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हांफता बचपन

राजधानी दिल्ली सहित तमाम महानगरों में बढ़ते वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को लोग रोजाना महसूस करते हैं। पर यह हालत अब बहुत खतरनाक रूप ले चुकी है। स्कूली बच्चों पर हुए ताजा अध्ययन से पता चला है कि दिल्ली में करीब चालीस प्रतिशत बच्चों के फेफड़े कमजोर हैं। इसी तरह मुंबई के सत्ताईस, […]
Author May 6, 2015 09:13 am

राजधानी दिल्ली सहित तमाम महानगरों में बढ़ते वायु प्रदूषण से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को लोग रोजाना महसूस करते हैं। पर यह हालत अब बहुत खतरनाक रूप ले चुकी है। स्कूली बच्चों पर हुए ताजा अध्ययन से पता चला है कि दिल्ली में करीब चालीस प्रतिशत बच्चों के फेफड़े कमजोर हैं। इसी तरह मुंबई के सत्ताईस, बंगलुरु के छत्तीस और कोलकाता के पैंतीस फीसद बच्चों को सांस लेने में तकलीफ है। फेफड़े के कमजोर होने का मतलब है कि बच्चा न तो उचित मात्रा में आक्सीजन खींच सकता है और न कार्बन डाईआक्साइड बाहर फेंक सकता है। इससे उसके रक्त प्रवाह पर भी असर पड़ता है। जाहिर है, इस तरह उसका विकास बाधित होता है। इसकी बड़ी वजह शहरों में हवा की गुणवत्ता निरंतर नीचे गिरना है।

दिल्ली की आबोहवा सुधारने के मकसद से कई कड़े कदम उठाए गए। कचरा जलाने, कारखानों, जेनेरेटर आदि से निकलने वाले धुएं पर रोक लगाने के लिए जुर्माने का प्रावधान किया गया। पर इस सबका अपेक्षित नतीजा नहीं दिखता। हवा में घुलते जहर का असर न केवल फेफड़े पर, बल्कि त्वचा, आंख, स्मरणशक्ति आदि पर भी पड़ता है। इसकी चपेट में बच्चे इसलिए सबसे अधिक आते हैं कि उनका शरीर अभी विकास की प्रक्रिया में होता है। यही वजह है कि खराब हवा से बच्चों में दमे की शिकायत लगातार बढ़ रही है। हैरानी की बात है कि इन तथ्यों से वाकिफ होते हुए भी पर्यावरण मंत्रालय का रवैया बेफिक्री का है। पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर को वायु प्रदूषण के ताजा आंकड़ों के पीछे ‘निहित स्वार्थ’ नजर आता है!

पिछले कई साल से दिल्ली की पहचान ऐसे शहर के रूप में है जहां की हवा दुनिया में सबसे ज्यादा प्रदूषित है। इससे पार पाने के लिए हर साल मंसूबे बांधे जाते हैं, वाहनों से निकलने वाले धुएं को कम करने के उपायों पर चर्चा होती है, कुछ नए जुर्माने तय होते हैं। पर समस्या जस की तस बनी रहती है। हकीकत यह है कि हर साल सड़कों पर नए वाहनों की तादाद कुछ बढ़ी हुई दर्ज होती है। आज तक वाहनों की बिक्री को नियंत्रित करने के प्रयास नहीं हुए। सारी कंपनियां हर आयवर्ग को ध्यान में रख कर और आकर्षक गाड़ियां बाजार में उतारती और सस्ते कर्ज पर उन्हें उपलब्ध कराने की होड़ में लगी रहती हैं। इन गाड़ियों से पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचता है, इसका आकलन करने की जरूरत शायद किसी को नहीं है। जो आंकड़े आते भी हैं उन्हें नजरअंदाज करने की जैसे प्रवृत्ति बन गई है। गाड़ियों के अलावा घरों-दफ्तरों-बाजारों आदि में लगे जेनेरेटरों, एअरकंडीशनरों आदि से निकलने वाली गैसें भी हवा में घुल कर जहर की मात्रा बढ़ा देती हैं।

लेकिन पिछले कुछ सालों से जिस तरह ऊंची अट्टालिकाओं वाले बंद मकान, बाजार, दफ्तर आदि बनाने का चलन बढ़ा है, उसमें बिजली पैदा करने वाले और वातानुकूलन संयंत्रों का अतार्किक इस्तेमाल होने लगा है। इसे नियंत्रित करने की कोशिश कहीं नजर नहीं आती। पेड़ कट रहे हैं, जंगल खत्म हो रहे हैं, पहाड़ उजड़ रहे हैं, जिसके चलते मौसम बदलता है तो प्रदूषण की परत खिसक कर नीचे आ जाती है, फिर रेत और धूल के कण उसमें मिल कर पूरे शहर को हांफने पर मजबूर कर देते हैं। इससे लोगों में चिड़चिड़ापन, अनिद्रा, आंखों में जलन जैसी परेशानियां आम होती जा रही हैं। पर सरकारों की नींद फिर भी नहीं खुलती।

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