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हवा में पढ़ाई

नवीन पाल चौथी कक्षा में बेटे को पढ़ाने वाली शिक्षिका का कहना था कि ‘तेईस’ में छोटी इ आएगी। अभिभावकों के साथ मीटिंग में शिक्षिका ने बेटे की सभी विषयों की उत्तर पुस्तिकाएं दिखार्इं। बाकी सब तो ठीक थे, लेकिन हिंदी की परीक्षा में एक शब्द ‘तेईस’ को सही लिखने के बावजूद आधा नंबर काट […]
Author May 6, 2015 09:06 am

नवीन पाल

चौथी कक्षा में बेटे को पढ़ाने वाली शिक्षिका का कहना था कि ‘तेईस’ में छोटी इ आएगी। अभिभावकों के साथ मीटिंग में शिक्षिका ने बेटे की सभी विषयों की उत्तर पुस्तिकाएं दिखार्इं। बाकी सब तो ठीक थे, लेकिन हिंदी की परीक्षा में एक शब्द ‘तेईस’ को सही लिखने के बावजूद आधा नंबर काट लिया गया था। मेरे दफ्तर में होने की वजह से हर महीने के दूसरे शनिवार को स्कूल में होने वाली अभिभावकों के साथ मीटिंग में अमूमन पत्नी जाती हैं। लेकिन इस बार मैंने छुट्टी ली और स्कूल पहुंच गया। शिक्षिका की दलील थी कि तेईस में छोटी इ ही होगी और सही शब्द ‘तेइस’ है। अपनी गलती और अधूरे ज्ञान को सही साबित करने की कोशिश में वे अंगरेजी में बोलने लगती थीं। हिंदी के किसी शब्द में मात्रा के मसले पर अंगरेजी में बहस करना मुझे अटपटा लग रहा था। लेकिन शिक्षिका अपनी बात पर अड़ी थीं। बाकी अभिभावकों के सामने शायद उन्हें अपनी गलती या अल्पज्ञान को स्वीकार करना मुश्किल पड़ रहा था।

यह दूसरी बार था जब उनसे मेरा सामना हुआ। इससे पहले एक बार वे बच्चों को पढ़ाते हुए बता चुकी थीं कि दिल्ली के मेयर नजीब जंग हैं। बेटे ने शाम को जब बताया कि दिल्ली के मेयर नजीब जंग हैं, तो बहुत गुस्सा आया। अगले दिन दफ्तर से छुट्टी लेकर मैं उन्हीं शिक्षिका के सामने खड़ा था। उनसे मैंने सवाल किया कि दिल्ली के मेयर कौन हैं, तो उन्होंने वही गलत जवाब दोहरा दिया। मैंने उसे समझाया कि बच्चों को गलत जानकारी देकर उनके भविष्य से क्यों खेल रही हैं! आदत के मुताबिक अपनी गलती छिपाने के लिए वे अंगरेजी में बहस करने लगीं। वे यह मानने को तैयार ही नहीं थीं कि नजीब जंग दिल्ली के उपराज्यपाल हैं। मैं प्रिंसिपल के पास पहुंचा और उन्हें पूरी कहानी बताई। प्रिंसिपल ने उन्हें अपने कक्ष में बुला कर अच्छी-खासी डांट लगाई और सामान्य ज्ञान ठीक करने को कहा।

लेकिन इस बार बात सामान्य ज्ञान की नहीं, अक्षर ज्ञान की थी। शिक्षिका अपनी बात पर अड़ी थीं और ‘तेईस’ को ‘तेइस’ साबित करने पर तुली थीं। मैंने प्रतिवाद किया तो उन्होंने कहा कि वे अपनी एक वरिष्ठ शिक्षिका से भी इस बारे में बात कर चुकी हैं। सही शब्द ‘तेइस’ है। बात लंबी खिंची, तो आखिरकार शिक्षिका ने कहा कि वह एक बार किताब में देखेंगी कि सही शब्द क्या है। अब मैं क्या कहता, लेकिन उनकी नासमझी मुझे विचित्र लगी।

अब मेरी बड़ी बेटी की बात। उसकी शिक्षिका के पास गया तो कई अभिभावक पहले से खड़े थे। लिहाजा मैं सबसे पीछे खड़ा हो गया। ज्यादातर अभिभावकों की शिकायत थी कि बच्चे उनका कहना नहीं मानते और दिन भर या तो मोबाइल में घुसे या फिर टीवी से चिपके रहते हैं। शिक्षिका के पास समस्या का हल नहीं है। वे अभिभावकों से ही शिकायत करती हैं कि बच्चे उनका भी कहना नहीं मानते। जिन बच्चों की शिकायत हो रही है, वे हल्के से मुस्करा रहे हैं, मानो उनकी महिमा का बखान होने पर उन्हें गर्व की अनुभूति हो रही हो। अब कुछ सुनने-कहने का मन नहीं है। बिटिया की शिक्षिका से मिले बिना ही मैं घर लौट गया। मन में सवाल घूम रहे हैं। यह हाल एक नामी निजी स्कूल का है, जहां बच्चों का दाखिला कराने के लिए मुझे काफी पापड़ बेलने पड़े थे। सरकारी स्कूलों का क्या हाल होगा, पता नहीं!

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