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अभाव में आत्मीयता

नवीन पाल छाछ बिल्कुल गाढ़ी थी। उस पर जीरे का छौंक और हलकी-सी हींग के कारण जायका बन गया था। पीतल के जिन बड़े गिलासों में छाछ हमें दी गई थी, वह भी आम शहरी गिलासों के मुकाबले दोगुने थे। सुबह के हलके कुहासे के बीच खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक की कुर्सियों पर अनजाने […]
Author April 25, 2015 08:07 am

नवीन पाल

छाछ बिल्कुल गाढ़ी थी। उस पर जीरे का छौंक और हलकी-सी हींग के कारण जायका बन गया था। पीतल के जिन बड़े गिलासों में छाछ हमें दी गई थी, वह भी आम शहरी गिलासों के मुकाबले दोगुने थे। सुबह के हलके कुहासे के बीच खुले आसमान के नीचे प्लास्टिक की कुर्सियों पर अनजाने लोगों के बीच छाछ पीना नया अनुभव था। ‘आप समय से आ गए, नहीं तो अब तक हम इसे भैंसों को पिला चुके होते।’ हमारे सामने खाट पर बैठे सज्जन ने कहा। गांव में इसे कोई नहीं पीता, मक्खन निकालने के बाद इसे चारे के साथ भैंसों को दे देते हैं। लेकिन शहर में ऐसी ताजी छाछ कहां मिलती है। दूध थैलियों में आता है। मन हुआ तो दही जमा ली, लेकिन छाछ कहीं नहीं मिलती।

दिल्ली से जयपुर जाते हुए हम अचानक ही इस गांव में आ पहुंचे थे। दोस्त की पीएचडी की परीक्षा थी। हम तीन साथी अलसुबह अपनी कार से निकले थे। नीमराणा से आगे बढ़ते ही दोस्त ने कहा कि कहीं अच्छी चाय पी जाए। या फिर चाय तो रोज पीते हैं, आज छाछ पीते हैं, मैंने कहा। छाछ की तलाश में ही हाइवे से दो किलोमीटर दूर हम रजियावास नाम के इस गांव में आ पहुंचे थे। यों ही एक घर का दरवाजा खटखटा दिया। कंबल ओढ़े एक साहब ने दरवाजा खोला। मैंने कहा- ‘छाछ मिलेगी क्या?’ वे हमारी इस अजीब फरमाइश से हैरत में थे। उन्होंने एक नजर हम पर डाली और घर के अंदर ले लाए। बोले, देखता हूं, छाछ है कि नहीं। उन्होंने अपनी पत्नी से पूछा। छाछ थी।

फिर बड़े अदब से हमें अपने आंगन में बिठाया गया। शायद ‘जान न पहचान, मैं तेरा मेहमान’ जैसा मुहावरा ऐसे ही मौके के लिए गढ़ा गया होगा। वे बोले- ‘गुड़ के साथ पीएंगे या या नमक के साथ?’ दोस्त ने कहा- ‘अगर नमक डाल कर जीरे का छौंक लग जाए तो मजा आ जाए।’ उनके चेहरे पर मुस्कराहट तैरी। उन्होंने कहा- ‘बिल्कुल लग जाएगा।’

वे हमारे साथ बातचीत में मशगूल हो गए। उनका नौजवान बेटा भी साथ आकर बैठ गया। वह एक किसान का घर था। उनकी पीड़ा यह थी कि गांव के किसानों की जमीन सरकार ने अधिग्रहीत कर बड़ी कंपनियों को दे दी है। किसानों को मुआवजे के नाम पर कौड़ी मिली, जबकि सरकार ने कंपनियों से मोटी रकम उगाही। इन कंपनियों के वेयर हाउस गांव की दहलीज तक आ पहुंचे हैं। जिन किसानों की जमीन बच गई, वे खेती तो करना चाहते हैं, लेकिन बिजली-पानी की दिक्कत है। पानी जमीन से सवा सौ फुट नीचे है। खेती किसी तरह हो भी जाती है तो कटाई के लिए मजदूर मिलना दूभर है। अगर मजदूर मिल भी जाते हैं तो इतना पैसा मांगते हैं कि किसान की लागत भी नहीं निकल पाती। कुल मिला कर अनाज पैदा करने वाला ठगा रह जाता है। ‘इस ट्रैक्टर को क्या आप चलाते हैं?’ हमने साथ बैठे किसान के बेटे से पूछा। उसके पिता ने कहा- ‘नहीं’। बेटा नीमराणा में कुरियर कंपनी में सात हजार रुपए महीने की मजदूरी पर काम करता है। बीए करने के बाद जब कहीं सरकारी नौकरी नहीं मिली तो तो प्राइवेट नौकरी करने लगा। महज एक बीघे जमीन बची है। कुछ पिता कमाते हैं। इसमें पूरे परिवार का गुजारा हो जाता है।

इस बातचीत के बीच हमारे लिए छाछ आई और हमने उसे खत्म भी कर लिया था। अब हमें आगे का सफर तय करना था। हमने इजाजत मांगी तो वे भोजन करने की जिद करने लगे। हमने लंबे सफर की दुहाई थी। पिता और बेटे हमें छोड़ने बाहर तक आए। हम तीनों जयपुर पहुंच चुके थे, लेकिन मन वहीं था। दिल में रह-रह कर यह बात आ रही थी कि राजनीति और नई अर्थनीति की मार झेलते लोगों के बीच आज भी इतनी आत्मीयता कैसे बची हुई है… शहरों में यह क्यों नहीं पाई जाती है!

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  1. V
    VIJAY LODHA
    May 7, 2015 at 12:03 pm
    छाछ तो आप खरीद कर भी पी लेते, लेकिन तब कभी न भुलाये जा सकने वाली उस आत्मीयता के अहसास से वंचित हो जाते..
    (0)(0)
    Reply
    सबरंग