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हादसों का पहाड़

बरसात के मौसम में हर साल पहाड़ों पर ऐसे हादसे हो जाते हैं। मगर पिछले कुछ सालों से जिस प्रकार बादल फटने और पहाड़ों के धंसने की घटनाएं बढ़ी हैं, उसमें पहाड़ों पर चल रही विकास योजनाओं को इसके लिए जिम्मेदार माना जाने लगा है।
Author August 14, 2017 04:59 am
हिमाचल में राहत कार्य में लगे लोग।

हिमाचल के मंडी जिले में पहाड़ खिसकने से दो बसों और कुछ निजी वाहनों के खाई में रपट जाने और उसमें करीब पचास लोगों के मारे जाने की आशंका के बीच एक बार फिर विकास कार्यक्रमों को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए हैं। माना जा रहा है कि शनिवार को देर रात बादल फटने से पहाड़ धंस गया और उसका सारा मलबा मंडी-पठानकोट राजमार्ग से बहते हुए तलहटी में गिरने लगा, जिसकी चपेट में आकर हिमाचल परिवहन की दो बसें और कुछ निजी वाहन तलहटी में समा गए। बताया जा रहा है कि उन वाहनों में करीब पचास लोग सवार थे। हालांकि अभी राहत और बचाव कार्य जारी है, मृतकों की वास्तविक संख्या पता नहीं चल पाई है। ऐसी ही घटना उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में हुई, जिसमें पहाड़ धंसने से उसके मलबे में कई वाहन बह गए और कई लोगों के मारे जाने की आशंका है। बरसात के मौसम में हर साल पहाड़ों पर ऐसे हादसे हो जाते हैं। मगर पिछले कुछ सालों से जिस प्रकार बादल फटने और पहाड़ों के धंसने की घटनाएं बढ़ी हैं, उसमें पहाड़ों पर चल रही विकास योजनाओं को इसके लिए जिम्मेदार माना जाने लगा है। केदारनाथ त्रासदी के बाद लगातार पहाड़ों की स्थिति समझने और ऐसे हादसों से निपटने के लिए जरूरी तैयारियों पर बल दिया जाता रहा, मगर इस दिशा में कोई उल्लेखनीय कदम उठाया जाता नहीं दिख पाया है।

हिमाचल के कुल्लू, मंडी आदि जिलों और उत्तराखंड के विभिन्न हिस्सों में जिस प्रकार पर्यटन और रोजगार को बढ़ावा देने के नाम पर अतार्किक ढंग से होटल, मोटेल, रिसॉर्ट, मनोरंजन पार्क, सड़कें वगैरह बनाने का काम हुआ, जगह-जगह पनबिजली परियोजनाएं शुरू की गईं, उसमें पहाड़ों पर और नदियों के किनारे तय मानकों को धता बताते हुए खुदाई की गई। इससे पहाड़ कमजोर होते गए। इसके अलावा पहाड़ों पर उपलब्ध खनिजों के दोहन की होड़-सी मची हुई है। हिमाचल के मंडी इलाके में खनिज निकालने वाली और कुल्लू में पनबिजली परियोजनाओं के खिलाफ स्थानीय लोग लंबे समय से आवाज उठाते रहे हैं, मगर वहां की सरकार इन गतिविधियों पर अंकुश लगाने के बजाय राजस्व के लोभ में उन्हें बढ़ावा देती रही है। इसी तरह उत्तराखंड में खुदाई से पहाड़ इस कदर कमजोर होते गए हैं कि मामूली बारिश और भूकम्प का भी दबाव सहन नहीं कर पाते। सो, ऐसे हादसे अक्सर हो जाते हैं।

पहाड़ों पर आबादी का बोझ और औद्योगिक गतिविधियों को बढ़ने से रोकने के मकसद से वहां बाहरी लोगों के जमीन-जायदाद खरीदने पर अंकुश संबंधी नियम बनाए गए थे। मगर राज्य सरकारें रोजगार के अवसर सृजित करने और राजस्व बढ़ाने के तर्क पर उन नियम-कायदों में ढील देती या बदलाव करती गईं। औद्योगिक कंपनियों को खुद न्योता देकर पहाड़ों पर कारोबार फैलाने की छूट देती रहीं। इस तरह पहाड़ों पर खुदाई और निर्माण कार्यों में भारी मशीनों का इस्तेमाल शुरू हुआ और पहाड़ दरकने, खोखले होने शुरू हो गए। थोड़ी-थोड़ी दूरी पर पनबिजली परियोजनाएं शुरू हो जाने से पहाड़ों पर बादलों के इकट्ठा होने और अचानक फटने का सिलसिला बढ़ गया। लंबे समय से सुझाव दिए जाते रहे हैं कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ कर विकास योजनाएं चलाने पर काबू पाने की जरूरत है, मगर इस तरफ गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाता। जब तक पहाड़ों पर अवैध और अतार्किक गतिविधियों पर सख्ती से रोक नहीं लगाई जाती, वहां हादसों का सिलसिला शायद ही रुके।

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