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हिंसा का हासिल

ज्योति सिडाना पिछले कुछ समय में देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसी कई घटनाएं हुर्इं, जिन्होंने आक्रामकता और ंिहंसा की संस्कृति की व्यापकता के विषय में सोचने को मजबूर किया। नगालैंड के दीमापुर में एक आरोपित व्यक्ति को हजारों की भीड़ द्वारा जेल से निकाल कर पीट-पीट कर मार डालने, दिल्ली में तुर्कमान गेट पर […]
Author May 2, 2015 08:02 am

ज्योति सिडाना

पिछले कुछ समय में देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसी कई घटनाएं हुर्इं, जिन्होंने आक्रामकता और ंिहंसा की संस्कृति की व्यापकता के विषय में सोचने को मजबूर किया। नगालैंड के दीमापुर में एक आरोपित व्यक्ति को हजारों की भीड़ द्वारा जेल से निकाल कर पीट-पीट कर मार डालने, दिल्ली में तुर्कमान गेट पर एक कार के छू जाने भर के बाद कार में सवार लोगों द्वारा मोटर साइकिल सवार को उसके बच्चों के सामने पीट-पीट कर मार डालने, छत्तीसगढ़ के एक सांसद के भाई द्वारा एक विद्यालय के निदेशक को अपनी कार से कुचलने की कोशिश और मध्यप्रदेश में रेत माफिया द्वारा एक कांस्टेबल को डंपर से कुचल देने जैसी घटनाएं मनुष्य के विचार और भावनाओं को झकझोरने के लिए काफी हैं। यह अब उन गांधी का देश नहीं है जो अहिंसा के मूल्य की स्थापना के लिए चौरी-चौरा आंदोलन को समाप्त करने में भी कोई गुरेज नहीं करते थे।

असल में इस देश में अनेक लोगों और समूहों ने समाजीकरण के जरिए आक्रामक राष्ट्रवाद और अपने समूह की सर्वोच्चता को नई पीढ़ियों में हस्तांतरित किया, जिसकी परिणति ‘हम’ और ‘वे’ के विभाजन से पनपी संगठित हिंसा है। संस्थाओं की कार्यप्रणाली ने जनता के सामने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के प्रति अविश्वास को जन्म दिया जो हिंसा का एक महत्त्वपूर्ण कारण है। परिवार, जाति और धार्मिक समूहों में भारतीय समाज हिंसा की वैधता को स्थापित करता रहा है। विद्यालय में शिक्षक के हाथों बच्चों की पिटाई, परिवार में माता-पिता की हिंसा, जाति के मुखिया और धर्मगुरुओं को उन लोगों के ऊपर प्रत्यक्ष-परोक्ष हिंसा के अधिकार जो आदेश की अवज्ञा करते हों और पुरुष सत्ता की शैली में बच्चियों और महिलाओं की पिटाई कर खुद को शक्तिशाली प्रस्तुत करने की कोशिश ‘हिंसा की संस्कृति’ को मान्यता दे देती है।

लोग यह मानते हैं कि अपराधी को पता नहीं कानून कब दंडित करे, इसलिए कानून को हाथ में लेने के लिए कहीं भी भीड़ सक्रिय हो जाती है। आम जनता यह भी समझने लगी है कि शक्तिशाली लोगों का कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता, क्योंकि शक्ति के सारे प्रतिष्ठान और कानून उनकी जेब में हैं। ऐसी स्थिति में जनता का एक हिस्सा हिंसा को एक विकल्प के रूप में स्वीकारने लगता है। पिछले कुछ दशकों में सामाजिक वंचना, हाशिये पर धकेले जाने, कुंठा और अलगाव की प्रक्रियाएं लोगों की जीवनशैली में शामिल हो गई हैं। यह स्थिति उनके जीवन के सामने अनेक सामाजिक संकट उत्पन्न करती है और फिर हिंसा संबंधित जोखिम को खत्म करने का एक माध्यम बन जाती है। जैन और बौद्ध दर्शन या गांधीवाद की यह देश हत्या कर चुका है!

जहां गांधी के हत्यारों को लोग मंदिर में बैठाने की सोच रहे हों, वहां हिंसा की अस्वीकृति कैसे हो सकती है? लेकिन इससे देश के सामने अनेक खतरे उत्पन्न हो गए हैं। अस्मिताओं की स्थापना के लिए या अस्मिताओं के संकट से मुक्ति पाने के लिए हिंसा का सहारा मुख्य रूप से वैश्वीकरण की देन है। एक लोकतांत्रिक और सहिष्णुतावादी शिक्षा के जरिए इस संगठित और अप्रत्याशित हिंसा को रोकने की कोशिश की जा सकती है। हिंसा सामान्य तौर पर एक भावना है और भावना पर विजय तर्कसंगत विचारों से ही पाई जा सकती है। भारत के औपचारिक और अनौपचारिक संस्थागत ढांचे जितनी जल्दी इस तर्क को स्वीकार कर सक्रिय होंगे, उतना ही हम हिंसा की संस्कृति पर विजय पाने या उसे कम करने में सक्षम होंगे। सवाल यह है कि क्या समाज का शक्तिशाली तबका ऐसे किसी प्रयास को लागू करने में सहयोग देगा, क्योंकि हिंसा उन्हें और अधिक धनवान और शक्तिशाली बनाती है।

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