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दोस्ती की दास्तान

चंद्रभूषण सिंह अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा ने भारत-अमेरिकी संबंधों में एक नया आयाम जोड़ दिया है। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओबामा के लिए प्रोटोकॉल तोड़ कर ऐसी मेहमाननवाजी की कि ओबामा भी इसके कायल हो गए। लेकिन इस सबके बरक्स इस यात्रा का दूसरा पहलू ज्यादा अहम है। भारत को […]
Author February 3, 2015 13:02 pm

चंद्रभूषण सिंह

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा की भारत यात्रा ने भारत-अमेरिकी संबंधों में एक नया आयाम जोड़ दिया है। हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ओबामा के लिए प्रोटोकॉल तोड़ कर ऐसी मेहमाननवाजी की कि ओबामा भी इसके कायल हो गए। लेकिन इस सबके बरक्स इस यात्रा का दूसरा पहलू ज्यादा अहम है। भारत को अपनी बढ़ती ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने और मोदी की महत्त्वाकांक्षी ‘मेक इन इंडिया’ परियोजना को सफल बनाने के लिए अमेरिका जैसे सहयोगी की बहुत जरूरत है। वहीं अमेरिका को एक बड़ा उपभोक्ता बाजार और एशिया में चीन के शक्ति संतुलन के लिए एक विश्वसनीय सहयोगी की जरूरत है, जिसकी संभावना वह भारत में देख रहा है। यों अब तक यह काम वह पाकिस्तान के सहारे करता रहा है।

पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल के अंतिम वर्षों और मनमोहन सिंह के नेतृत्व में भारत सारी पुरानी बातों को छोड़ते हुए अमेरिका से नजदीकी बढ़ाने लगा था। नाभिकीय ऊर्जा करार और रक्षा सामग्री की खरीदारी में बढ़ोतरी के साथ भारत और अमेरिका के संबंधों में और गरमाहट आई। भारत को भी सेवा क्षेत्र से अमेरिका से लाभ प्राप्त हो रहा है। अमेरिका में भारतीय लॉबी और उद्योगपति हमेशा से दोनों देशों के बीच मधुर व्यापारिक संबंध के पैरोकार रहे हैं। परमाणु संयंत्र लगाने के समझौते में आ रहे रोड़े में इस बार की ओबामा यात्रा ने एक तरह से पूर्ण विराम लगा दिया है। भले ही इस समझौते में भारत सरकार ने परमाणु दुर्घटना होने पर आधा मुआवजा देना स्वीकार कर लिया है, लेकिन व्यापारिक लॉबी इससे बहुत प्रसन्न है।

अमेरिका अपना कोई भी कदम भावनात्मक रूप से नहीं उठाता है, जब तक कि उस कदम से उसे बहुआयामी लाभ न हो। यही बात हम भारत के साथ उसकी बढ़ती हुई नजदीकियों में भी देख सकते हैं। अमेरिका मंदी से उबर रहा है। उसे अपने यहां युवाओं को रोजगार मुहैया कराना है, जिसके लिए वह बड़े बाजार की तलाश में है। और यह उसे भारत के रूप में बिना किसी मेहनत के मिल रहा है। यह जगजाहिर है कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा सैन्य सामग्रियों का आयातक देश है। अमेरिका इस बात का भरपूर फायदा उठाना चाहता है। भारत भी अपनी सैन्य खरीदारी का ठिकाना रूस से बदल कर धीरे-धीरे अमेरिका की ओर कर रहा है। लेकिन आज की तारीख में सैन्य खरीदारी के मामले में भारत पूरी तरह से पेशेवर होता जा रहा है। इसलिए वह अब किसी एक देश पर निर्भर नहीं रह गया है।

इसके अलावा, अमेरिका भारत को दक्षिण एशिया में एक शक्ति संतुलन के रूप में भी देख रहा है। चीन को नियंत्रित करने के लिए भारत का समर्थन एक अमेरिकी एजेंडा है, वहीं वैश्विक मामलों, मसलन सीरिया और यूक्रेन संकट में अमेरिका भारत को अपने पक्ष में करना चाहता है। बराक ओबामा ने दिल्ली में प्रेस को अपने वक्तव्य में बताया कि रूस यूक्रेन के साथ ज्यादती कर रहा है। साफ है कि ओबामा का यह भारत की जमीन से रूस को धमकी देने का प्रयास था। लेकिन भारत के प्रधानमंत्री ने यूक्रेन संकट में रूस की भूमिका के सवाल पर फिलहाल चुप्पी साधने की नीति अपनाई है।

भारत का सभी देशों से संबंध प्रगाढ़ हो, यह कौन भारतवासी नहीं चाहेगा। लेकिन हमें ये संबंध अपने मूल्यों, स्वायत्तता और अपने हित के अनुसार ही बनाने चाहिए। हमें अपने दोस्तों और दुश्मनों की पहचान में परेशानी नहीं होनी चाहिए। सुख के दिनों के तो सभी साथी होते हैं, अपने दुख के दिनों के साथी को कतई नहीं भूलना चाहिए।

 

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