April 23, 2017

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किसकी सरकार

सुनील अमर विशिष्ट परिस्थितियों के कारण अब तक देश में चार बार प्रबल बहुमत की सरकारें बन चुकी हैं। ऐसी पहली सरकार 1971 में इंदिरा गांधी की अगुआई वाली तत्कालीन कांग्रेस (आर) की थी, जिसे तीन सौ बावन सीटें हासिल हुई थीं। दूसरी बार 1977 में आपातकाल के बाद नवगठित जनता पार्टी की सरकार बनी […]

Author July 28, 2015 13:58 pm

सुनील अमर

विशिष्ट परिस्थितियों के कारण अब तक देश में चार बार प्रबल बहुमत की सरकारें बन चुकी हैं। ऐसी पहली सरकार 1971 में इंदिरा गांधी की अगुआई वाली तत्कालीन कांग्रेस (आर) की थी, जिसे तीन सौ बावन सीटें हासिल हुई थीं। दूसरी बार 1977 में आपातकाल के बाद नवगठित जनता पार्टी की सरकार बनी थी, जिसने अकेले दो सौ पंचानबे और गठबंधन के साथ तीन सौ पैंतालीस सीटें जीती थीं। इसके बाद 1984 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद हुए चुनाव में राजीव गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने चार सौ चौदह सीटें जीत कर एक तरह से विपक्ष का सफाया ही कर दिया था। फिर पिछले साल हुए चुनाव में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने कुल तीन सौ छत्तीस सीटें जीत लीं, जिनमें भाजपा की सीटें दो सौ बयासी हैं। आजाद भारत में पहली बार ऐसा हुआ है, जब किसी गैर-कांग्रेस दल ने बहुमत से अधिक सीटें जीतीं।

इन चारों सरकारों ने कई अवसरों पर लोकतंत्र की भावना के विपरीत जाकर तानाशाहों जैसा मनमाना फैसला किया। इंदिरा गांधी ने 1971 की जीत के बाद विपक्ष पर अंकुश लगाने की कोशिशें शुरू कीं, जिसका चरम आपातकाल की घोषणा के रूप में सामने आया। जनता सरकार भी आपसी फूट और विवादास्पद फैसलों के चलते ढाई साल में जनता के कोप का शिकार हो गई। राजीव गांधी की सरकार ने चर्चित बेगम शाहबानो तलाक फैसले को पलट कर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की तौहीन की; अयोध्या में विवादित स्थल पर शिलान्यास करा कर मामले को बेजा हवा दी; भोपाल गैस कांड, बोफर्स तोप सौदा, मालदीव और श्रीलंका में सैन्य हस्तक्षेप जैसे मामलों में सरकार के रुख और उसके फैसलों ने विवादों को जन्म दिया। आज विपक्ष की जो हालत लोकसभा और दिल्ली विधानसभा में है, कुछ वैसी ही हालत उस समय लोकसभा में थी।

आज देश में राजग के बहुमत की सरकार है और लोकसभा में विपक्ष का ढंग का नेता तक नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी न सिर्फ अपने चुनावी वादों से लगातार पलट रहे हैं, बल्कि ऐसे-ऐसे फैसले कर रहे हैं जो जन-विरोधी हैं। भूमि अधिग्रहण जैसे अहम मसले पर विपक्ष के रूप में लिया गया अपना ही मत भुलाते हुए भाजपा नेता उसे और शोषणकारी बना कर अध्यादेश की मार्फत तानाशाही ढंग से लागू करने में लगे हुए हैं। गणतंत्र दिवस के विज्ञापन में संविधान की प्रस्तावना से छेड़छाड़, धर्म परिवर्तन का मुद्दा, दस बच्चे पैदा करने का आह्वान और मोदी का दसलखा सूट, यह सब इस सरकार की तानाशाही प्रवृत्ति के नमूने हैं।

इसके बरक्स 1989 में अल्पमत की वीपी सिंह सरकार का वह फैसला याद आता है, जिसमें उन्होंने सरकार के चंगुल में रह रहे आकाशवाणी और दूरदर्शन को मुक्त करते हुए प्रसार भारती का गठन कर इसे स्वायत्तशासी संगठन बना दिया था। अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाले चौबीस दलों की राजग सरकार सहयोगी दलों के दबाव में सही, पर धारा 370, समान नागरिक संहिता और राम मंदिर जैसे विवादास्पद मुद्दों को ठंडे बस्ते में डाले रही। इसके बाद ग्यारह दलों के साथ सत्ता में आई कांग्रेस ने भी मनरेगा, सूचना का अधिकार, किसान कर्ज माफी, शिक्षा का अधिकार और भोजन के अधिकार जैसे कई ऐतिहासिक फैसले किए।

साफ है कि कथित मजबूत सरकार की अवधारणा खास पार्टी या नेता को भले ज्यादा ताकत दे दे, आम लोगों के हितों के लिहाज से आशंकाएं बढ़ाने वाली ही साबित हुई हैं। सबसे गंभीर बात है कि ऐसी सरकार में जब गाड़ी पटरी से उतरती दिखने लगती है, तब भी विपक्षी पार्टियां या अन्य लोकतांत्रिक शक्तियां हस्तक्षेप कर मामले को ज्यादा बिगड़ने से बचाने की स्थिति में नहीं होतीं।

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First Published on July 28, 2015 7:50 am

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