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बुखारा की राह

नवीन पाल वह छह फीट का गोरा लंबा नौजवान था। ताशकंद हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही वह हमारी तरफ बढ़ा। टैक्सियों की लंबी कतार में लगी एक कार उसकी थी। ‘बुखारा चलोगे’- हमारे तीसरे साथी ने उज्बेक में कहा। सौदा तीन सौ डॉलर में तय हुआ। ताशकंद से बुखारा करीब पांच सौ पचास किलोमीटर […]
Author July 7, 2015 17:38 pm

नवीन पाल

वह छह फीट का गोरा लंबा नौजवान था। ताशकंद हवाई अड्डे से बाहर निकलते ही वह हमारी तरफ बढ़ा। टैक्सियों की लंबी कतार में लगी एक कार उसकी थी। ‘बुखारा चलोगे’- हमारे तीसरे साथी ने उज्बेक में कहा। सौदा तीन सौ डॉलर में तय हुआ। ताशकंद से बुखारा करीब पांच सौ पचास किलोमीटर दूर है। सफर लंबा था। हमारा तीसरा साथी व्यवसाय के सिलसिले में अक्सर उज्बेकिस्तान जाता रहा है। दिल्ली का रहने वाला है, लेकिन फर्राटेदार उज्बेक बोलता है। वहां के कायदे-कानूनों से भी भली-भांति परिचित है।

लंबे सफर को देखते हुए हमने पानी की बोतल ले ली। पांच लीटर की बोतल से तीनों साथियों ने भर पेट पानी पिया। हमें लगा कि ड्राइवर भी प्यासा है। कार के बैक मिरर में वह हमें पानी पीते देख रहा था। मैंने उसे भी पानी के लिए पूछा। उसने झट से कैन थामी और उसमें मुंह लगा दिया। हम तीनों दोस्त एक दूसरे का मुंह देख रहे थे। हमारे लिए वह पानी जूठा और बेकार हो चुका था। लेकिन यह वहां की तहजीब में शामिल है। सभी लोग मिल-बैठ कर एक चौड़े बर्तन में खाते हैं। चम्मच का कम ही इस्तेमाल होता है। खाना या पीना अलग बर्तन में लेने का रिवाज कम है। हमारे तीसरे साथी ने बताया कि वहां लोग अक्सर बर्तन में मुंह लगा कर ही पानी पीते हैं।

खैर, हमारी कार अब बुखारा की ओर बढ़ रही थी। रास्ता पूरा हरियाली से भरा। लंबे-चौड़े हाइवे के दोनों ओर ऊंचे-ऊंचे चीड़ और देवदार के पेड़ खूबसूरत लग रहे थे। नीला आसमान और प्रदूषण का नामोनिशान नहीं। बुखारा पहुंचे तो साथी उस होटल में ले गया, जहां वह रुकता है। होटल वाले भारतीय को कमरा देना पसंद करते हैं। पासपोर्ट की फोटो कॉपी जमा करानी पड़ती है। ठंडे मौसम को देखते हुए गरम पानी की जरूरत होती है। उज्बेकिस्तान की आबादी का एक बड़ा हिस्सा मुसलिम होने के कारण ज्यादातर व्यंजनों में कहीं हल्का तो कहीं ज्यादा मांसाहार पाया जाता है। रोटी के नाम पर एक बड़ा बन मिलता है, जिसमें खमीर के कारण हलकी खटास होती है। हमने उसी का आॅर्डर कर दिया।

एक दिन रुकने के बाद अगली मंजिल समरकंद था जो वहां से करीब ढाई सौ किलोमीटर दूर है। बुखारा से समरकंद जाने के लिए हमने ट्रेन चुनी। समरकंद स्टेशन पूरी तरह चमक रहा था। ट्रेन भी साफ-सुथरी थी। तीन घंटे बाद समरकंद आया। स्टेशन के बाहर हमें दो स्थानीय पत्रकारों से मिलना था। उनका इंतजार कर रहे थे कि परदेसी देख एक पुलिस वाला हमारे पास आया। हमारे मुल्क की तरह की वहां भी पुलिस में भ्रष्टाचार आम है। पुलिसकर्मी कोशिश में रहते हैं कि कुछ मिल जाए, लेकिन जब आपका दामन साफ हो तो क्या देश क्या विदेश! डरने की जरूरत क्या है! उसने हमसे पासपोर्ट मांगा, लेकिन हमारे साथी ने उज्बेक में उसे डांट दिया।

सिपाही को यह उम्मीद नहीं थी, वह सहम गया। उसे लगा कुछ मिलना मुश्किल है। मेरे हाथ में कोल्ड ड्रिंक की बोतल थी। मैंने उसे वह लेने को कहा तो उसने झट से बोतल मुंह में लगा ली। दो घूंट पीकर वापस कर दी, लेकिन मेरे लिए वह अब किसी काम की नहीं थी। मेरे साथी ने मन के भाव पढ़ लिए थे। उसने पुलिसकर्मी से कहा कि अब ये तुम्हारी है, खत्म करो। जो हो, हिंदुस्तानियों के लिए उन सबके मन में गजब प्रेम है। पुरानी पीढ़ी राजकपूर, बीच की पीढ़ी मिथुन चक्रवर्ती तो नई पीढ़ी शाहरुख खान की दीवानी है। इसी दौरान, जिनका हम इंतजार कर रहे थे, वे आ गए। उनसे पता चला कि भारत की तरह वहां प्रेस पूरी तरह आजाद नहीं है।

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