता मिल सकती है, क्योंकि शिकारियों के प्रवेश के साथ ही वनरक्षकों को इस बात की खबर मिल जाएगी और उन्हें पकड़ना या रोकना संभव हो पाएगा।

इसलिए बिना समय गंवाए स्थानीय लोगों को प्रशिक्षित करके टास्क फोर्स बनाई जानी चाहिए। इससे स्थानीय युवकों को रोजगार भी मिल सकेगा। वे स्थानीय भूगोल से परिचित होते हैं। लेकिन यह कार्य राज्य सरकार अकेले नहीं कर सकती है। इसके लिए केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय को आगे आना होगा। वन्यजीवों का संरक्षण सिर्फ राज्य सरकार का नहीं, पूरे देश का दायित्व है और सबको इसकी जिम्मेदारी लेनी होगी।

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