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दहशत का चेहरा

संजीव शर्मा पेशावर में एक सौ इकतीस स्कूली बच्चों के संहार के बाद उस दस साल की मासूम बच्ची ने दहशतगर्दों के लिए ‘दहशत अंकल’ शब्द का प्रयोग किया था। शायद इसलिए कि उसे बचपन से यही सिखाया गया है कि अपने पिता की उम्र के सभी पुरुषों को अंकल जैसे सम्मानजनक संबोधन के साथ […]
Author December 27, 2014 13:20 pm

संजीव शर्मा

पेशावर में एक सौ इकतीस स्कूली बच्चों के संहार के बाद उस दस साल की मासूम बच्ची ने दहशतगर्दों के लिए ‘दहशत अंकल’ शब्द का प्रयोग किया था। शायद इसलिए कि उसे बचपन से यही सिखाया गया है कि अपने पिता की उम्र के सभी पुरुषों को अंकल जैसे सम्मानजनक संबोधन के साथ पुकारना है और दहशत शब्द उसके लिए शायद नया नहीं होगा। पाकिस्तान में आए दिन होने वाले धमाकों और गोलीबारी के बाद अखबारों से लेकर टीवी के समाचार चैनलों में दहशतगर्द शब्द दिनभर गूंजता रहता है। इसीलिए उसने अनुमान लगा लिया कि यह कारनामा करने वाले दहशतगर्द ही होंगे। पारिवारिक संस्कारों के कारण उसने अनजाने में ही एक नया शब्द ‘दहशत अंकल’ गढ़ दिया। यानी खौफ के साथ प्रेम और सम्मान का अद्भुत समन्वय!

‘दहशत अंकल’ शब्द ने मुझे सत्तर के दशक की सुपरहिट फिल्म ‘दुश्मन’ की याद दिला दी। सदाबहार अभिनेता दिवंगत राजेश खन्ना, मीना कुमारी और मुमताज के अभिनय से सजी दुलाल गुहा की इस फिल्म में भी बच्चे फिल्म के नायक को ‘दुश्मन चाचा’ कह कर पुकारते हैं, क्योंकि उन्हें शुरू से ही यह बताया जाता है कि नायक उनका ‘दुश्मन’ है और संस्कारवश वे ‘चाचा’ अपनी ओर से जोड़ देते हैं। किसी अपराधी को अनूठे ढंग से सुधारने और मानसिक रूप से प्रताड़ित कर पटरी पर लाने के अदालती प्रयासों पर बनी इस फिल्म से तालिबानी दहशतगर्द की तुलना कतई नहीं की जा सकती। इस फिल्म में नायक को उस परिवार के साथ दो साल गुजारने की सजा दी जाती है, जिस परिवार का मुखिया नायक के हाथों ही दुर्घटना में मारा गया था। फिल्म के अंत में जब सजा पूरी होने के बाद नायक के वहां से जाने की बारी आती है, तब तक वह उस परिवार के साथ इतना घुल-मिल जाता है कि अदालत में जज से कहता है कि उसे रिहाई नहीं, बल्कि उम्रकैद की सजा चाहिए, ताकि वह जीवन भर उसी परिवार के साथ रह सके।

जब महज दो साल में एक व्यक्ति भावनात्मक रूप से इतना बदल सकता है और किसी अनजाने और यहां तक कि अपने को दुश्मन मानने वाले परिवार का अभिन्न सदस्य बन सकता है तो तालिबान की शरण में गए लोगों में यह बदलाव अब तक क्यों नहीं आ पाया। वे भी तो सालों-दशकों से पाकिस्तान में घोषित-अघोषित रूप से बसे हुए हैं, वहां का नमक खा रहे हैं और काफी हद तक उसके रहमोकरम पर हैं! क्या दशकों का साथ भावनात्मक रूप से इतना भी नहीं जोड़ पाया कि कम से कम मासूम बच्चों पर दया आ जाए या गोली चलाने के पहले हाथ कांपने लगे?

जब एक मासूम बच्ची अपने साथियों की भयावह मौत देखने के बाद भी ‘दहशत अंकल’ जैसे अनूठे संबोधन से पुकार सकती है तो क्या किसी दहशतगर्द को उसकी मासूमियत नजर नहीं आई? उसे उस बच्चे में अपने बच्चे का चेहरा, उसका भोलापन, निश्छल हंसी, निष्कपट व्यवहार और बेदाग बचपन नहीं दिखा? पाकिस्तान ही क्यों, यह बात तो दुनिया भर के सभी मुल्कों और सभी किस्म के दहशतगर्दों पर लागू होती है। कोई कितना भी क्रूर हो, पर बच्चे के सामने तो उसके भी हाथ-पैर और चेहरे पर व्याप्त क्रूरता की लकीरें ढीली पड़ जानी चाहिए। दो साल में कोई दुश्मन जब चाचा बन सकता है तो सालों से हमारे साथ और आसपास रहने वाले दहशतगर्द अंकल क्यों नहीं बन सकते, भले ही वह ‘दहशत अंकल’ क्यों न हों…? आखिर कैसे भी, किसी भी स्तर से, बदलाव की शुरुआत तो हो!

 

 

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