March 26, 2017

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अकेलेपन का घेरा

जयंत जिज्ञासु इंसान जन्म लेता है, मां की गोद से उतर कर चलना सीखता है, फिर जवान होकर वृद्धावस्था तक पहुंचता है और आखिरकार दुनिया को अलविदा कहता है। लेकिन कुछ लोग इस प्राकृतिक जीवन-चक्र को तोड़ कर आत्मघाती निर्णय ले बैठते हैं। जबकि किसी भी रिश्ते से कहीं महत्त्वपूर्ण है किसी का होना। तोल्सतोय […]

Author July 27, 2015 13:56 pm

जयंत जिज्ञासु

इंसान जन्म लेता है, मां की गोद से उतर कर चलना सीखता है, फिर जवान होकर वृद्धावस्था तक पहुंचता है और आखिरकार दुनिया को अलविदा कहता है। लेकिन कुछ लोग इस प्राकृतिक जीवन-चक्र को तोड़ कर आत्मघाती निर्णय ले बैठते हैं। जबकि किसी भी रिश्ते से कहीं महत्त्वपूर्ण है किसी का होना।

तोल्सतोय ने ठीक ही कहा है- ‘शहर में कोई खुद को मृत समझ कर बहुत दिनों तक जीवित रह सकता है’! ऐसे में जीवन के प्रति अटूट श्रद्धा होनी चाहिए, तभी इंसान विषम परिस्थिति में खुद को टूटने से बचा सकता है। एक ऐसे दौर में जबकि संबंधों का घनत्व लगातार घट रहा है और पहचान की स्वायत्तता के लिए जद्दोजहद बढ़ रही है, वैसे में कुछ समय पहले हमारी एक साथी अंशु सचदेवा जैसी जीवंत और जिंदादिल इंसान के अचानक साथ छोड़ कर चले जाने की घटना ने हम बहुत सारे दोस्तों को स्तब्ध कर दिया। हमारी इस साथी ने शिक्षण-विधि में कई बुनियादी सुधार पर सार्थक काम किया। भारतीय जनसंचार संस्थान से पढ़ाई करने के बाद वे गांधी फेलोशिप प्राप्त कर सुदूर देहात के स्कूलों में बच्चों की प्रतिभा को तलाशने-निखारने के अनुपम काम में जुटी थीं। उनका जीवट और उनकी जीवंतता बच्चों में नई ऊर्जा भरती थी। वे अपने ईमानदार लेखन और विचार को लगातार प्रभावी ढंग से नीति-नियंताओं तक पहुंचा रही थीं। मेरे लिए यह दूसरी तोड़ने वाली घटना है। पिछले साल ही एक साथी सागर मिश्रा ने खुदकुशी कर ली थी। सोचता हूं कि कब तक होनहार प्रतिभाएं यों ही दम तोड़ती रहेंगी।

पत्रकारिता का पेशा या समाज-सेवा का काम बेहद धैर्य की मांग करता है। अन्यथा खीझ कब घनीभूत अवसाद में तब्दील हो जाए, पीड़ा धीरे-धीरे व्यक्ति की जिजीविषा, उसके जीवट और जुझारूपन को उसकी गंभीर हंसी के बीच से कब दरका जाए, पता भी नहीं चल पाता। अभिभावक से तो और भी भावनात्मक सहयोग, हौसलाअफजाई और सब्र की अपेक्षा रहती है। इसलिए मुझे लगता है कि इस देश में अभिभावकत्व का जरूरी प्रशिक्षण मुफ्त दिया जाना चाहिए। बच्चों के मानस को समझना और उसके हिसाब से उनका विकास जरूरी है। ऐसा आमतौर पर नहीं होता है। दूसरी ओर, व्यक्ति के भीतर-भीतर कुछ दरकता रहता है और अंत में जाकर बड़ा शून्य बन जाता है। सब बिखरता-सा दिखता है, जिसे फिर जोड़ा नहीं जा पाता। मानसिक उलझन और अनिर्णय की दशा में जब कुछ नहीं सूझता, तो व्यक्ति खुदकुशी करने जैसा कदम उठा लेता है।

संवेदनशील और भावुक मन के लिए हर हाल में संवाद बेहद जरूरी है। अंदर ही अंदर डेरा डाले अकेलेपन के घेरे को तोड़ा जाए और अपनों से संवाद के तार जोड़े जाएं। मुझे लगता है कि उस नाजुक पल में आदमी खुद से भी संवाद तोड़ लेता है तो फिर दूसरों से संवाद करने के बारे में वह कहां सोच पाएगा! हादसा हो जाने के बाद हम तकलीफ में होते हैं कि अपने करीब के दोस्त के कुछ उदास अनछुए पहलुओं को समग्रता में, सूक्ष्मता से पढ़ने में हम चूक गए, उनकी मनोस्थिति से वाकिफ नहीं हो सके। हम खुद को दोषी और लाचार महसूस करते हैं! यह ध्यान रखना चाहिए कि जब सारी दुनिया से हम निराश हो जाते हैं तो तब भी प्रतीक्षारत पलकों के साथ दो लोग हमारी ओर टकटकी लगाए रहते हैं- एक मां और दूसरा आदर्श शिक्षक। हर शिष्य की मौत में अध्यापक की मौत होती है। परिवार के सदस्य अपराधबोध में जीते हैं कि वे बच्चे की मनोदशा को भांप नहीं सके।

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First Published on July 27, 2015 7:30 am

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